Supreme Court: जमानतें देने में उदारता बरतने वाले सुर्खियों में आ गए हाईकोर्ट के जस्टिस पंकज भाटिया की खिंचाई उसी सुप्रीम कोर्ट ने की जो गाहेबगाहे निचली अदालतों को जमानत देने की नसीहत देता रहता है. इस में कोई शक नहीं कि देश में जमानत आसानी तो क्या मुश्किल से भी नहीं मिलती. नतीजतन, लाखों बेगुनाह जेलों में सड़ते रहते हैं. सुप्रीम कोर्ट के सख्त रवैए से यह संख्या और बढ़ेगी.
‘बेल, नौट जेल’ यानी जमानत नियम है और जेल अपवाद है. यह बात सुप्रीम कोर्ट बीते 39 सालों में न जाने कितनी बार दोहरा चुका है. साल 1977 में राजस्थान राज्य बनाम बालचंद्र उर्फ बालिया मामले में जस्टिस वी आर कृष्ण अय्यर ने इस थ्योरी, जो स्लोगन बन कर रह गई है, को स्थापित किया था. यह मामला आईपीसी की धारा 34 सहित हत्या यानी सब से गंभीर धारा 302 से ताल्लुक रखता हुआ था. आरोपी बालचंद्र और उस के सहयोगियों पर हत्या का आरोप था. निचली अदालत से हाईकोर्ट होता हुआ यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो उस ने उदार रुख अपनाया जो उस वक्त हैरत की बात थी.
जमानत देने में उदारता हालांकि हैरत की बात आज भी है, लेकिन तब तो हालत यह थी कि बड़े से बड़ा नामी क्रिमिनल लौयर भी अपने कैरियर के मद्देनजर आईपीसी की धारा 302 में जमानत की गारंटी नहीं लेता था क्योंकि अदालतें हत्या की इस धारा को ले कर इतनी सख्त थीं कि आरोपपत्र पर ध्यान ही नहीं देती थीं और न ही वकीलों की दलीलों पर गौर करती थीं. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से निचली अदालतों की मानसिकता और जमानत के प्रति कुंठा में तबदील हो चुके पूर्वाग्रह पर कोई खास फर्क न तब पड़ा था और न आज पड़ा है. वे जमानत न देने के अपने अडिय़ल रवैये पर आज भी अड़ी हुई हैं जबकि जस्टिस अय्यर ने साफ किया था कि जमानत देने से इनकार करना एक गंभीर कदम है और इसे केवल विशेष परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए. जमानत देने से न्यायिक प्रक्रिया पर कोई खतरा नहीं होना चाहिए, मसलन-
1 – आरोपी भाग न जाए.
2 – गवाहों को प्रभावित न करे या डराए नहीं.
3 – अपराध दोहराए नहीं.
4 – न्याय की प्रक्रिया में वाधा न बने.
इस के अलावा जस्टिस अय्यर ने ही अगले ही साल यानी 1978 में गुडिकांति नरसिंहुलु मामले में संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए साफतौर पर कहा था कि जमानत से इनकार करना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है. इसलिए इसे एहतियात के साथ वजह बता कर ही करना चाहिए. इसी फैसले ने ‘अनुमानित निर्दोषिता’ पर भी कानूनविदों सहित आम लोगों का भी ध्यान खींचा था कि ट्रायल पूरा होने तक व्यक्ति वेगुनाह माना जाता है इसलिए उसे अनावश्यक रूप से जेल में नहीं रखा जा सकता.
जेलों में बेगुनाह क्यों
फिर तो कभीकभी सुप्रीम कोर्ट इस स्लोगन का इस्तेमाल करते जमानत देने लगी कि जमानत नियम है जबकि जेल अपवाद है. लेकिन इस से निचली अदालतों के कानो पर जूं न रेंगी. वे बदस्तूर जमानत की दरख्वास्तें खारिज करती रहीं. साल 2022 में राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो यानी एनसीआरबी के इन आंकड़ों पर देशभर में हल्ला मचा था कि देश में विचाराधीन कैदियों की संख्या 4,34,302 है यानी इन तथाकथित कैदियों को जमानत नहीं मिली थी या खुद वे पैसों की कमी के चलते नहीं ले पाए थे. इन में से 80 फीसदी अंत में, मरे नहीं तो, छूट जाएंगे, यह पक्का है.
अभी भी हालात ज्यों के त्यों हैं क्योंकि 2025 में यह संख्या बढ़ कर 4,39,000 हो गई. यह कुल कैदियों का लगभग 76 फीसदी हिस्सा था. यानी, जमानत के मामले पर हालात जस के तस थे जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार यह कहते चिंता और खीझ जताई थी कि चूंकि निचली अदालतें जमानत नहीं देती हैं इसलिए ऊपरी अदालतों में मुकदमों की पेंडैंसी बढ़ रही है, जिस से लोगों को समय पर न्याय नहीं मिल पा रहा.
इस से जेलों की हालत मवेशियों के बाड़ों सरीखी होती जा रही है. अधिकतर जेलों में क्षमता से ज्यादा कैदी ठुंसे पड़े हैं. टाटा ट्रस्ट्स द्वारा शुरू की गई आईजेआर (इंडिया जस्टिस रिपोर्ट) की एक रिपोर्ट, जो अप्रैल 2025 में प्रकाशित हुई थी, के मुताबिक अकेले दिल्ली की 16 जेलों में 2020 से 2022 के बीच 250 फीसदी से ज्यादा कैदी रखे गए थे.
अभी भी देशभर की जेलों में लगभग 175 फीसदी कैदी ज्यादा हैं. इस रिपोर्ट में कैदियों की बदहाली का इफरात से जिक्र था जिस में एक गौरतलब बात यह थी कि 775 कैदियों पर एक ही डाक्टर तैनात है जबकि होना 300 कैदियों पर एक डाक्टर होना चाहिए. फिर खानेपीनेरहने वगैरह की हालत का तो सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि सबकुछ उस से कहीं ज्यादा बदतर है जितना कि कैदी बाहर आ कर बताते हैं और जैसा हिंदी फिल्मों में दिखाया जाता है.
इस लंबीचौड़ी रिपोर्ट का किसी पर कोई असर नहीं होता खासतौर से जमानत के अभाव में सजा भुगत रहे बेगुनाहों के मामले में. जेलों में ठुंसे अधिकतर लगभग 90 फीसदी तक कैदी गरीब, मुसलमान और छोटी जाति वाले हिंदू होते हैं जिन का न कोई ऊपर है न कोई नीचे. इन्हें दोनों ही लोकों में नाइंसाफी का शिकार होना पड़ता है. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, 2023 में अनुसूचित जाति यानी एससी के विचाराधीन कैदियों की संख्या लगभग 22 फीसदी, आदिवासियों की 11, ओबीसी की 35 फीसदी और मुसलमानों की लगभग 16 फीसदी थी.
जाति और जमानत
निचली अदालतों के बाहर मंडराते दलालों से पूछ लें या कि खुद वकीलों से, वे इस हकीकत से मुकर नहीं पाते कि जमानत भी अकसर जाति और धर्म देख कर दी जाती है. हुसैन आरा खातून बनाम बिहार राज्य 1979 की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि गरीब लोग इसलिए जेल में हैं क्योंकि वे जमानत की शर्तें पूरी नहीं कर पाते. यह संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन और स्वतंत्रता का उल्लंघन है. ये गरीब आमतौर पर गैरसवर्ण होते हैं जो पैसों की कमी के चलते जेलों में सड़ते रहते हैं.
किसी भी मुकदमे का ट्रायल कब तक पूरा होगा, यह दावे से कोई नहीं कह सकता. कई बार तो 15-15 साल तक ट्रायल पूरा नहीं हो पाता और विचाराधीन कैदी को जमानत के अभाव में पूरी उम्र जेल में गुजारना पड़ती है. इस पर भी सुप्रीम कोर्ट कमैंट करता रहा है. गुजरात के अक्षरधाम हमले के 6 आरोपी 12 साल बाद 2014 में सुप्रीम कोर्ट से बरी हुए थे. अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि जांच में गंभीर खामियां थीं. लेकिन असल खामी तो यह भी है कि जांच में देरी करने वालों या चूकने वालों के लिए किसी सजा का इंतजाम कानून में नहीं है.
हाई कोर्ट भी पीछे नहीं
जमानत न देने के रोग से हाईकोर्ट भी ग्रस्त हैं. इस पर भी जबतब सुप्रीम कोर्ट झल्लाता रहता है. इस का एक अहम और ताजा उदाहरण कानपुर का है जिस में एक मौलवी सैयद शाद काजमी पर आरोप था कि उस ने मानसिक रूप से विकलांग 11 वर्षीय लड़के को जबरन इसलाम कुबूल करवाया. पुलिस ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021 की धारा 3/5 सहित आईपीसी की धाराओं 504 शांति भंग व 506 धमकाना के तहत मामला दर्ज किया.
मौलवी की जमानत याचिका ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दी तो उस ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया. वहां भी याचिका खारिज कर दी गई. इस के बाद उस ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. इस भागमभाग में वह 11 महीने जेल में रहा. सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट्स में जमानत देने का साहस कम होता है लेकिन कम से कम हाईकोर्ट को तो अपने विवेक का इस्तेमाल करते जमानत दे देनी चाहिए थी.
जाहिर है, मामला हत्या डकैती या बलत्कार जैसा गंभीर नहीं था. इस फैसले में भी सुप्रीम कोर्ट ने ‘जमानत नियम है, जेल अपवाद’ का जुमला दोहराया था. ऐसे कई फैसले निचली अदालतों और हाईकोर्ट के लिए भी मैसेज ही हैं कि आप बेखौफ हो कर जमानत दें, जिस से किसी को बिना वजह जेल में न रहना पड़े और उस से भी अहम बात यह कि हमारे पास न आना पड़े. इन फैसलों से कोई और प्रोत्साहित हुआ हो न हो लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस पंकज भाटिया पर वाजिब असर पड़ा.
सुप्रीम कोर्ट के कठघरे में हाईकोर्ट
जस्टिस पंकज भाटिया जमानत देने में दरियादिली को ले कर खासे चर्चा में रहे, मानो उन्होंने कोई संगीन गुनाह कर दिया हो. हालांकि, उन की भूमिका और रवैए पर उंगली उठाने वालों पर भी उंगली नहीं उठाई जा सकती. बीती 9 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे बी परदीवाला और जस्टिस के विश्वनाथन की बैंच ने एक जमानत याचिका खारिज करते हुए उन की इतनी खिंचाई कर डाली थी कि खुद जस्टिस भाटिया को यह कहना पड़ा था कि उन्हें जमानत रोटेशन से बाहर कर दिया जाए.
यह मामला उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती की 24 वर्षीया सुषमा की संदिग्ध मौत का है, जिस की शादी 1 मार्च, 2025 को देवराज उर्फ गोलू से हुई थी. सुषमा की मौत शादी के कोई ढाई महीने बाद ससुराल में ही हुई थी जिस पर उस के पिता चेतराम वर्मा ने भिनगा थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी. चेतराम के आरोप थे कि सुषमा की ससुराल वाले कार की मांग कर रहे थे जिसे ले कर उसे परेशान किया जाता था. बकौल चेतराम, उन्होंने शादी में साढ़े 3 लाख रुपए नकद दिए थे. सुषमा की लाश का पोस्टमार्टम हुआ तो मौत की वजह दम घुटना सामने आई.
फौरीतौर पर इसे दहेज हत्या न मानने की कोई वजह नहीं थी. पुलिस ने आईपीसी की धारा 304 (बी) के तहत मामला दर्ज करते देवराज को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. उम्मीद के मुताबिक, देवराज की जमानत अर्जी ट्रायल कोर्ट से खारिज हो गई. लेकिन उम्मीद से परे अक्तूबर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसे जमानत दे दी. जमानत देने वाले थे इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच के जस्टिस पंकज भाटिया.
इस जमानत पर संविधान के अनुच्छेद 136, जिस में सुप्रीम कोर्ट किसी भी मामले की जांच कर सकता है, का सहारा लेते यानी एतराज जताते हुए चेतराम ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने चेतराम की अपील मंजूर करते और देवराज की जमानत रद्द करते जस्टिस भाटिया को ही अपने घेरे में ले लिया.
गौरतलब है कि जस्टिस भाटिया ने जिन 2 प्रमुख आधारों पर देवराज को जमानत दी थी उन में से पहला यह था कि उस का कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं है और दूसरा यह कि कुछ समय वह अंडरट्रायल के तौर पर जेल काट ही चुका है.
जमानत पर जमानत
यहां कई दलीलें ऐसी जमानतों के हक में दी जा सकती हैं. मसलन, आरोपी को कब तक जेल में रखा जाना चाहिए, क्या ट्रायल पूरा होने तक. बाद में अगर वह बेगुनाह निकले जैसा कि एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक दहेज हत्या के 70 फीसदी मामलों में होता है तो उस के जेल के दिनों का हिसाब कौन देगा और उस के हुए नुकसानों की भरपाई कौन करेगा.
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद से आहत जस्टिस पंकज भाटिया पर मीडिया हाथ धो कर पीछे पड़ गया. जल्द ही कुछ होनहार पत्रकारों ने उन के द्वारा दी गई जमानतों की जन्मकुंडली बना डाली. इस कुंडली के मुताबिक, जस्टिस भाटिया ने अक्तूबर 2025 से ले कर दिसंबर 2025 तक दहेज हत्या के कुल 510 मामलों की सुनवाई की और उन में से 508 में जमानत दे दी. यहां यह गौर किसी ने नहीं किया कि अगर जस्टिस भाटिया ने 75 कार्यदिवसों में 510 दहेज हत्याओं की सुनवाई की यानी एक दिन में लगभग 8 मामले उन्होंने एक ही तरह के सुने तो उन की हालत क्या हुई होगी.
इस दिलचस्प खुलासे में यह भी शामिल था कि जिन 510 मामलों में जमानत दी गई. उन में से 340 की मौत की वजह खुद लगाई फांसी थी, 27 मामलों में जहर, 16 मामले गला घोंटने के, 11 जलने के और 7 मामले गला दबाने के थे जबकि 4 मामलों में नदी या कुए में डूबना मौत की वजहें थीं. 510 में से 362 मामलों में आरोपी पति थे, 68 मामलों में सास, 63 में ससुर और बाकी में अन्य रिश्तेदार आरोपी थे. 6 मामलों में महिलाए प्रैग्नैंट थीं.
कठघरे में सुप्रीम कोर्ट भी
इन 510 आरोपियों ने वाकई कोई गुनाह किया है या नहीं, इस का फैसला भी ट्रायल अदालत में ही होगा लेकिन इस होहल्ले ने दहेज हत्याओं और उस से भी ज्यादा जमानत पर नए सिरे से सोचने व विचारने का मौका दे दिया है. ऐसा नहीं है कि जमानत विवाद को ले कर सिर्फ जस्टिस पंकज भाटिया ही आलोचना के दायरे में आए हों बल्कि सुप्रीम कोर्ट भी कठघरे में खड़ा है कि क्या इस से निचली अदालतों और हाईकोर्ट जजों का मनोबल नहीं गिरेगा, क्या इस तरह की नसीहतें उन की आजादी पर असर नहीं डालेंगी?
दरअसल, खुद सुप्रीम कोर्ट क्या कहना चाह रहा है, यह वह खुद ही नहीं समझ पा रहा. शायद ही नहीं बल्कि तय है कि अपने सुप्रीम अहम के चलते उसे वकीलों की आलोचना का शिकार होना पड़ा. यानी, घोषितअघोषित तौर पर ज्यूडीशियरी 2 गुटों में बंट गई है जो न्याय व्यवस्था के लिए शुभ संकेत तो कतई नहीं है. इस का भी खमियाजा आखिरकार इंसाफ और खासतौर से जमानत मांगने जा रहे आम लोगों को ही भुगतना पड़ेगा. जजों का जमानत के प्रति पहले से ही माइंड सैट रहता है.
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख समझ से परे
कल तक जो सुप्रीम कोर्ट निचली अदालतों को यह मशवरा दे रहा था कि वे जमानत देने में अपने विवेक का इस्तेमाल करें उसी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय ने अपने विवेक का इस्तेमाल किन वजहों के चलते किया. बात कितनी गंभीर रही होगी, इस का एक अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश भी दिया कि उस के फैसले की एक प्रति इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को भी भेजी जाए. यह निर्देश इस बाबत था कि जस्टिस भाटिया के जमानत आदेश पारित करने के तौरतरीकों और मंशा की जांच हो सके.
आत्महत्या कब और क्यों हत्या बने
यह भी कम वजनदार बात नहीं कि ऐसे अधिकतर मामलों में महिला, वजहें कुछ भी हों, खुद ही आत्महत्या करती है. लेकिन स्वाभाविक तौर पर शक पति और ससुराल वालों पर जाता है और मामला दहेज हत्या का ही बनता है. ऐसे में अधिकतर हिंदू परिवार इस डर में जीते हैं कि कहीं बहू शादी के 7 साल तक आत्महत्या न कर ले वरना तो लेने के देने पड़ जाएंगे.
हालांकि एक सच यह भी है कि कई महिलाओं की हत्या दहेजलोभी करते हैं लेकिन कौन सा मामला सच्चा और कौन सा झूठा है, यह फैसला आखिरकार जब होना अदालत से ही है तो जमानत देने में हर्ज क्या. बशर्ते अगर जज को लगता है कि आरोपी न तो भागेगा न गवाहों और साक्ष्यों को प्रभावित करेगा और न ही दूसरा कोई अपराध करेगा.
इलाहाबाद बार एसोसिएशन का रुख
इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने खुल कर कहा कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसी सख्त और कलंकित करने वाली टिप्पणियों से बचना चाहिए क्योंकि ऐसे कमैंट्स से जजों की हिम्मत टूटती है और वे स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में हिचकिचाएंगे. लखनऊ की अवध बार एसोसिएशन ने भी अपनी प्रतिक्रिया देते कहा है कि न्यायिक आदेशों की आलोचना हो सकती है लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर इस तरह की सख्त टिप्पणी ठीक नहीं.
वकीलों और उन के संगठनों का अगर यह डर है तो अपनी जगह वाजिब इस लिहाज से है कि अब जज साहबान जमानत देने में और एहतियात बरतेंगे जिस से इन के पेशे पर फर्क पड़ेगा क्योंकि जमानत से तगड़ी आमदनी वकीलों को होती है. लेकिन सब से बड़ी चिंता बेगुनाहों के जेल में ठुंसे रहने की है जिस में अब और इजाफा होना तय है. Supreme Court




