सरकार ने देश के व्यापारियों पर जीएसटी यह कह कर थोपा था कि इस से व्यापार सुविधाजनक हो जाएगा और एक से बंधी दूसरी चेन वाली बिक्री के कारण न हेराफेरी होगी न इंस्पैक्टर राज होगा. सरकार के दूसरे वादों की तरह यह भी खोखला साबित हो रहा है. जीएसटी एक आफत का पहाड़ बन चुका है और बारबार की रिटर्नों, लंबे नंबरों की मुसीबतों, उलझी टैक्स दरों, सरकारी नोटिसों, ईवे बिलों के चक्करों में व्यापारियों को इस सुविधा की बहुत बड़ी कीमत देनी पड़ रही है.

सरकार चाहे खुश हो कि प्रारंभ में 84,000 करोड़ रुपए के कुल टैक्स से यह 1 साल में बढ़ कर 2 लाख करोड़ मासिक के आसपास होने लगा है. इस में घोटाले होने लगे हैं. बड़े फख्र से अधिकारी कह रहे हैं कि कोलकाता में उन्होंने 5,000 करोड़ रुपए का घोटाला पकड़ा है और जांच व छापे जारी हैं. उन का कहना है कि बिना उत्पादन व बिक्री के बिना जीएसटी पोर्टल से बाकायदा ई-वे बिल निकाल कर इनपुट टैक्स क्लेम किया जा रहा है और जम कर सरकार को लूटा जा रहा है.

लूटा सरकार को कम जा रहा है, असल में सरकार लूट रही है जो भारीभरकम टैक्स मैनुअल बना कर अपने अफसरों के ताबड़तोड़ नोटिस जारी करने का अवसर दे रही है. पर नोटिस का मतलब है व्यापारी की सांस रुकना. यह एक तरह की रंगदारी होती है जिस में अपील और दलील से नहीं, मेज के नीचे से लेनदेन से काम चलता है. जीएसटी का ज्यादा लाभ यह हुआ है कि ये मौके राज्य सरकारों के पहले के सेल्स टैक्स अफसरों के हाथों से खिसक कर केंद्र के अफसरों के हाथों में पहुंच गए हैं. मंदिर जितना बड़ा होगा, मूर्तियां उतनी ज्यादा होंगी और उतना ही चढ़ावा ज्यादा दिया जाएगा, इस सिद्धांत पर टैक्सभक्तों को न केवल अब परिक्रमाओं में ज्यादा चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, पूरे मंदिर परिसर में शातिरों की भीड़ जमा हो गई है जो भक्तों को तुरंत दर्शन, तुरंत पूजा कराने के नाम पर पैसा वसूलती है. टैक्स सरकारी पूजा जैसा बन गया है.

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