जजों की नियुक्ति को ले कर नरेंद्र मोदी सरकार ने एक हल्ला छोड़ दिया है जैसे कभी उन्होंने राममंदिर को ले कर, धारा अनुच्छेद 370 को ले कर छेड़ा था. अभी बातें धीरेधीरे एक मंत्री द्वारा कहलवाई जा रही हैं और मामला अपने पक्ष में आया दिखा, तो इसे तूफान की तरह लाया जा सकता है.

1970-75 तक जजों की नियुक्ति केंद्र सरकार को करनी थी और सारे उच्च न्यायालय व सर्वोच न्यायालय के जज तब की कांग्रेस सरकार की देन थे. लेकिन संविधान में जजों को हटाने की प्रक्रिया बहुत टेढ़ी है, इसलिए बनाए जाने के बाद जज जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के प्रति भी निष्ठावान नहीं रहे और धीरेधीरे उन्होंने अपना ही एक सिस्टम ईजाद कर लिया जिसे अब कौलेजियम सिस्टम कहा जा रहा है जिस में जज कुछ नाम केंद्र सरकार को भेजते हैं और उस की स्वीकृति के बाद उन्हें नियुक्त कर दिया जाता है. यह किसी कानून के अंतर्गत नहीं किया गया हैयह सर्वोच्च न्यायालय के अपने फैसलों के आधार पर है. संवैधानिक व्यवस्था कुछ इस प्रकार की है कि सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय अपनेआप में कानून बन जाता है.

इस से सरकारें बहुत खफा रही हैं क्योंकि वे अपने मन के जज नियुक्त नहीं कर सकतीं. जजों को निर्णय देने के लिए प्रभावित करने के लिए उन्हें उन के नातेरिश्तेदारों पर दबाव डालने पड़ते हैं. नरेंद्र मोदी सरकार नेहरू और इंदिरा गांधी का उन के लिए सवर्णयुण लाना चाहती है ताकि केवल पूजापाठी भक्त किस्म के लोग ही जज बन सकें.

कौलेजियम सिस्टम बहुत अच्छा है, यह तो नहीं कहा जा सकता पर इस का पर्याय कि सरकार या लोकसभा का बहुमत जज नियुक्त करे, वह भी अच्छा नहीं है. कौलेजियम सिस्टम में जज अपने जानपहचान वालों को वरीयता दे सकते हैं पर उन का उद्देश्य कोई राजनीतिक लक्ष्य पाना नहीं होता. सरकारी जज तो सरकार इसलिए नियुक्त कर सकती है कि उसे अपने मतलब के फैसले चाहिएऐसे जज जो सरकार की हर बात पर स्वीकृति की मोहर लगा दें.

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