किसी को किसी खबर की सही जानकारी देने का काम मीडिया से जुड़े लोग करते हैं. उन का नैटवर्क बड़ा जबरदस्त होता है. इस के अलावा उन्हें बहुत सी एजेंसियां खबरें देती हैं, जिन्हें वे टैलीविजन, अखबार, पत्रिका वगैरह से भाषा और तथ्यों के तौर पर सही कर के जनता के सामने पहुंचाते हैं.
लेकिन बहुत बार खबरें गलत निकल आती हैं. कई बार तो इतनी ज्यादा कि मीडिया वाले भी गच्चा खा जाते हैं. दुख और हैरत की बात तो यह है कि आजकल जब कोई मुसीबत में घिरता है, तो सोशल मीडिया पर उसे हमदर्दी देने वालों के साथसाथ ट्रोल कर के मजाक बनाने वाले भी कम नहीं होते हैं.
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एक बड़ा ही अजीब मामला देखते हैं. देश के एक नामी खबरिया चैनल एनडीटीवी की पत्रकार रह चुकीं निधि राजदान ने शुक्रवार, 15 जनवरी, 2021 को ट्वीट कर के उन के साथ हुए बेहद गंभीर औनलाइन फर्जीवाड़े का खुलासा किया.
निधि राजदान ने दुखी मन से बताया कि उन्हें हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफैसर पत्रकारिता की पढ़ाई कराने का जो औफर दिया गया था, वह फर्जी निकला. बात इतनी ही नहीं है कि वे फर्जीवाड़े का शिकार हुईं, बल्कि इसी उम्मीद में उन्होंने पिछले साल एनडीटीवी में अपने 21 साल के कैरियर को अलविदा कह दिया था, ताकि वे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में जा कर अपने नए काम को ऐंजौय कर सकें.
निधि राजदान ने ट्विटर पर अपने बयान में कहा, 'मुझे यह यकीन दिलाया गया था कि मैं सितंबर में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाने का काम शुरू करने वाली हूं. लेकिन जब मैं अपनी नई जौब के लिए तैयारी भी कर रही थी तो मुझे बताया गया कि कोरोना की महामारी के चलते कक्षाएं जनवरी में शुरू होंगी.'
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निधि राजदान का कहना है कि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता की पढ़ाई कराने के औफर में हो रही देरी को ले कर कुछ गड़बड़ी का अंदेशा उन्हें हो गया था, लेकिन उन्हें बताया गया था कि प्रशासनिक खामियों के चलते ऐसी देरी हो रही है.
पर बाद में निधि राजदान ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के बड़े अफसरों से संपर्क साधा. तब जा कर इस धोखाधड़ी का खुलासा हुआ कि यूनिवर्सिटी की तरफ से ऐसा कोई औफर लैटर नहीं भेजा गया है.
एक और मामला देखते हैं. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के रहीमनगर की रहने वाली शिवानी वारा ने नौकरी के लिए 'शाइन डौटकौम' पर औनलाइन आवेदन किया था. शिवानी के मोबाइल फोन पर 19 अगस्त, 2020 को एक काल आई, जिस में एक महिला ने खुद को एक नामी बैंक की एचआर मैनेजर होने का दावा किया और शिवानी को अपने बैंक में नौकरी का औफर दिया.
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शिवानी को भरोसे में लेने के बाद उस महिला ने ह्वाट्सएप पर एक लिंक भेजने की बात कही और बताया कि इस के जरीए उन्हें अपना आवेदन करना होगा और रजिस्ट्रेशन के लिए 10 रुपए की मामूली रकम अपने डेबिट या क्रेडिट कार्ड से चुकानी होगी.
शिवानी जब राजी हो गई तब उस महिला ने ह्वाट्सएप पर एक लिंक भेजा, जो असल में फिशिंग लिंक था.
दरअसल, वह महिला एक ठग गिरोह से थी और उस गिरोह ने 2 फर्जी वैबसाइट बना रखी थीं, जिन के जरीए फिशिंग लिंक भेजे जाते थे, जिस के बाद सौफ्टवेयर की मदद से रिमाेट ऐक्सैस हासिल कर ली जाती थी यानी शिकार के क्रेडिट या डेबिट कार्ड से भुगतान करने के दौरान गिरोह बिना उस की जानकारी के उस के खाते से मनचाही रकम निकाल लेते थे.
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यह गिरोह अब तक 700 से ज्यादा लोगों को अपने जाल में फंसा कर करोड़ों रुपए की ठगी कर चुका था. शिवानी ने जब रजिस्ट्रेशन के लिए 10 रुपए की औनलाइन पेमेंट की तो उस के खाते से 1,000 रुपए निकल गए. शिवानी द्वारा शिकायत करने पर गिराेह ने रकम रिफंड करने का झांसा दे कर दोबारा फिशिंग लिंक भेजा और शिवानी के रिफंड की जाने वाली रकम 990 रुपए भरते ही उन के खाते से इस बार 49,000 रुपए निकाल लिए गए. इतना ही नहीं, इस के बाद फिर शिवानी को रकम रिफंड करने का भरोसा दिला कर इसी तरह उन के खाते से एक बार और 49,000 रुपए उड़ा लिए गए.
अपने साथ हुई तिहरी ठगी के बाद शिवानी ने महानगर कोतवाली में घटना की रिपोर्ट दर्ज कराई, जिस के बाद मामले में पुलिस ने गाजियाबाद के आरडीसी राजनगर पर बने देविका चैंबर से दिल्ली के राजीव नगर निवासी सरगना शादाब उर्फ रोहन राठौर, गाजियाबाद निवासी अंकित व महबूब के अलावा 9 महिलाओं को गिरफ्तार किया, जहां सभी आरोपी काल सैंटर के जरीए ठगी कर रहे थे.
इन लोगों के कब्जे से 3 लैपटौप, 19 मोबाइल फोन, 4 एटीएम कार्ड व दूसरे तमाम दस्तावेज बरामद किए गए.
पुलिस के मुताबिक, यह गिरोह ठगी के लिए फर्जी नामपतों पर सिमकार्ड लेता था और ठगी में इस्तेमाल किए गए सिमकार्ड 15 दिन बाद बदल दिए जाते थे. औनलाइन खरीदारी के लिए भी फर्जी नामपतों पर खोले गए खातों का इस्तेमाल किया जाता था.
कुछ इसी तरह फरीदाबाद साइबर सैल ने क्रेडिट कार्ड के पौइंट कैश करने के नाम पर धोखाधड़ी करने वाले एक गिरोह का भंडाफोड़ किया. पकड़े गए 4 लोगों से 60,000 रुपए, मोबाइल फोन, 65 फर्जी सिमकार्ड व अलगअलग बैंकों के डैबिट कार्ड बरामद हुए.
ऐसा आरोप है कि पकड़े गए लोग अपने शिकार क्रेडिट कार्ड होल्डरों को फिशिंग पेज का लिंक भेज कर उन के क्रेडिट कार्ड व ईमेल की जानकारी हासिल कर के खातों से उन की मरजी के बिना पैसे निकाल लेते थे. इतना ही नहीं, पकड़े गए लोगों के बैंक खातों में तकरीबन एक से डेढ़ करोड़ रुपए का ट्रांजैक्शन होने की बात सामने आई और उन्होंने एनसीआर में इस वारदात को अंजाम देना स्वीकारा.
यह है मामला
3 साल पहले की बात है. फरीदाबाद के सैक्टर-3 के सुनील मंडल ने 5 फरवरी, 2018 को पुलिस में सूचना दी कि 2 जनवरी, 2108 को उन के कार्ड से औनलाइन खरीदारी की गई है, जबकि उन्होंने कोई खरीदारी नहीं की थी. उन्होंने अपना डाटा किसी से साझा भी नहीं किया था.
इस शिकायत पर सैक्टर-7 थाना पुलिस ने केस दर्ज कर किया और पुलिस कमिश्नर के निर्देश पर साइबर सैल ने मामले की जांच शुरू कर दी.
साइबर सैल ने तकनीक मदद से 14 व 15 फरवरी, 2018 को विकास झा निवासी रामनगर ऐक्सटैंशन गली नंबर 1, लोनी रोड, शहादरा दिल्ली व अविनाश भारद्वाज निवासी संजय एंक्लेव, उत्तम नगर, दिल्ली को गिरफ्तार किया.
उन दोनों से हुई कड़ी पूछताछ में सामने आया है कि 2 लोग उन्हें फर्जी मोबाइल सिमकार्ड व बैंक खाता मुहैया कराते हैं. इस के बाद पुलिस टीम ने 24 व 25 फरवरी, 2018 को तरुण पाल निवासी सैक्टर-9, विजय नगर, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश व हिमांशु उर्फ सोनू शर्मा निवासी गांव गोकुल महल्ला, थाना महावन, जिला मथुरा को गिरफ्तार किया.
पुलिसिया पूछताछ में पता चला कि ये लोग भारतीय स्टेट बैंक, आरबीएल बैंक व कोटेक महिंद्रा बैंक के क्रेडिट कार्ड होल्डरों को फिशिंग पेज का लिंक भेज कर उन के क्रेडिट कार्ड व ईमेल की जानकारी हासिल कर लेते थे, जिस के बाद फर्जी सिमकार्ड व बैंक खाते दिलाने में आरोपी तरुण पाल व हिमांशु उर्फ सोनू मदद करते थे. जब भी कोई ग्राहक अपने मोबाइल नंबर से आधार लिंक कराने के लिए दुकान पर जाता तो तरुण पाल उस का अंगूठा लगवा कर एक सिमकार्ड चालू करा कर अपने पास रख लेता था, बाद में उस के नंबर को आधार से लिंक करता था. इस के बाद ठगी का पूरा खेल चलता था.
क्या है यह फिशिंग 
सवाल उठता है कि निधि राजदान ने अपने साथ हुई जिस धोखाधड़ी को 'फिशिंग' का नाम दिया है, उस का मतलब क्या होता है? दरअसल, फिशिंग एक तरह की औनलाइन धोखाधड़ी है जिस के जरीए लोगों को अपनी निजी जानकारियां जैसे बैंक की डिटेल या पासवर्ड साझा करने के लिए कहा जाता है.
यह जालसाजी करने वाले लोग अपनेआप को किसी नामी कंपनी का नुमांइदा बताते हैं और अपने शिकार को अपनी बातों के जाल में उलझा कर उन से उन की निजी जानकारियां हासिल कर लेते हैं.
ये लोग अपने शिकार के पास मैसेज भेजते हैं, उन से ईमेल के जरीए संपर्क करते हैं या फिर फोन भी कर सकते हैं. इस से शिकार लोगों को लगता है कि मैसेज, ईमेल या फोन काल उन के ही बैंक या सर्विस देने वाले की तरफ से आया है.
इस फिशिंग के शिकार लोगों को कहा जाता है कि उन्हें अपने बैंक खाते के ऐक्टिवेशन या सिक्योरिटी चैक के लिए कुछ अहम जानकारियां देनी होंगी. ऐसा नहीं करने में शिकार का खाता बंद किया जा सकता है. इस बात से डरे या किसी लालच में आए लोग अपने निजी जानकारी साझा कर देते हैं.
इस के बाद फिशिंग के शिकार को एक फर्जी वैबसाइट पर ले जाया जाता है जो एकदम असली लगती है. उसे उस वैबसाइट में जा कर अपनी निजी जानकारियां देने के लिए कहा जाता है.
जैसे ही शिकार अपनी निजी जानकारी उस में डालता है, साइबर अपराधी उन जानकारियों का इस्तेमाल कर के लूट लेते हैं.
ऐसे करें बचाव
-किसी अनजान जगह से आने वाले फोन, ईमेल और मैसेज से हमेशा सावधान रहें.
-याद रखिए कि बड़ी कंपनियां कभी भी किसी से उस की निजी जानकारी फोन या ईमेल से नहीं मांगती हैं.
-जब कोई आप को किसी लिंक पर क्लिक करने के लिए कहता है तो कभी क्लिक न करें.
-जरा सा भी शक होने पर आप कंपनी को फोन से जानकारी ले सकते हैं. इस के लिए वही फोन नंबर इस्तेमाल करें जो बैंक स्टेटमैंट, फोन बिल या डेबिट कार्ड के पीछे लिखा हो.
-जरा सा शक होने पर पुलिस को जानकारी दें. किसी तरह के लालच में कतई न फंसें.
इस तरह की औनलाइन फिशिंग में कोई आम आदमी किसी तरह के लालच में फंस कर गलती कर के ठगी का शिकार हो सकता है, पर जब किसी खबरिया चैनल का तथाकथित सर्वज्ञानी एंकर भी खुद से जुड़ी जानकारी को चैक करने में गच्चा खा जाए तो सवाल उठना लाजिमी है कि यह लापरवाही क्या कोई खबर देने में भी बरती जाती है?
अगर ऐसा है तो जनता को खबर के रूप में जो जानकारी मिल रही है उस की विश्वसनीयता शक के दायरे में आ जाती है, क्योंकि 'सब चलता है' वाली सोच तो भाषाई पत्रकारिता में ही पहले दिखती थी जो बड़े प्रकाशनों से खबर लेते थे. अब अगर यह इंगलिश पत्रकारिता में भी पैठ बना चुकी है, तो बड़े दुख की बात है.

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