आम आदमी पार्टी में चल रहा घमासान एक पौधे के पेड़ बनने की स्वाभाविक प्रक्रिया है, खासतौर पर तब जब पेड़ विषम, दुर्गम परिस्थितियों में उग रहा हो और सब उसे उखाड़ने में लगे हों. आम आदमी पार्टी मुख्यतया अरविंद केजरीवाल की देन है, यह मानना पड़ेगा. जनता को, आप नेताओं को और समर्थकों को भी. पार्टी में सबकुछ उन्हीं की मरजी से हो, यह जरूरी नहीं पर उन की मरजी के खिलाफ कुछ हो, यह मंजूर भी नहीं हो सकता.

अरविंद केजरीवाल ने बहुत से जोखिम लिए हैं. उन्होंने ही तिनकातिनका इकट्ठा कर घोंसला बनाया है. अब तिनके अपनेआप को घोंसले का रखवाला मानने लगें तो यह उचित नहीं है. प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव अच्छे हैं, समझदार हैं. अरविंद को उन की जरूरत है पर इस का अर्थ यह नहीं कि वे पार्टी की कमेटियों में अपनी मरजी के फैसले कर उन पर पार्टी और अरविंद को चलने की जिद करें. ये दोनों अच्छे तर्क दे सकते हैं और पार्टी की कमेटियों में बोलते भी हैं पर ये ही सारी सूझबूझ रखते हों, जरूरी नहीं.

आम आदमी पार्टी में लड़ाई सत्ता में आ कर अभी पैसा बनाने की नहीं है. कभी यह शुरू जरूर होगी पर तब तक तो पार्टी के लोगों को छोटेमोटे अनुशासन में रहना ही होगा. यदि आम आदमी पार्टी में एक ही की चले, चाहे वह अरविंद केजरीवाल ही क्यों न हों, तो गलत होगा पर अगर दूसरे लोग पार्टी को अलगअलग राह पर ले जाने के लिए रस्साकशी करने लगें तो वह भी गलत होगा. ऐसा बहुत होता है कि शुरू से साथ चलने वाले किसी पार्टी, संस्था और कंपनी में अपना निजी हक जमाने लगते हैं जबकि वे और किसी 1 या 4-5 लोगों के योगदान को बहुमत के नाम पर कुचलने की कोशिश करते हैं. बहुत सी अच्छी पार्टियां अपने सदस्यों के इसी अहं की लड़ाई का शिकार हुई हैं.

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