What is Insomnia: भोपाल की उपनगरी बैरागढ़ की रहने बाली 12बी की 17 वर्षीय छात्रा चेतना शर्मा बीती 7 अक्तूबर की रात कोई ढाई बजे अपने घर की तीसरी मंजिल पर किसी से मोबाइल पर बात कर रही थी कि तभी गिर कर उसकी दुखद मौत हो गई. पुलिस ने आत्महत्या के एंगिल से भी इस हादसे को देखा और फिर मामला आया गया हो गया. पिता दिनेश शर्मा सहित परिजनों ने बताया कि चेतना डिप्रेशन में थी.
मामला कतई उलझा हुआ नहीं है और इशारा यह करता है कि चेतना भी नींद न आने की परेशानी भी झेल रही थी. जो जाहिर है डिप्रेशन की वजह से थी. मुमकिन यह भी है कि डिप्रेशन ही नींद न आने की वजह से हो. एक दौर था जब नींद बूढ़ों को देर से आती है लेकिन अब जेन जी भी इसकी गिरफ्त में आ गई है. इसकी वजह उसकी लाइफ स्टाइल है जो कतई शुभ संकेत देश का भविष्य कही जाने बाली इस पीढ़ी के लिहाज से नही. दिक्कत तो यह है कि इस लाइफस्टाइल की तरह ही इनसोम्निया का कोई कारगर इलाज भी नहीं है
क्या है इनसोम्निया और क्या है इसका इलाज और कोई है भी कि नहीं इससे पहले रिसर्च और आंकड़ों पर नजर डालें तो वे हैरान कर देने बाले हैं कि हर तीसरा आदमी नींद न आने को लेकर परेशान है. `इंटरनेशनल जर्नल आफ रिसर्च इन मेडिकल` साइंस के मुताबिक 25 से लेकर 33 फीसदी तक वयस्क अनिद्रा यानी इनसोम्निया से पीड़ित या परेशान हैं.
इनसोम्निया अब किसी का लिहाज नहीं कर रहा, वजह हर किसी की जिन्दगी जटिल होती जा रही है. कुछ दिन पहले ही मेटा विश्लेष्ण ने बताया था कि लगभग 47 फीसदी छात्र इसकी चपेट में हैं. पढ़ाई और कैरियर के दबाब के अलावा बढ़ता स्क्रीन टाइम इसकी अहम वजहें हैं. एक और रिसर्च में यह खुलासा किया गया था कि पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में यह बीमारी डेढ़ गुना ज्यादा होती है. उम्र के लिहाज से देखें तो 40 से 60 साल के बीच के कोई 45 फीसदी लोग इनसोम्निया से पीड़ित हैं. जॉब का व दूसरे तनाव इसकी बड़ी वजहें हैं लेकिन उम्र के साथ आने बाले शारीरिक बदलाव भी इसमें अहम रोल निभाते हैं.
क्या होता है इनसोम्निया
सिर्फ नींद न आने को इनसोम्निया नहीं कहा जा सकता. बल्कि सही वक्त पर शरीर की जरूरत के मुताबिक नींद न आने को इनसोम्निया कहा जाता है.एपीए यानी अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसियसन ने इसकी परिभाषा कुछ यूँ दी है –
नींद की मात्रा या गुणवत्ता से जुडी एक गंभीर असंतोषजनक स्थिति जिसमे पर्याप्त अवसर होने के बाबजूद व्यक्ति को सोने में कठिनाई होती है. इसे इनसोम्निया तब माना जाता है. जब यह समस्या सप्ताह में कम से कम तीन बार हो या कम से कम तीन महीने से लगातार चल रही हो. और इसकी वजह से व्यक्ति के सामाजिक, व्यवसायिक या दैनिक कामकाज में गंभीर बाधा आ रही हो.
लगभग यही परिभाषा एएएसएम यानी अमेरिकन एकेडमी आफ स्लीप मेडिसन ने कुछ इस तरह दी है, पर्याप्त समय और सोने के लिए अनुकूल माहौल उपलब्ध होने के बाबजूद लगातार नींद शुरू करने, उसे बनाए रखने या उसकी गुणवत्ता में कमी आने की शिकायत होना. जिसके चलते दिन के समय थकान, चिडचिडापन या कार्यक्षमता में गिरावट साफ़ दिखाई देती है.
नींद विशेषज्ञ और एएएसएम व एपीए इनसोम्निया को दो हिस्सों में बांटते हैं. पहली को एक्यूट इनसोम्निया कहा जाता है जो कुछ दिनों या कुछ हफ़्तों के लिए होता है. यानी अस्थाई इनसोम्निया जो अचानक आए किसी तनाव या हादसे की वजह से होता है. मसलन किसी प्रियजन की मौत, इंटरव्यू सहित कोई और असफलता ब्रेकअप बगैरह. एक्यूट इनसोम्निया आमतौर पर तनाव खत्म होते ही ठीक हो जाता है इसमें इलाज की कोई खास जरूरत नहीं पड़ती.
लेकिन हालात अगर अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसियसन द्वारा दी उपर बताई परिभाषा के मुताबिक हो तो इसे क्रानिक इनसोम्निया कहा जाता है जिसमे ट्रीटमेंट की जरूरत पडती है.
इनसोम्निया के लक्षण
1 – सोने में कठिनाई इनसोम्निया का प्रमुख लक्षण है. इसमें व्यक्ति को बिस्तर में जाने के बाद घंटों नींद नहीं आती. वह करवटें बदलते नींद आने का इंतजार करता रहता है.
2 – रात में बार बार नींद टूटना और एक बार टूटकर फिर दोबारा बहुत मुश्किल से आना.
3 – सुबह बहुत जल्द जाग जाना जबकि इसके लिए व्यक्ति अलार्म लगाने जैसी कोशिश नहीं करता. आमतौर पर नींद टूटने का यह वक्त सुबह 3 -4 बजे के लगभग होता है और-
4 – सुबह उठने पर ऐसा महसूस होना कि शरीर को आराम नहीं मिला है. ऐसा इसलिए होता है कि रात की नींद पूरी नहीं होती या फिर हल्की यानी कच्ची और टुकडो टुकड़ों में होती है.
रात में नींद पर्याप्त न होने का असर दिन में भी दिखता है. मसलन दिन भर थकान और सुस्ती महसूस होना, चिडचिडाहट होना, एकाग्रता में कमी होना और नींद की लगातार चिंता करते रहना. सरदर्द व पेट से जुडी समस्याएं भी इससे हो सकती हैं.यह बबेहद असुविधाजनक और तनाव देने बाली स्थितियां होती हैं. जिनका वक्त रहते इलाज न हो तो सामने कई और दुश्वारियां मुंह बाए खड़ी रहती हैं.
लेकिन लाइलाज नहीं
ऐसा नहीं है कि इनसोम्निया का कोई इलाज नहीं है लेकिन यह बहुत आसान भी नहीं है. सच यह भी है कि इनसोम्निया का कोई कारगर या गारंटीड इलाज नहीं है. इलाज पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि यह है किस वजह से. अगर सही वजह पकड या समझ आ जाए तो इलाज मुमकिन है. अगर आप भी इनसोम्निया से पीड़ित हैं तो इलाज के लिए डाक्टर के पास जाने से पहले इसकी सही वजह इनमें से पहचाने यानी खुद डायग्नोस करें-
5 – मानसिक तनाव व चिंता
6 – मानसिक स्वास्थ समस्याए मसलन डिप्रेशन, एन्ग्जाइटी या दूसरी कोई दिमागी बीमारी जो नींद में अडंगा डालती हो.
7 – शारीरिक स्वास्थ समस्याएं जैसे माइग्रेन, जॉइंट पेन, सांस की समस्या जिनमे स्लीप एम्निया प्रमुख है. प्रोस्टेड के मरीजों की नींद भी बार बार पेशाब लगने के चलते टूटती है.
8 – अगर महिला हैं तो हार्मोनल बदलाव से भी इनसोम्निया होना संभव है. प्रिगनेंसी और मेनोपाज के वक्त में नींद न आना आम है.
9 – इन सब से अहम है लाइफ स्टाइल जिसे लेकर हर कोई मानता है कि यह आजकल ऐसी हो गई है कि टाइम पर खाना पीना काम करना उठना बैठना सब मुहाल हो गया है. देर रात गरिष्ठ खाना, चाय, काफी ज्यादा पीना, स्मोकिंग करना भी इनसोम्निया की बड़ी वजहें हैं.
10 – लेकिन सबसे ज्यादा खतरनाक और घातक वह मोबाइल फोन है जिसे लोग सीने से लगाकर सोते हैं. तमाम रिसर्च बताती हैं कि हर वो आदमी जिसके हाथ में यह `इलेक्ट्रानिक हेंड ग्रेनेड` है उसका स्क्रीन टाइम बढ़ता जा रहा है. यह स्क्रीन टाइम नींद का सबसे बड़ा दुश्मन साबित हो रहा है. जिसकी लत चैन से रहने के साथ साथ सोने भी नहीं देती.
अगर इनमे से सही वजह पकड़ आ जाए तो इनसोम्निया ठीक हो सकता है. इसके लिए ये टिप्स ट्राई करके देखें.
11 – सोने और जागने का समय तय करें.
12 – शाम के बाद से ही चाय, काफी, कोल्ड ड्रिंक्स और स्मोकिंग बगैरह को कंट्रोल करें. क्योंकि इनके न्युरोस्टिमुलेंट्स दिमाग को एक्टिव रखते हैं.
13 – डिनर सोने के 4- 5 घंटे पहले लें.
14 – बेडरूम को साफ़ व स्वच्छ रखें. तेज रौशनी नींद को डिस्टर्ब करती है.
15 – और अगर बढ़ता स्क्रीन टाइम चाहे वह मोबाइल का हो, लेपटाप का ही या फिर टीवी का हो इनसोम्निया की वजह है तो इसे कम करें या खत्म ही कर दें. इसकी जगह बेहतर है कि कोई मैगजीन या नाबेल पढ़ें जो दिमाग को रिलेक्स करते हैं. दरअसल में स्क्रीन से निकलने बाली ब्लू लाइट मेलाटोनिंन जिसे स्लीप हार्मोन भी कहते हैं को रोकती है. इन दिनों सोशल मीडिया पर यह तरह तरह से मिनटों में नींद लाने की दवा के नाम से बिक रहा है.
डाक्टर से मिलें
अगर इस सब से भी नींद न आए तो डाक्टर ही आखिरी विकल्प रह जाता है जो आमतौर पर नींद की गोलिया देते हैं. याद रखें कभी खुद अपने मन से स्लीपिंग पिल्स न लें वजह सभी इनसोम्निया के लिए नहीं होती हैं. रिसर्च के मुताबिक जेड ड्रग्स जिनमे ज़ोल्पिडेम होता है इनसोम्निया के लिए कारगर रहता है लेकिन तभी जब डाक्टर इसे लिखे.
इनसोम्निया से पीड़ित अधिकतर लोग मन से नींद की गोलियां लेना शुरू कर देते हैं जिनसे 2-4 दिन तो कामचलाऊ नींद आ जाती है. लेकिन कुछ दिन बाद ही ये असर नहीं करतीं, उलटे सुस्ती, आलस और उनींदापन गिफ्ट कर देती हैं जिनसे बीमारी और बढ़ती जाती है.
अगर कोई मानसिक या उपर बताई गईं शारीरिक बीमारी है तो बिना डाक्टरी सलाह के इलाज असंभव हो जाता है. डिप्रेशन जैसी हालत में तो नींद की गोलियां भी ज्यादा कारगर नहीं होती. सिर्फ डाक्टर ही सही दवाएं और मार्गदर्शन दे सकता है. याद यह भी रखना चाहिए कि इनसोम्निया कोई रातों रात ठीक होने बाली बीमारी नहीं है इसे पूरी तरह ठीक होने में महीनों भी लग सकते है.
असमान्य नहीं है घबराएँ नहीं
इनसोम्निया के मरीज रात को बिस्तर पर जाने से भी यह सोचते डरने और घबराने लगते हैं कि जब नींद आना ही नहीं है, करवटें ही बदलना है तो बिस्तर पर जाने से क्या फायदा. इस डर के चलते वे या तो फिर से मोबाइल स्क्रीन में खुद को व्यस्त कर लेते हैं. या फिर चाय, काफी, सिगरेट और कोल्ड ड्रिंक्स लेने लगते हैं जिससे नींद और भागती है.
बिलाशक इनसोम्निया एक असमान्यता है लेकिन इसे और असमान्य इससे पीड़ित ही बना लेते हैं. जबकि उपर बताई टिप्स पर अमल किया जाए तो देर से ही सही नतीजे मिलेंगे जरुर. इसलिए यह सोचते रहना कि मुझे नींद ही नहीं आती इसलिए मैं किसी काम का नहीं रह गया एक नई दिक्कत बाली बात है. इससे बचना चाहिए. दुनिया भर की विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियाँ इनसोम्निया की गिरफ्त में रही हैं और कई तो अभी भी हैं. लेकिन कामयाब इसलिए हैं कि इनसोम्निया को वे अपने व्यक्तित्व और काम पर हावी नहीं होने देतीं.
इन हस्तियों में महात्मा गाँधी भी शामिल हैं और अमिताभ बच्चन सहित सलमान और शाहरुख़ खान भी हैं. प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी भी स्वीकार चुके हैं कि वे महज चार घंटे ही सो पाते हैं जो इसोम्निया ही है. उनके डाक्टर उन्हें और ज्यादा सोने की सलाह दे चुके हैं.
इसलिए नींद न आने का तनाव अलग से न पालें. यदि बिस्तर पर जाने के आधा घंटे बाद भी नींद न आए तो बिस्तर छोड़कर कुछ पढ़ना लिखना शुरू कर दें. जब दिमाग रिलेक्स होने लगे तब ही बिस्तर पर जाए. लेकिन इस दौरान स्क्रीन से दूर रहे और अगर न रह सकते हों तो खुद ही इनसोम्निया नाम के इस श्राप की जिम्मेदारी लेने तैयार रहें. What is Insomnia
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