लेखक-डा. एसके सिंह 

दूध में भोजन के सभी जरूरी तत्त्व जैसे प्रोटीन, शक्कर, वसा, खनिजलवण, विटामिन वगैरह उचित मात्रा में पाए जाते हैं, जो लोगों की सेहत और बढ़ोतरी के लिए बहुत जरूरी होते हैं, इसीलिए दूध को एक संपूर्ण आहार कहा गया है.

लेकिन दूध में जीवाणुओं की बढ़ोतरी होते ही दूध जल्दी खराब होने लगता है. इसे ज्यादा समय तक साधारण दशा में सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है. कुछ दूसरे हानिकारक जीवाणु दूध के जरीए दूध पीने वालों में कई तरह की बीमारियां पैदा कर देते हैं, इसलिए दूध को ज्यादा समय तक सुरक्षित रखने, गंदे व असुरक्षित दूध को पीने से होने वाली बीमारियों से लोगों को बचाने व ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए दूध का उत्पादन साफ तरीकों से करना बहुत जरूरी है.

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अगर भारत जैसे देश की बात करें तो यहां की दूध की क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं है. दूध की क्वालिटी पर असर डालने वाले जीवाणुओं की तादाद की बात करें तो प्रति मिलीलिटर कच्चे दूध में इन की तकरीबन 2 लाख से 10 लाख के बीच तादाद होती है, जबकि विदेशों में अच्छे से प्रबंधन करने के चलते इन की तादाद प्रति मिलीलिटर 30,000 से ज्यादा नहीं होती.

अगर हम पैकेटबंद दूध की बात करें तो इस में भी तादाद प्रति मिलीलिटर 30,000 से ज्यादा नहीं होती.

इन हालात को देखते हुए हम कह सकते हैं कि हमारे देश में पशुपालक दूध की क्वालिटी पर इतना ध्यान नहीं देते.

दूध में 2 तरह की

गंदगियां पाई जाती हैं

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* आंख से दिखाई देने वाली गंदगियां, जैसे गोबर के कण, घासफूस के तिनके, बाल, धूल के कण, मच्छरमक्खियां वगैरह. इन्हें साफ कपड़े या छलनी से छान कर अलग किया जा सकता है.

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