यह कहा जाता है कि ‘अ सोल्जर इज नैवर औफ ड्यूटी’. ‘हौलीडे’ नामक इस फिल्म में अक्षय कुमार एक सोल्जर की भूमिका में है और चौबीसों घंटे वह अपने मिशन को पूरा करने में लगा रहता है यानी नैवर औफ ड्यूटी.

टाइटल से तो यह फिल्म छुट्टियां मनाने और मौजमस्ती करने वाली लगती है लेकिन ऐसा नहीं है. फिल्म आतंकवाद पर है. आतंकवाद खुलेआम वाला नहीं, गुपचुप वाला यानी स्लीपर्स सैल. स्लीपर्स सैल हमारेआप के बीच रहने वाले ऐसे लोग होते हैं जो आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होते हैं, उन्हें यह पता नहीं होता कि उन का इस्तेमाल कौन किसलिए कर रहा है. स्लीपर्स सैल के लोग कोई भी हो सकते हैं, आप का दूध वाला, ड्राइवर, नौकर, दुकानदार, दफ्तर का बौस…कोई भी हो सकता है. इस फिल्म में दिखाया गया है कि भारतीय रक्षा मंत्रालय का जौइंट सैके्रटरी स्लीपर्स सैल का मुखिया है.

‘हौलीडे’ तमिल फिल्म ‘तुप्पाकी’ की रीमेक है. इस फिल्म के निर्देशक ए आर मुरगादास ने 6 साल पहले आमिर खान की फिल्म ‘गजनी’ का निर्देशन किया था. ‘गजनी’ और ‘हौलीडे’ में काफी फर्क है. ऐक्शन थ्रिलर दोनों फिल्में हैं लेकिन निर्देशक ने ‘हौलीडे’ में ऐक्शन के साथसाथ हास्य और रोमांस को भी डाला है. जरूरी है कि हास्य और रोमांस होगा तो गाने होंगे ही. अब आप ही बताइए, आतंकवाद वाली फिल्म में भला गानों का क्या काम. गाने कहानी के प्रवाह में बाधा ही पैदा करते हैं.

फिल्म की कहानी बहुत बढि़या नहीं है लेकिन फ्लैट भी नहीं है. कैप्टन विराट बक्शी (अक्षय कुमार) फौज में है. वह जम्मू में तैनात है. 40 दिनों के हौलीडे पर वह मुंबई आता है. उस के घर वाले उसे एक लड़की साहिबा (सोनाक्षी सिन्हा) दिखाने ले जाते हैं लेकिन विराट उसे रिजैक्ट कर देता है. साहिबा उसे बहुत सीधीसादी लगती है. अगले दिन शहर में हो रहे एक बौक्ंिसग मुकाबले में वह साहिबा को बौक्ंिसग करते देखता है तो अपना इरादा बदल लेता है.

उन्हीं दिनों मुंबई में आतंकवादियों द्वारा एक साजिश रची जा रही थी. एक जबरदस्त बम धमाके में स्कूली बच्चों की बस के परखचे उड़ जाते हैं. अपने दोस्त पुलिस इंस्पैक्टर (सुमित राघवन) के साथ विराट एक आतंकवादी को पकड़ता है. उसी से विराट को जानकारी मिलती है कि मुंबई में 12 जगहों पर बम धमाके होने हैं. विराट का सामना लेटैस्ट तकनीक में माहिर आतंकवादियों के सरगना (फ्रेडी दारूवाला) से होता है, जो पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं को खुश करने में लगा है. विराट पहले तो एकएक कर इन स्लीपर्स सैल के तमाम लोगों को मार गिराता है. अंत में इस सैल के सरगना को भी खत्म करता है. छुट्टियों में वह साहिबा से सगाई कर ड्यूटी पर लौट जाता है.

फिल्म की सब से बड़ी कमजोरी इस की लंबाई है. लगभग 3 घंटे की इस फिल्म को जबरदस्ती खींचा गया है. अक्षय कुमार ने ऐक्शन दृश्य इस तरह किए हैं जैसे वह निर्देशक पर एहसान कर रहा हो.  गोविंदा ने कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया है.

सोनाक्षी के हिस्से में कुछ सीन ही आए हैं. उस ने खानापूरी ही की है. फ्रैडी दारूवाला का काम काफी अच्छा है. सुमित राघवन प्रभावित नहीं कर सका. फिल्म का निर्देशन परंपरागत है. निर्देशक ने गति ढीली नहीं होने दी है. गीतसंगीत पक्ष साधारण है. छायांकन अच्छा है.

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