सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण फैसला सुनाया है कि गंभीर अपराधों में सूचना मिलने पर प्राथमिकी का दर्ज न करने का स्थानीय थाने के पास कोई अधिकार नहीं है. अदालत का कहना है कि जब कानून कहता है कि हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह पुलिस को उस की जानकारी में हुए अपराध की सूचना दे तो पुलिस का भी कर्तव्य है कि सूचना मिलने पर प्राथमिकी दर्ज कर के जांच शुरू करे.

आमतौर पर कहा जाता है कि पुलिस गरीब और कमजोर लोगों की शिकायतें दर्ज नहीं करती और उन्हें न्याय नहीं मिलता और इसी तरह बड़ी पहुंच वाले लोगों के खिलाफ भी वह रिपोर्ट दर्ज नहीं करती. यह सच है कि बड़े लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने में शिकायत करने वालों को कई दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं और कई बार तो मामले उच्च न्यायालय की दखल के बाद दर्ज होते हैं.

यह निर्णय पुलिस के अधिकार घटाएगा या बढ़ाएगा, कहना कठिन है. यह तो मानना पड़ेगा कि पुलिस में भ्रष्टाचार की कोई सीमा नहीं है. दिल्ली में हाल में 3 पुलिस वालों ने 20 हजार रुपए की रिश्वत न देने पर एक आटोरिकशा चालक के पिता को जिंदा जला डाला था.

प्राथमिकी को दर्ज करने के हथियार के मिलने के बाद पुलिस वाले किसी को भी उकसा कर उस से किसी भी पहुंच वाले के खिलाफ गंभीर आरोप लगवा कर वसूली कर लें तो सर्वोच्च न्यायालय कुछ न कर पाएगा.

यदि उच्च न्यायालय 400-500 किलोमीटर दूर हुआ तो आरोपी को कई रातें पुलिस हिरासत में बितानी होंगी ही, देश की छोटी अदालतों का नियम है कि जेल दो, बेल नहीं जबकि सर्वोच्च न्यायालय कितने ही निर्णयों में उलटा कह चुका है.

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