Udta Teer Film Story: हिंदी सिनेमा में ‘पठान’, ‘टाइगर’, ‘कबीर’ व ‘हमजा’ के बाद एक नया जासूस बिलाल अहमद आया है. इस बार प्लौट अलग है, जासूस पाकिस्तानी है और यह हंसाता है. ‘उड़ता तीर’ का यह जासूस बाकी जासूसों से खतरनाक है क्योंकि यह अपने ही देश पाकिस्तान के लिए खतरा बन गया है. इसे खुद नहीं पता कि वह किस तरफ है.

निर्देशक आकाश ए कौशिक की फिल्म ‘उड़ता तीर’ में एक ऐसा स्पाई दिखाया गया है जो अपनी आइडैंटिटी ही भूल चुका है, खुद को भारतीय जासूस मान कर चल रहा है. फिल्म का यह प्लौट ‘धुरंधर’ का रिवर्स है मगर कौमिक अंदाज में.

कहानी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के ट्रेंड एजेंट बिलाल अहमद (आयुष्मान खुराना) से शुरू होती है. बिलाल को भारत में एक बड़े आतंकी नैटवर्क को एक्टिवेट करने का मिशन दे कर भेजा जाता है. अपनी पहचान छिपाने के लिए वह हिंदुस्तान में एक पुलिस अफसर बन कर रहने लगता है. तभी एक दिन भारतीय काउंटर टैररिज्म के हैड (राहुल बोस) को उस की असलियत पता चल जाती है. चलती कार में दोनों के बीच जबरदस्त हाथापाई होती है और एक भयानक ऐक्सिडैंट हो जाता है. हादसे में बिलाल की याददाश्त चली जाती है. अब उसे लगता है कि वह सच्चा हिंदुस्तानी पुलिस अफसर है.

यहीं से पूरी कहानी पलटती है. जो आदमी भारत में तबाही मचाने आया था, वही अब देशभक्ति के तराने गाते हुए अपने ही साथियों को पकड़ने में जुट जाता है. उधर पाकिस्तान में बैठे उस के बौस (गुलशन ग्रोवर) यह समझ ही नहीं पा रहा कि उस का सब से घातक हथियार अचानक भारत के पक्ष में उलटा क्यों चलने लगा है. पूरी फिल्म इसी कंफ्यूजन पर टिकी है कि बिलाल खुद को ढूंढ़ रहा है, जबकि वह खुद ही बिलाल है.

एक बात यह समझने लायक है कि स्पाई जौनर फिल्मों का स्पूफ बनाना आसान काम होता है, मगर इस में खतरा यह होता है कि कोई मजाक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से विवाद में न आ जाए. निर्देशक आकाश कौशिक ने यहां अच्छी कोशिश की है. फिल्म शुरुआत में कुछ मजेदार सिटकौम गढ़ती है, जैसे खौफनाक आतंकियों का डेटिंग ऐप चलाते हुए पकड़ा जाना या बेहद बचकानी हरकतें करना. लेकिन जैसेजैसे कहानी आगे बढ़ती है, कौमेडी पर निर्देशक की पकड़ ढीली पड़ती जाती है. वे अपनी जौनर से छिटकते जाते हैं.

पिछली कई फिल्मों में औसत बिजनैस के बाद आयुष्मान खुराना के लिए यह फिल्म एक तरह का कमबैक जैसी थी. हालांकि वे अपने हिस्से का काम कर देते हैं. दो अलग लहजों और दो अलग बौडी लैंग्वेज में वे पूरी स्क्रीन पर टिके रहते हैं. याददाश्त खोने के बाद का उन का कंफ्यूजन और एक बेबस जासूस की छटपटाहट में वे अपनी जानीपहचानी कौमिक टाइमिंग से जान फूंकते हैं. ऐक्शन सीन्स में भी वे ठीकठाक दिखते हैं. वहीं, यामिनी (सारा अली खान) के किरदार में करने के लिए कुछ खास नहीं था. सारा का रोल केवल एक सपोर्टिंग वाइफ या प्रेमिका तक सीमित रह गया है. स्क्रीनप्ले में उन के किरदार को कोई गहराई नहीं दी गई है.

सपोर्टिंग कास्ट में अभिनेता मुकुल देव (आतंकी सरगना अजहर मकसूद के रूप में) का काम हंसाता है. अपने चेहरे के हावभाव और कौमिक टाइमिंग से वे एक खौफनाक आतंकी को बेहद हास्यास्पद शख्सियत में बदल देते हैं. राहुल बोस ने भी एक कड़क अफसर के रूप में मजेदार काम किया है.

फिल्म की सब से बड़ी कमजोरी इस का सैकंड हाफ और ढीली पटकथा है. शुरुआती एक घंटे में जो रफ्तार और नयापन दिखता है, वह इंटरवल के बाद पूरी तरह गायब हो जाता है. कहानी बारबार बिलाल की याददाश्त खोने और उस की आइडैंटिटी के इर्दगिर्द घूमती रहती है, जिस से दोहराव महसूस होने लगता है. क्लाइमैक्स तक पहुंचतेपहुंचते फिल्म खुद ही कंफ्यूज हो जाती है कि वह एक खालिस कौमेडी फिल्म है या फिर एक सीरियस देशभक्ति ड्रामा.

तकनीकी रूप से फिल्म का विजुअल ट्रीटमैंट रंगबिरंगा और काफी कंटेम्परेरी है. ‘खलनायक’ के बैकग्राउंड स्कोर का इस्तेमाल कुछ सीन्स में मजेदार लगता है. लेकिन कई जगहों पर वीएफएक्स बहुत कच्चे और नकली नजर आते हैं. लौजिक की बात करें तो दर्शकों पर छोड़ दिया गया है कि वे दिमाग न लगाएं.

तमाम खामियों के बावजूद आयुष्मान खुराना और मुकुल देव की ऐक्टिंग फिल्म को पूरी तरह गिरने से बचा लेती है. लेकिन कमजोर राइटिंग, लौजिक की कमी और दूसरे हाफ के बिखराव की वजह से यह एक एक औसत दर्जे की टाइमपास कौमेडी बन कर रह जाती है.

 

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