Hindi Stories: ‘‘शिवानी, मैं मार्केट जा रहा हूं,’’ अजय तैयार होते हुए बोले, ‘‘क्या कुछ लाना है मार्केट से?’’

‘‘मैं इस समय रसोई में व्यस्त हूं,’’ शिवानी रसोई में से हाथ पोंछते बाहर आई, ‘‘सामान की लिस्ट बना कर मैं ने पहले ही टेबल पर रख दी है. उसी के अनुसार सामान लाना है.’’

अजय ने टेबल पर से सामान की लिस्ट उठा ली. अचानक जैसे उन्हें कुछ खयाल आया. वे टेबल पर कुछ खोजने लगे. जेब में हाथ डाला.

दराजों को जल्दीजल्दी खोलतेबंद करते देख शिवानी उन की परेशानी भांप कर बोली, ‘‘क्या कुछ ढूंढ़ रहे हैं, कुछ खो गया क्या?’’

‘‘मैं ने आज ही बैंक से 10 हजार रुपए निकाले थे. एकएक हजार के पूरे 10 नोट थे,’’ वे शीघ्रतापूर्वक बोले, ‘‘कपड़े बदलते वक्त मैं ने उन्हें टेबल पर रख दिया था. अब देखता हूं रुपए वहां नहीं हैं.’’

‘‘इतने सारे रुपए आप को इस तरह खुले में रखने की क्या जरूरत थी. जानते हैं कि समय ठीक नहीं है. इतने सारे रुपए देख किसी की भी नीयत बदलते देर नहीं लगेगी.’’

‘‘तो क्या आदमी, वह भी पुलिस महकमे का आदमी, अपने ही घर में सुरक्षित नहीं है, जो उस के घर में ही दिनदहाड़े चोरी हो जाए?’’

‘‘अब मु झ से क्या पूछ रहे हैं…रोजरोज टीवी देख रहे हैं, अखबार पढ़ रहे हैं. आप खुद अंदाजा लगा लें कि जमाना कैसा आ गया है.’’

‘‘मु झे घर आए घंटा भर भी नहीं हुआ है. पता करो कि इस बीच घर में कौनकौन आया था,’’ अजय कुढ़ कर बोले, ‘‘पुलिस विभाग के एक डीएसपी के घर दिनदहाड़े चोरी हो जाए, यह कितनी विचित्र बात है.’’

‘‘जहां तक मु झे याद है सुबह से बाहर का कोई आदमी नहीं आया,’’ शिवानी अचानक पलट कर बोली, ‘‘ऐसा भी तो हो सकता है कि रुपए बाहर गिरगिरा गए हों.’’

‘‘मैं ने अपने पूरे होश में रुपयों को यहीं रखा था,’’ अजय  झल्ला कर बोले, ‘‘और तुम उलटी बात कर रही हो.’’

उन के चीखने से शिवानी घबरा गई. ‘पति है तो क्या हुआ आखिर है तो पुलिस का आदमी’, उस ने मन में विचार किया. फिर स्थिर हो कर बोली, ‘‘शांताबाई कह रही थी कि उसे अपने घर का छप्पर ठीक कराना है, क्योंकि बारिश में वह चूने लगता है. छप्पर ठीक कराने में हजारों लगते हैं.’’

‘‘अभी यह बताने का क्या मतलब है?’’

‘‘मतलब है, तभी तो बता रही हूं. उसे रुपयों की जरूरत थी. उस ने रुपए देखे हों और चुपचाप रख लिए हों.’’

‘‘बात तो ठीक है मगर अब शांताबाई  कहां मिलेगी?’’

शिवानी फटाफट उन जगहों पर फोन खटखटाने लगी जहांजहां वह काम करती थी.

थोड़ी देर बाद ही भागीहांफती शांताबाई आ पहुंची, ‘‘क्या हुआ, मेमसाब, क्यों बुलाया है मु झे?’’

‘‘बात यह है शांताबाई कि साहब ने

10 हजार रुपए बैंक से निकाले थे. वे इन्होंने इस टेबल पर रखे थे. वह रुपए तुम ने देखे हैं क्या? हो सकता है कहीं तुम ने उठा कर रख दिए हों?’’

‘‘क्या बात बोलती हैं मेमसाब,’’ शांताबाई का मुंह एकदम से सूख गया, ‘‘मैं इस पुलिस लाइन में दसियों साल से काम करती आ रही हूं. मगर मजाल है किसी ने मु झ पर एक पैसा छूने का भी आरोप लगाया हो.’’

‘‘देखो शांताबाई, मैं कोई आरोप नहीं लगा रही,’’ शिवानी शांत स्वर में बोली, ‘‘तुम ने मु झे बताया था कि ़तुम्हें छप्पर ठीक कराने के लिए ज्यादा रुपए चाहिए. तो मैं ने सोचा कि तुम ने रुपए देखे हों और कहीं रख दिए हों, कभीकभी ऐसा हो जाता है.’’

‘‘आप को मु झ से काम नहीं कराना तो साफसाफ बोल दो. मगर मु झ पर चोरी का इलजाम तो मत लगाओ, मेमसाब. चाहो तो मेरी और मेरे घर की भी तलाशी करवा लो,’’ शांताबाई बोल रही थी. उस की आवाज से उस की नाराजगी साफ  झलक रही थी. वह आगे बोली, ‘‘मु झे काम की कमी थोड़े ही है. इसी पुलिस लाइन में दसियों घर हैं, जहां मैं चाहूं तो आज ही से काम शुरू कर दूं.’’

‘‘मैं चोरी का इलजाम नहीं लगा रही,’’ शिवानी सफाई देते हुए बोली, ‘‘आखिर पूरे 10 हजार रुपए थे. इतने सारे रुपयों के खो जाने से कोई भी परेशान होगा. मगर अब तुम्हीं सोचो कि ये रुपए गए कहां?’’

‘‘देखो मेमसाब, पियक्कड़ों का कोई भरोसा नहीं होता. मेरा मरद पीता है

तो क्या हुआ, मैं उसे अच्छी तरह से जानती हूं.’’

‘‘मगर वह तो इधर कभी आया नहीं,’’ शिवानी के सामने अब नई गुत्थी थी, ‘‘फिर तुम उस की बात क्यों कर रही हो?’’

‘‘मैं उस की नहीं, पियक्कड़ों की बात कर रही हूं. आप का दूध वाला उन में से एक है.’’

शांताबाई ने एक इशारा कर अपने घर की राह ली. शिवानी ने अपने पति की ओर देखा. अजय बोले, ‘‘बिलकुल ठीक कहती है शांताबाई. वास्तव में इन का कोई भरोसा नहीं होता. दूध वाले को बुलाओ, मु झे अब याद आया कि मेरे आने के कुछ देर बाद ही वह यहां दूध देने पहुंचा था.’’

शिवानी एक बार फिर फोन खटखटाने लगी थी.

थोड़ी ही देर में दूध वाला रामू हाजिर हो गया.

‘‘रामू, तुम ने एक दिन बताया था कि तुम्हें एक नई गाय खरीदनी है. एक अच्छी गाय कितने में आती होगी?’’ अजय उस के आते ही शुरू हो गए, ‘‘तो तुम ने गाय खरीद ली क्या?’’

‘‘कहां सरकार, एक नई जर्सी गाय कम से कम 10 हजार रुपए से नीचे नहीं मिलती,’’ वह खीसें निपोर कर बोला, ‘‘अभी खरीदी नहीं मगर जल्द ही खरीद लूंगा. रुपयों का इंतजाम हो गया है.’’

‘‘कहां से इंतजाम हुआ है?’’

‘‘बस, इधरउधर से हो गया है,’’ रामू असमंजस का भाव लिए हुए अचानक पूछ बैठा, ‘‘मगर आप ने मु झे क्यों बुलाया है?’’

‘‘देखो, आज तुम दूध देने आए थे तो उस के थोड़ी देर पहले ही मैं ने टेबल पर 10 हजार रुपए रखे थे. और अब मैं सम झ गया हूं कि तुम ने ही वे रुपए उठाए हैं. वे रुपए तुम मु झे चुपचाप वापस कर दो, ताकि मु झे पुलिस तकनीक का इस्तेमाल न करना पड़े,’’ अजय अपने पुलिसिया तेवर दिखाते हुए बोले, ‘‘मैं किसी से कुछ कहूंगा नहीं. आखिर इंसान से गलती हो ही जाती है. मगर उसे मान लेने में कोई बुराई नहीं है.’’

रामू एकदम से सन्न रह गया. काटो तो खून नहीं  वाली हालत थी उस की. वह कातर निगाहों से अजय और शिवानी को देखते हुए बोला, ‘‘दसियों साल से मैं इस पुलिस लाइन में दूध देता आ रहा हूं.  मगर आज तक मैं ने बिना पूछे किसी का रुपया तक नहीं लिया है.’’

‘‘मैं तुम पियक्कड़ों को अच्छी तरह से जानता हूं,’’ अजय उसे घुड़कते हुए बोले, ‘‘ज्यादा सफाई मत दो और बताओ कि रुपए कहां रखे हैं? आखिर गाय खरीदने के लिए 10 हजार रुपए तुम्हारे पास एकाएक कहां से आ गए?’’

‘‘ओह, तो अब मैं सम झा कि आप मु झ पर क्यों संदेह कर रहे हैं,’’ वह सहज होते हुए बोला, ‘‘15 नंबर वाले बंगले में जो नएनए थानेदार साहब रामलखन बाबू आए हैं न, उन को एक बछड़ा खरीदना था. सो मैं ने उन से अपने एक बछड़े को 3 हजार में बेचने की बात तय की है. बाकी 2 हजार का इंतजाम मैं अगले माह दूध बेचने से मिलने वाले रुपयों से करता. बाकी 5 हजार मैं किस्तों में देने वाला था.’’

थोड़ी देर सांस रोक कर वह फिर बोला, ‘‘रहा सवाल पीने का तो आप का ड्राइवर भी तो पीता है और जुआ भी खेलता है. आप उस से पूछ लीजिए और मु झे जाने दीजिए, मु झे अपने मवेशियों को चारापानी देना है.’’

शक की सूई अब ड्राइवर की तरफ घूम गई थी. कुछ ऐसा संयोग हुआ था कि उन का ड्राइवर सरकारी जीप ले कर एक जरूरी काम कह कर अपने घर गया था. ‘अब घर बैठे काम नहीं चलेगा’ अजय ने मन में विचार किया और अपनी बाइक निकाल उस के घर चले गए. वे देख कर हैरान रह गए कि उस के तीनों बेटेबेटियां उस सरकारी गाड़ी में बैठ कर विद्यालय जाने को तैयार थे. उन्हें देखते ही ड्राइवर की घिग्घी बंध गई, ‘‘वह क्या है साहब कि आज बच्चों को थोड़ी देर हो गई थी, इसलिए मजबूरीवश बच्चों को गाड़ी से ही विद्यालय छोड़ने जा रहा था.’’

‘‘यह तो तुम्हारा रोज का काम है,’’ उस के पड़ोस में रहने वाला कौंस्टेबल रामदयाल बोला, ‘‘आज पकड़े गए तो बहाने बना रहे हो.’’

‘‘तुम चुप रहो,’’ ड्राइवर ने उसे घुड़का, ‘‘चला आता है दूसरे के फटे में टांग अड़ाने.’’

अजय अपनी बाइक वापस मोड़ते हुए बोले, ‘‘तुम शीघ्र मेरे घर पहुंचो, एक जरूरी बात है.’’

आधे घंटे बाद ही वे अपने ड्राइवर से मुखातिब थे, ‘‘हरिनारायण, जरा अंदर तो आना.’’

ड्राइवर हरिनारायण अंदर आया तो वे उस से सीधेसीधे पूछ बैठे, ‘‘मैं ने तुम्हारे सामने ही बैंक से 10 हजार रुपए निकाले थे. एकएक हजार रुपए के नोट थे. मैं ने उन्हें इसी टेबल पर रखा था. वे गए कहां?’’

‘‘अब मु झे क्या पता साहब कि वे गए कहां,’’ हरिनारायण हंस कर बोला, ‘‘आप ने उन्हें कहीं और रख दिया होगा.’’

‘‘अब मैं उन्हें और कहां रखने लगा,’’ अजय  झल्ला कर बोले, ‘‘कहीं तुम ने तो नहीं रख लिए?’’

‘‘तो आप मेरी खानातलाशी ले लीजिए,’’ वह तपाक से बोला, आखिर वह अदना सा ड्राइवर ही सही, मगर पुलिस विभाग का आदमी ठहरा, ‘‘मैं जानता हूं कि आप मेरे बच्चों के सरकारी गाड़ी से छोड़े जाने से नाराज हैं. मगर कौन है जो सरकारी गाड़ी का उपयोग अपने व्यक्तिगत काम के लिए नहीं करता. वैसे सुबह से आप के साथ हूं. कहीं आयागया नहीं, जो मैं रुपयों को कहीं छिपा कर रख दूंगा. लेकिन मैं आप को बता दूं कि मैं ऐसी ओछी हरकतें करने वाला नहीं हूं. पुलिस विभाग की ड्राइवरी करते 12 वर्ष बीत गए. मेरी ईमानदारी और सचाई की अनेक कहानियां हैं. आप लोग खुद कई बार पर्सबैग वगैरह गाड़ी में भूल जाते हैं, जिन्हें मैं खुद आप लोगों को दे देता हूं.

‘‘कभी पाया है आप ने कि उस में से एकाध सामान अथवा एक रुपया भी गायब हुआ हो. आप को  आरोप

लगाने से पहले इस संबंध में सोचना चाहिए था.’’

‘‘मैं आरोप नहीं लगा रहा हूं, हरिनारायण भाई,’’ अजय उसे पुचकारते हुए बोले, ‘‘ मैं तो बस पूछ भर रहा हूं. अच्छा, तो तुम ही बताओ कि यदि तुम्हारे 10 हजार रुपए गुम जाते तो तुम क्या करते?’’

उन के इस सवाल पर वह नरम पड़ा. सो, वह अपनी आवाज में मिठास घोलते हुए बोला, ‘‘आप की बात सही है. अभी मैं ने माली भूलन से बात की थी. वह अपनी मां की बीमारी के बारे में बता रहा था. वह किसी औपरेशन की बात कर रहा था, जिस में 10 हजार तक लग सकते हैं.’’

‘‘ठीक है, तुम जाओ और भूलन को भेज दो.’’

रुपए गुम होने की बात सुनते ही वह रो पड़ा, ‘‘एक तरफ मेरी मां बीमारी में पड़ी है दूसरी तरफ मु झ पर इलजाम लग रहा है. गरीब होने का यही तो दुख है कि सब़कुछ सहना ही सहना है और चुप रहना है. मैं तो कहीं का नहीं रहा. एक तरह से यह अच्छा ही है कि रोजरोज मां की तकलीफ देखने के बजाय मैं हवालात में बंद रहूं. वैसे साहबजी, मैं ने आज तक आप के बंगले की देहरी नहीं लांघी, तो फिर आप के रुपए कैसे ले लेता?’’

शिवानी शून्य में देख रही थी. अजय असमंजस में थे कि कहें क्या, करें क्या? जब किसी को देखा नहीं, तो आरोप लगाना क्या उचित है? वे स्वयं से सवाल कर रहे थे. त्योहार करीब था, इसलिए उन्होंने विचार किया था कि पूरे परिवार के कपड़े बनवाएंगे. त्योहार के वक्त उन्हें सब के साथ गांव भी जाना था. लंबा अरसा हो गया है उन्हें गांव गए हुए. मगर अब क्या होगा? खाली हाथ गांव जाना शोभा देगा क्या, घर वाले क्या सोचेंगे? मगर फिर भी सवाल था कि आखिर रुपए गए तो गए कहां?

एक पुलिस उच्चाधिकारी के घर पुलिस तहकीकात करे, यह कुछ जमता नहीं था. अजय काफी हताश थे. अब वे खुद को एक आम जनता की हैसियत से देख रहे थे, जिस के 10 हजार रुपए चोरी हो गए हों और वह कुछ कर नहीं पा रहा हो. क्या बीतती होगी उन लोगों पर, जिन की गाढ़े पसीने की कमाई यों ही गायब हो जाती होगी.

महीने का पहला सप्ताह चल रहा है और सब की देनदारी भी बाकी है. क्या सोचेंगे लोग कि आखिर यह भी पुलिस वाला निकला, जो सब के पैसे हजम करना चाहता है. इस के लिए तो पुलिस विभाग पहले से ही बदनाम है. ऐसे ही सोचविचार करते समय निकला जा रहा था. और वह इस चक्कर में न बाजार जा पाए और न ही कार्यालय. अचानक फोन की घंटी बजते उन्होंने रिसीवर उठाया. दूसरी तरफ आरक्षी अधीक्षक उमाकांत थे. वे तुरंत अटैंशन की मुद्र्रा में आ गए.

‘‘सुनो अजय,’’ एसपी उमाकांत उधर से बोल रहे थे, ‘‘तुम उधर मार्केटिंग के लिए निकलने वाले थे न. तो लगेहाथ एक तहकीकात भी कर लेना. वहां बालाजी ब्रदर्स नामक कोई कपड़ों की दुकान है. उस के मालिक महेंद्र प्रसाद ने रिपोर्ट लिखाई थी कि उस के 10 हजार रुपए चोरी चले गए हैं. उस का संदेह अपने ही एक नौकर पर है, जिस का नाम शायद श्यामू है. 14-15 साल का लड़का है वह और उसे पुलिस ने पकड़ कर हवालात में बंद कर दिया है. उस की मां मेरे पास आई थी, बहुत रो रही थी और फरियाद कर रही थी कि उस का बेटा निर्दोष है. तुम सच झूठ की जांच कर शाम को रिपार्ट देना.’’

वे यस सर, यस सर कहते रह गए. ‘अपने रुपयों का तो पता चला नहीं, अब दूसरों के रुपयों का पता करो,’ उन्होंने  झल्लाते हुए रिसीवर रख दिया. वे अपनी शिकायत करें तो किस से. एसपी साहब सोचेंगे कि जो अपने रुपयों की तलाश नहीं कर पाया, वह भला दूसरे की क्या करेगा, मगर ड्यूटी थी, सो बजानी ही थी. सो वे वरदी पहनने लगे. उस के बाद वे घर से निकल पड़े.

पुलिस बल को देख कर बाजार में सनसनी सी फैल गई थी. बालाजी ब्रदर्स दुकान का मालिक उस के सामने हाथ जोड़े खड़ा था. एक सिपाही को भेज कर अजय ने हवालात में बंद नौकर श्यामू को बुलवाया. 14-15 साल का मरगिल्ला सा एक किशोर उस के सामने थरथर कांप रहा था. उस के चेहरेमोहरे को देख कर ही लगता था कि उस की अच्छी धुनाई हुई है.

‘‘मैं ने रुपए नहीं लिए साहब,’’ वह रोते हुए कह रहा था,  ‘‘मु झे बचा लीजिए साहब. ये लोग मु झे मार डालेंगे मैं मर जाऊंगा.’’

‘‘तो वे 10 हजार रुपए आकाश में उड़ गए क्या,’’ दुकान का मालिक महेंद्र प्रसाद चिल्लाया,  ‘‘तुम्हारे सामने ही तो मैं ने अपनी जेब में रुपए रखे थे.’’

‘‘इस का मतलब यह थोड़े ही हुआ कि मैं ने रुपए ले लिए?’’

‘‘महेंद्र प्रसादजी, आप उस वक्त जो कपड़े पहने हुए थे वे ले आइए,’’ अजय बोले,  ‘‘उन्हें देख कर शायद किसी को कुछ याद आए.’’

दुकान के पीछे घर था. महेंद्र प्रसाद

तत्काल कमीजपैंट उठा लाए. उन्हें

देखते ही श्यामू चिल्लाया,  ‘‘उस वक्त आप ये नहीं, कुरतापायजामा पहने हुए थे. अब मु झे याद आया कि आप ने रुपयों को कुरते की अंदर वाली जेब में रखा था.’’

‘‘क्या बेवकूफों वाली बात करता है. मैं इतनी बड़ी रकम कुरते की जेब में क्यों रखने लगा?’’

‘‘वह जो कह रहा है, वह करिए तो सही,’’ अजय उसे गंभीर दृष्टि से देखते हुए बोले,  ‘‘चलिए, आप मेरे साथ अंदर चलिए. मैं भी आप की खोजबीन में मदद करता हूं. आप जो कुरतापायजामा पहनते हैं, उसे मैं वहीं देखता हूं.’’

वे महेंद्र प्रसाद के साथ घर के अंदर उस के कमरे में चले गए. महेंद्र प्रसाद के कमरे में अच्छा बड़ा वार्डरोब था, जिस में अनेक कपड़े हैंगर में करीने से सजे हुए थे. उन में से कुरतेपायजामे के सैट को अजय ने बाहर निकाल उस की जेब में हाथ डाला. उस में कुछ अच्छे किस्म के कागजात थे, जिन्हें उन्होंने रुपए सम झ कर बाहर निकाल लिया. वे दरअसल किसी के प्रेमपत्र थे, जिन्हें देख कर महेंद्र प्रसाद शर्म से गड़ गया और लगभग उन से यह कहते हुए छीन लिए कि ये उस के व्यक्तिगत पत्र हैं.

‘‘ये पत्र नहीं, प्रेमपत्र हैं,’’ उस की पत्नी उन पत्रों को देख आगबबूला हो कर उस से छीन कर टुकड़ेटुकड़े करती हुई बोली, ‘‘आखिर तुम अपनी ओछी हरकतों से बाज नहीं आओगे. वह चुड़ैल तुम्हें फिर से पत्र लिखने लगी है. क्यों न लिखे वह आखिर, उसे जवाब तो देना ही था तुम्हारा.’’

‘‘अब मेरा मुंह मत खुलवाओ,’’ महेंद्र प्रसाद को कोई जवाब नहीं सू झ रहा था. उस ने क्या सोचा था और क्या निकला. सो वार्डरोब में से ही एक  झुमके का जोड़ा निकाल अपनी पत्नी को दिखा कर  झल्लाता हुआ बोला, ‘‘बहुत सतीसावित्री बनती हो न तुम. तुम भाभी के यही  झुमके चुरा कर मेरे वार्डरोब में रख गई थीं. अगर मैं सब को बता दूं तो तुम कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगी.’’

यह एक नई गुत्थी थी. उस की पत्नी तेजी से वहां से चल दी. अचानक श्यामू ने वार्डरोब में से एक गुलाबी रंग का कुरतापायजामा निकाला और फिर उस के अंदर वाली जेब में हाथ डाला. अब उस के हाथ में हजारहजार के 10 नोट थे. और थी चेहरे पर चमक. वह सुबकते हुए कहने लगा, ‘‘उस दिन सेठजी ने यही कपड़े पहने थे. मैं बता रहा था न कि मैं ने रुपए नहीं लिए, मगर आप लोगों ने मेरी एक न सुनी. आप ने देख लिया न साहब, कि मैं निर्दोष हूं. मु झ पर नाहक मार पड़ी और मु झे चोर बना दिया गया.’’

‘‘मु झे दुख है कि आप को मेरे कारण परेशानी उठानी पड़ी,’’ अब उन के सामने महेंद्र प्रसाद हाथ जोड़े खड़ा था, ‘‘मैं अपने किए पर शर्मिंदा हूं कि मैं ने जल्दबाजी कर अपने ही आदमी पर संदेह किया. अब आप जो कहें, वह मैं करूंगा. मैं आप से वादा करता हूं कि आगे से ऐसी गलती नहीं करूंगा. मैं आप से माफी मांगता हूं.’’

‘‘मु झ से नहीं, अपने नौकर श्यामू से माफी मांगो,’’ अजय नाराजगीभरे स्वर में बोले,  ‘‘बिना मतलब सब को परेशान तो किया ही, एक निर्दोष को बदनाम भी कर दिया. तुम हरजाने के तौर पर उसे कुछ दे देना.’’

महेंद्र प्रसाद ने 1 हजार रुपए का एक नोट श्यामू को पकड़ाना चाहा मगर वह उस से बिना कुछ लिए सुबकते हुए वहां से चला गया.

‘‘तुम उस के घर जाओगे और उस की मां से माफी मांगोगे,’’ उन्होंने महेंद्र प्रसाद को आदेश सा दिया, ‘‘महल्ले में नाहक उन लोगों की बदनामी हुई होगी, जिसे खत्म करना तुम्हारा काम है. और हां, रुपए भी उसे ही पकड़ा देना.’’

घर वापस आ कर उन्होंने सर्वप्रथम फोन पर ही एसपी साहब को सारे वाकये की जानकारी दी. एसपी साहब उधर से ‘वैरी गुड वैरी गुड’

कहते रहे.

‘‘दूसरे के रुपयों का तो पता चल गया मगर अपने रुपयों का पता नहीं चल पाया,’’ अजय चाय का प्याला पकड़ते हुए शिवानी से बोले, ‘‘क्या अजीब

बात है.’’

‘‘कहीं ऐसा तो नहीं कि आप भी ठीक से याद नहीं कर पा रहे हों कि आप ने कौन से कपड़े पहन रखे थे,’’ शिवानी बोली, ‘‘आप फिर से अपने कपड़ों को देखिए.’’

‘‘अच्छा मजाक है,’’ वे  झुं झला कर बोले, ‘‘मैं ने अपने होश में वही पैंटशर्ट पहन रखी थी.’’

‘‘तो फिर यह क्या है,’’ शिवानी उन की उतारी हुई वरदी की जेब में से हाथ निकालते हुए बोली. उस के हाथ में एकएक हजार रुपए के 10 नोट लहरा रहे थे. ये वही नोट थे जो थोड़ी देर पहले गुम हुए बताए जा रहे थे. Hindi Stories

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