देश में संचार क्रांति के इस दौर में 2 सरकारी कंपनियों को श्वास लेने में भी दिक्कत हो रही है. इस के ठीक विपरीत निजी क्षेत्र की संचार कंपनियां भारत में संचार क्रांति का लाभ उठा कर स्वयं का अच्छा पोषण कर रही हैं. निजी क्षेत्र की मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियां दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की वाली कहावत को सही साबित कर रही हैं.

परेशान सरकारी क्षेत्र की भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) और महानगर टैलीफोन निगम लिमिटेड (एमटीएनएल) हैं. इन दोनों कंपनियों को अपनी खराब स्थिति का आईना देश में लागू पोर्टेबिलिटी व्यवस्था के दौरान जरूर देखने को मिला होगा लेकिन मोटी तनख्वाह पा कर तोंद फुला रहे इन निगमों के अधिकारी शायद तब भी चैन की नींद सोते रहे. उन के पास बेहतर नीतियां और मजबूत ढांचागत व्यवस्था है लेकिन उन्हें तो जैसे काम ही नहीं करना है. इन दोनों के नैटवर्क उपभोक्ताओं के लिए सिरदर्द हैं और पूछताछ केंद्र पर बैठे पक्की नौकरी वाले कर्मचारी लापरवाह हैं.

निजी क्षेत्र के सेवा प्रदाता सिर्फ कमाई में जुटे हैं. वे उल्टीसीधी कौल के जरिए उपभोक्ताओं को घेरे रहते हैं और उन का पैसा काटने की जुगत में रहते हैं. उन की ग्राहक सेवा सिर्फ कंप्यूटर में फीड है और उन के ग्राहक सेवा केंद्र के कर्मचारी से बात करना उपभोक्ताओं के लिए आसान नहीं होता. वहीं, सरकारी कंपनियां ग्राहक से वाजिब पैसा लेती हैं. नैटसेवा है तो खर्च हुई एमबी का और शेष बची एमबी का विवरण देती हैं. ये ग्राहक को संतुष्ट तो करती हैं लेकिन सेवा परेशान करने वाली हैं. संचार मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने इन दोनों कंपनियों में सुधार लाने का वादा किया है लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट कह दिया है कि उन्हें मदद का रिटर्न चाहिए. रिटर्न तब ही मिलेगा जब डंडा बजेगा. सरकार जिस दिन चाहे इन कंपनियों की हालत सुधार सकती है लेकिन सुधार के लिए उस में इच्छाशक्ति जरूरी है. उम्मीद है कि संचार मंत्री देश की जनता को इन दोनों कंपनियों से लुभावने वादे के साथ ही लुभावनी सेवा भी दिलाएंगे.

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