आरुषि हत्याकांड पर जिस तरह से मीडिया बौराया है वह  दर्शाता है कि हमारा यह शक्तिशाली टूल केवल क्रिकेट के बैट या हौकी स्टिक की तरह मारने लायक रह गया है, कुछ स्कोर करने लायक नहीं. पतिपत्नी के घर में रहते 13 साल की इकलौती बेटी की हत्या हो जाए और उसी घर में अगले दिन एक नौकर की लाश मिले, यह आश्चर्य की बात तो है पर घंटों उस पर चैनल दर चैनल 4-5 लोग अपने खयाली पुलाव पकाते रहें और देश के खाली बैठे लोग कयास लगाते रहें कि किस ने मारा और डाक्टर दंपती निर्दोष है या दोषी, पागलपन की निशानी है.

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