तिहरे तलाक के मसले पर तो प्रधानमंत्री से ले कर भगवा दुपट्टा ओढ़े सड़कछाप मजदूर तक बड़े जोरशोर से बोल रहे हैं कि यह मुसलिम महिलाओं के साथ अन्याय है और इस कानून को तुरंत कर्बला में दफना दिया जाना चाहिए. पर हिंदू धर्म के तलाक कानून पर कुछ नहीं कहा जा रहा. जरूरत यह है कि औरतों को तलाक की सुविधा वैसी ही मिले जैसी शादी करने की मिलती है. फेरे लिए, कबूल है बोला, आई डू कहा और शादी हो गई पर यदि शादी तोड़नी हो तो औरतों को आज भी अपनी जिंदगी झोंकनी पड़ती है. फिर चाहे गलती उन की हो या न हो.

एक औरत को यह पैदाइशी हक मिलना चाहिए कि अगर वह किसी पुरुष के साथ बंध कर नहीं रहना चाहती है तो जब चाहे अपने बच्चों व सामान के साथ जहां मरजी चली जाए. हर औरत ऐसा नहीं करेगी यह पक्का है पर उस से धर्म या कानून उस का हक छीनता है और यह हक सिर्फ अदालतों को या सिर्फ पतियों को देता है तो गलत है. अगर भगवाई समाज को मुसलिम औरतों से प्यार अनायास उमड़ा है, तो उन्हें हिंदू पतियों के जुल्म सहती करोड़ों औरतों को भी हक दिलाना चाहिए कि वे ‘तलाक देती हूं, तलाक देती हूं, तलाक देती हूं’ कह कर एक अनचाहे से छुटकारा पा सकें और अपने पैरों पर खड़ी हो कर अपनी जिंदगी अकेले या अपने मनचाहे के साथ गुजार सकें.

सरकार की मुसलिम औरतों के प्रति यह हमदर्दी कोरी धार्मिक है. हर हिंदू को यह पाठ पढ़ा दिया जाता है कि मुसलिम पति मजे में रहते हैं. वे 4-4 शादियां कर सकते हैं और जब चाहें तलाक दे सकते हैं. यह उन का कानून अवश्य है, यह गलत भी है, पर इस का इस्तेमाल व्यापक हो रहा होता, तो मुसलिम मर्दों के पास 4 तो क्या 1 भी औरत नहीं होती और सारी मुसलिम औरतें तलाकशुदा होतीं. किस घर में कभी न कभी बरतन इतने जोर से नहीं खड़कते कि पति बोल दे कि वह तलाक देना चाहता है? पर कुछ देर बाद होश आ जाता है कि पत्नी एक नायाब तोहफा है, जो अपना तनमनधन एक पराए को सौंप कर उस के सुखदुख में शामिल हो कर एक घरौंदा बनाती है, एक सुरक्षा देती है, वक्त पड़ने पर दोस्त बनती है, सलाह देती है, सुरक्षा देती है, सुकून देती है. उसे 3 बार तलाक कह कर नहीं छोड़ा जा सकता.

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