लेखक- प्रो. रवि प्रकाश मौर्य, डा. सुमन प्रसाद मौर्य आचार्य नरेंद्र देव

रवि प्रकाश मौर्य ने हल्दी की उपयोगिता और एक परिवार के लिए कम क्षेत्रफल में खेती करने की सलाह दी. उपयोगिता हल्दी का उपयोग प्राचीन काल से विभिन्न रूपों में किया जाता रहा है, क्योंकि इस में रंग, महक व औषधीय गुण पाए जाते हैं. हल्दी में जैव संरक्षण और जैव विनाश दोनों ही गुण विद्यमान हैं. भोजन में सुगंध व रंग लाने में, अचार आदि भोज्य पदार्थों में इस का उपयोग करते हैं. हल्दी भूख बढ़ाने और उत्तम पाचक में सहायक होती है. यह रंगाई के काम में भी उपयोग होती है. दवाओं में भी इस का उपयोग किया जाता है. साथ ही, कौस्मैटिक चीजें बनाने में भी इस का उपयोग किया जाता है. एक परिवार के लिए जरूरत एक सामान्य परिवार को प्रतिदिन 15-20 ग्राम हलदी की जरूरत रहती है.

इस तरह से महीने में 600 ग्राम, साल में 7 किलोग्राम सूखी हलदी की जरूरत होती है. मिलावटी हल्दी की पहचान बाजार में ज्यादातर मिलावटी हल्दी आ रही है, जिस में पीला रंग मिला रहता है. यदि हल्दी का दाग कपड़े पर लगता है, तो साबुन से धोने से उस का रंग लाल हो जाता है और धूप में डालने पर दाग हट जाता है. अगर मिलावट है, तो दाग बना रहता है. हल्दी में मिलावट से बचने के लिए कम क्षेत्रफल एक बिस्वा/कट्ठा (125 वर्गमीटर) में हलदी की खेती की तकनीकी जानकारी दी जा रही है : मिट्टी हल्दी की खेती करने के लिए दोमट मिट्टी, जिस में जीवांश की मात्रा अधिक हो, अति उत्तम है. मुख्य प्रजातियां, अवधि और उत्पादकता राजेंद्र सोनिया, सुवर्णा, सुगंधा, नरेंद्र हलदी-1, 2, 3, 98 व नरेंद्र सरयू मुख्य किस्में हैं, जो 200 से 270 दिन में पक कर तैयार होती हैं. उत्पादन क्षमता 250 से 300 किलोग्राम प्रति बिस्वा और सूखने पर 25 फीसदी हल्दी मिलती है. बोआई का समय और खेत की तैयारी हल्दी के लिए रोपाई का उचित समय मध्य मई से जून का महीना होता है.

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