हर इनसान कला व सिनेमा प्रेमी होता है. सिनेमा यानी फिल्में हर इनसान की कमजोरी हैं. जनता की इस कमजोर नस को नेता भलीभांति समझते हैं. नतीजतन, किसी महत्वपूर्ण कुरसी पर बैठते ही नेताओं का सिनेमा प्रेम कुछ ज्यादा ही तेजी से जागृत हो जाता है और फिर ‘सिनेमा और सिनेमा के माध्यम से संस्कृति’ के विकास के नाम पर जनता के पैसे और उन की श्रम शक्ति का दुरुपयोग करने का तमाशा शुरू करने में देरी नहीं करते हैं.

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