इस माता की जय बोलो या उस माता की. नहीं बोलोगे तो सिर फोड़ देंगे, यह शिक्षा दी जा रही है आज  युवाओं और किशोरों को, उन के द्वारा जो संस्कृति, समाज, संस्कारों और सरकार के ठेकेदार हैं. आज का किशोर भ्रम में है. ये माताएं आई कहां से? उस किशोर के घर में जो मां है, वह ही तो उस का केंद्र है. वह उस के खाने का खयाल रखती है. पढ़ाई पर ध्यान देती है. उसे घुमाने ले जाती है. 2 घंटे न दिखे तो लगता है जीवन अधूरा रह गया. उस मां की जय न बोलो तो समाज के ठेकेदारों को कोई फर्क नहीं पड़ता पर उस मां जो है ही नहीं, दिखती नहीं, कुछ करती नहीं, बचाती नहीं, खाना नहीं देती, सुख नहीं देती, के पीछे इतना हल्ला?

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