मेरी सहेली ने मेरे लिए जो किया वह मैं सोच भी नहीं सकती. हम कालेज में थे. एक बार कालेज में डांस कंपीटिशन हुआ. हम दोनों ने उस में भाग लिया. मैं उस के साथ कंपीटिशन नहीं करना चाहती थी लेकिन इत्तेफाक से हम दोनों ही फाइनल में पहुंच गईं. हमें एकदूसरे का सामना करना था. मैं जीतना चाहती थी पर जानती थी कि वह मुझ से ज्यादा अच्छा नृत्य करती है. जब कंपीटिशन शुरू हुआ तो उस ने अच्छा नृत्य नहीं किया और अचानक गिर गई. सब देख कर यकीन नहीं कर पा रहे थे कि वह ऐसा डांस कर रही है. मैं आखिरकार जीत गई. मेरी जीत पर खुश होते हुए उस ने कहा, ‘‘मैं हारी नहीं हूं, तू जीत गई है.’’ दरअसल, वह सब उस ने जानबूझ कर किया था. उस की सच्ची दोस्ती मेरे दिल को छू गई.  

दिव्या सिंह, सिरसागंज (उ.प्र.)

बात उस समय की है जब मैं 11वीं कक्षा में पढ़ती थी. मुझे घड़ी पहनने का बहुत शौक था. मेरे दादाजी ने मेरे जन्मदिन पर मुझे घड़ी दी. परंतु वह जाने कहां गुम हो गई. अगर घर का कोई सदस्य मुझ से पूछता, ‘घड़ी कहां है’ तो मैं कहती, ‘मेरी दोस्त इंदू के पास है.’ हमारे दूसरे सत्र के इम्तिहान शुरू होने वाले थे और मेरे पास घड़ी नहीं थी. मैं परेशान थी. फ्रैंडशिप डे पर जब मैं ने अपनी दोस्त इंदू को बैंड बांधा तो उस ने मुझ से आंखें बंद करने को कहा और मेरी कलाई पर घड़ी बांध दी. उसे देख कर मेरी आंखें छलछला पड़ीं. मैं ने उस से कहा, ‘धीरेधीरे रुपए दे दूंगी.’ मेरी बात सुन कर वह बोली, ‘क्या मैं अपनी दोस्त के लिए इतना भी नहीं कर सकती. तेरी दोस्ती तो मेरे लिए रुपए से भी बढ़ कर कीमती है.’ उस की यह बात मेरे मन को छू गई.

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