देखते ही देखते दीपा की दुनिया बदल गई थी. रजत तो रजत, बच्चे भी मानो अजनबी, अनजान हो चले थे. सुना, पढ़ा था कि इंसान बुढ़ापे में अकेला हो जाता है, स्नेहसिक्त दो बोलों को तरस जाता है, पर यहां तो 40 बसंत, पतझड़ देखते न देखते वृद्धावस्था सी उदासी और एकांतता घिर आई. रजत कार्यालय के कार्यों में व्यस्त, तो बच्चे अपनेआप में मस्त. अकेली पड़ गई दीपा मन को बहलानेफुसलाने का यत्नप्रयत्न करती, ‘पदप्रतिष्ठा के दायित्वों  तले दबे रजत को घोर समयाभाव सही, पर अब भी वह उस से पहले जैसा ही स्नेह रखता है.

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