बिना किसी डिगरी और ट्रेनिंग के चापलूसी की कला में महारत हासिल करने के लिए सिर्फ थोड़ी बेशर्मी भरी हंसी और काम के आदमी के सामने जीभ लपलपा देना काफी है. फिर देखिए, सामने वाला कैसे हथियार डालता है आप के सामने. आखिर नेता, अभिनेता से ले कर आम इंसान और कुत्ते तक, चापलूसी किसे नहीं भाती भाई.
चापलूसी शब्द कुछ ऐसा लगता है जैसे लूसी नाम की कोई ‘शी डौग’ जीभ लपलपाते हुए सामने वाले को चाटने को तैयार हो. स्वाद आए या न आए, उसे चाट कर यह जतलाना है कि वह सामने वाले को दिलोजान से चाहती है. यह शब्द शायद इसी आधार पर बना होगा. पर सवाल उठता है कि इस की परिभाषा क्या है?
हद कर रहे हैं आप. चापलूसी की न कोई सही भाषा होती है न कोई व्याकरण और न ही कोई वर्तनी. इस में तो केवल कमाल जिह्वा का होता है. वह जैसे चाहे शब्दों को घुमाफिरा कर होेंठों को बाध्य कर देती है कि वे खुल जाएं. बेचारे होंठ इतने गुलाबी रंगत होने के बावजूद न जाने कितनी तरह की कालिख हर क्षण उगलने को मजबूर हो जाते हैं. अब जब इस की कोई सटीक भाषा ही नहीं है तो आप क्यों परिभाषा की बात कर रहे हैं? चापलूस कहीं के.
‘नहीं, आज तो आप को मेरे साथ लंच करने चलना ही होगा,’ उन्होंने आग्रह किया या कहें जोर दे कर कहा मानो अगर मैं ने न कहा तो वे जबरन हाथ खींचते हुए, अपने लंगड़ाते पैर के बावजूद, मुझे घसीट कर गाड़ी में बिठाने को तत्पर हैं.
‘औफिस से यों निकलना मुश्किल होता है, पेज छोड़ना है, पत्रिका छपने के लिए तैयार है,’ मैं ने समझाना चाहा.
‘आधे घंटे में कुछ नहीं होगा, कहें तो मैं आप के बौस से बात करूं.’
हद हो गई, मैं ने सोचा. क्या मेरी पोजिशन को आंकना चाहती हैं.
‘चलिए.’ पीछा छुड़ाने का अंदाज था मेरा.
खाने के साथ मीठीमीठी बातें, बिल तो देना ही था. मैं ने जिद की तो बोलीं, ‘मेरे पति बैंक में हैं. उन्हें सारे बिल की पेमैंट हो जाती है. उन्हीं के अकाउंट में डाल दूंगी,’ बेशर्मी से हंसना नहीं भूलीं. समझती हूं ये सब चापलूसी के फंडे हैं. शायद कुछ लेख छप जाएं. बहुत बार कहा है, अच्छा होगा तभी छपेगा. पत्रिका के स्तर का सवाल है पर वे हैं कि जबतब हाथ में कुछ लिए धमक पड़ती हैं.
इस बार तो दीवाली पर पति के हाथों गिफ्ट तक भिजवा दिया. फोन पर तो ऐसे बात करती हैं मानो बोतलभर रोज शहद पी उस का कुल्ला करती हों. फिर एक दिन नौकरी छोड़ दी हम ने. सुनते ही शहद की जगह नीम का काढ़ा उन के मुंह में घुल आया. रास्ते में दिखीं भी तो यों बच कर निकलने लगीं जैसे मैं कोई चील हूं और उन्हें दबोच लूंगी.
क्या कहा, चापलूस अपनी फितरत से बाज नहीं आ सकते. मैं ने कब कहा कि उन्होंने चापलूसी करनी छोड़ दी है, बस नए मुरगे की तलाश में लंगड़ाती हुई फिर निकल गई हैं.
दरअसल, चापलूसी एक बहुत ही महान कला है. हर कोई इस में महारत हासिल नहीं कर सकता. इस में पारंगत होने के लिए बीए, एमए की डिगरी की जरूरत नहीं है. बस, बेशर्मी पर उतर आइए, हर वक्त मुसकराते रहिए और सामने वाले के दुत्कारने के बावजूद ऐसे भोले और मासूम बन जाइए कि उस ने जो आप के प्रति धारणा बनाई है, उस पर उसे ही भरोसा न रहे. वाह, क्या ताकत होती है चापलूस के पास, दूसरे का विश्वास ही डगमगा दिया. यह कमाल है तो बस शब्दों का. ऐसेऐसे जुमले फेंकते हैं कि सुनने वाला उन का कायल हो जाता है. आखिर चापलूस उस की तारीफ में कसीदे जो काढ़ रहे होते हैं.
चापलूस असल में आप के हितैषी होते हैं, कैसे? अरे वे वही कहते हैं, जो आप के मन को अच्छा लगता है. यानी वे आप को जब भी मिलते हैं खुश कर देते हैं तो हुए न वे आप के हितैषी. उन्हें देख कर आप मानें या न मानें एक आंतरिक खुशी जरूर होती है. अपनी तारीफ सुन मनप्राण सब तृप्त हो जाते हैं. ऐसे में सिर्फ उन्हें ही दोष देना गलत है न. आखिर, उन्हें चापलूस बनाने में आप की भी तो कोई कम भूमिका नहीं है.
चापलूस की शक्ल, रंगरूप, चालढाल, यहां तक कि कपड़े भी आम लोगों की तरह होते हैं, इसीलिए उन्हें पहचानना टेढ़ी खीर हो सकता है पर अपनी हरकतों और बौडी लैंग्वेज से वे आसानी से पकड़ में आ जाते हैं. उन की आंखें साफ बोलती हैं कि वे झूठ बोल रहे हैं और उन के चेहरे के भाव कहते हैं कि वे समझ रहे हैं कि सामने वाले को बेवकूफ बना दिया है. गजब का आत्मविश्वास होता है इन चापलूसों में. फिर हो भी क्यों न, आखिर ये दूसरों को खुश रखने की कला जो जानते हैं.
सम्मान जताने के लिए चापलूसों के हाथ हमेशा जुड़े रहते हैं और कमर झुकने को यों आतुर रहती है मानो रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर हो गया है. शरम को तो सुबहशाम ये गोलगप्पे के पानी में घोल कर पी जाते हैं. फिर बाद में चटखारा लेना भी नहीं भूलते हैं. पेट पर हाथ फेर कर पूर्ण संतुष्टि का एहसास करते हुए जब ये चलते हैं तो अपने हाथ में पकड़े झोले में दोचार जुमले डालना नहीं भूलते.
कभी कार ले कर आप के पास पहुंच जाते हैं तो कभी मिठाई ले कर. कोई त्योहार हो तो और अच्छा. उपहार देने का इस से अच्छा मौका कहां मिलेगा. आप न कर के तो देखिए, चापलूस आप को ऐसे झूले में हिंडोले देंगे कि आप को चक्कर आने लगेंगे. ‘हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का...’ गाना गाते हुए सचमुच आप के पंख उग आएंगे और आप को लगेगा कि आप से अच्छा इंसान तो इस दुनिया में कोई है ही नहीं. तारीफों के पुल चढ़तेचढ़ते धम से उसी सूरत में गिरेंगे जब चापलूस का आप से काम निकल जाएगा और वह आप के आसपास फटकेगा भी नहीं.
ये चापलूस ऐसे जीव हैं जो आत्मग्लानि का बोध करा देते हैं. झूठी प्रशंसा का पहाड़ खड़ा कर, फिर उस में मोटेमोटे छेद कर देते हैं. अब झेलते रहिए आप मिट्टी को.
इंसान चापलूस क्यों बनता है? इस सवाल का उत्तर जानना जरूरी है. क्योंकि चापलूस बनना आज के दौर में बहुत आवश्यक है, चाहे आप पसंद करें या न करें. जिंदगी में अगर आगे बढ़ना है तो चापलूसी के हर पाठ का अध्ययन बहुत एकाग्रता से करना होगा. नेता हो या अभिनेता, श्रोता हो या वक्ता, कुत्ता हो या इंसान, हर किसी को पुचकारा जाना अच्छा लगता है. चापलूस पुचकारने का काम करता है ताकि उस का काम निकल सके. उस का क्या गया अगर उस ने दो शब्द मीठे बोल दिए. आप ही सोचिए कि क्या आप को कड़वा बोलने या सच बोलने वाले पसंद आते हैं. आप ही तो चापलूसों की जमात में जा कर खड़े होते हैं. नेता हमेशा अपने साथ एक लंबी कतार ले कर चलता है जो ‘जय हो’ के नारे लगाते हैं.
सत्ता बदलते ही चापलूसों का दल बदल जाता है. यानी जिस की लाठी उस की भैंस. चापलूस उसी के पीछे जा कर खड़ा होगा जिस की हैसियत होगी. पति अगर पत्नी की चापलूसी करता है तो बुरा क्या है. घर की सुखशांति के लिए महंगा सौदा नहीं है.
अब चापलूस को दोष देना छोड़ दें क्योंकि वह भी एक इंसान है जो अपने को बचाए रखने के प्रयत्न में रोज शहद का कुल्ला करता है. अगर कोई चापलूस लड़की है तो समझो वारेन्यारे हो गए. मीठी मुसकान और सजीले होंठ, दोनों ही का मजा उठा सकते हैं.
क्या कहा, परिभाषा नहीं बताई. आप कितने अच्छे हैं, जरा खुद ही समझ लीजिए न.

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