कंप्यूटर, इंटरनैट के इस दौर में भी दलित सिर पर लाद कर मैला ढोएं, सीवेज लाइनों में घुस कर सफाई करें और मरे मवेशियों की चमड़ी उतारें, यह कतई सभ्य समाज की पहचान नहीं है. लेकिन चूंकि यह सब भगवान और धर्म की आड़ में होता आया है, इसलिए कई ऐतिहासिक आंदोलनों के बाद भी दलितों के हालात में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है.

COMMENT