Durga Puja 2026: वास्तव में इन दिनों भारत में दुर्गा पूजा की धूम मची हुई है. यह 21 अक्टूबर तक रहेगा. कहीं गरबा व डांडिया नृत्य हो रहा है, तो कहीं भव्य पंडाल बनाकर दुर्गा देवी की बड़ी मूर्तिं स्थापित कर उनकी पूजा अर्चना, आरती व अन्य कार्यक्रम किए जा रहे हैं. कहने का अर्थ यह कि हर तरफ भक्ति व संस्कृति का ही माहौल है. मुंबई में ज्यादातर दुर्गा पंडाल की थीम देश के किसी ने किसी लोकप्रिय मंदिर पर आधारित है. लेकिन मुंबई के लोखंडवाला,कांदीवाली पूर्व में पिछले 23 वर्षों से आयोजित हो रही ‘क्रिष्ती दुर्गा पूजा’ के पंडाल का निर्माण अनूठे ढंग से किया गया है. ‘क्रिष्ती दुर्गा पूजा’ से जुड़े लोगो का मानना है कि दुर्गा पूजा यानी कि शक्ति की पूजा और नारी की पूजा है. यह हमारी सभ्यता व सृस्कृति को याद दिलाने का उत्सव है..
तो वहीं अगर हम मशहूर फिल्मकार व साहित्यकार सत्यजीत रे की फिल्मों या उनके साहित्य पर गंभीरता से गौर करें तो हमें अहसास होता है कि सत्यजीत रे ने हमेशा नारी सशक्तिकरण या नारी की महानता की ही बात की है। ऐसे में दुर्गा पूजा के पंडाल की थीम सत्यजीत रे पर रखना कितनी महान सोच का प्रतीक है, इसका अहसास हर इंसान लगा सकता है. इतना ही नही ‘क्रिष्ती दुर्गा पूजा’ के पंडाल की थीम मेें सत्यजीत रे के साथ ही अभिनेता उत्तम कुमार भी समाहित हैं. आखिर सत्यजीत रे निर्देषित ‘‘नायक’ और ‘चिड़ियाखाना’’ फिल्मों में जिन चुनौतीपूर्ण किरदारों को अपने अभिनयों से साकार कर उत्तम कुमार ने अमर बना दिया, उन किरदारों को कोई अन्य कलाकार कर भी नहीं सकता. ‘क्रिस्टी दुर्गा पूजा पंडाल’ का मुख्य द्वार 17 दिसंबर 1974 को रिलीज उनकी बंगला फिल्म ‘‘सोनार किला’’ पर आधारित है.
सत्यजीत रे और उनकी फिल्मों से परिचित लोगों की नजर इस द्वार पर पड़ते ही ‘सोनार किला’ फिल्म की याद आ जाती है. हम याद दिला दें कि सत्यजीत रे की इस फिल्म को अंग्रेजी में एडॉप्ट कर ‘‘द गोल्डेन फोरटे्स’ के नाम से अमरीका में रिलीज किया गया था. जब हम अंदर बढ़ते हैं तो सत्यजीत रे की ‘नायक,चारूलता, पाथेर पंचाली सहित कुछ फिल्मों के चर्चित दृष्यों को डाइंग के साथ पोस्टर रूप में बनाया गया है.
इतना ही नही इस पंडाल में सत्यजीत रे के पिता,सत्यजीत रे की जीवनी, सत्यजीत रे की सभी फिल्मों के नाम व किस सन में रिलीज हुई की जानकारी, सत्यजीत रे और रवींद्रनाथ टैगोर की पहली मुलाकात की जानकारी फोटो के साथ ही सत्यजीत रे को लेकर विष्व के महान फिल्मकारों ने क्या कहा, उसकी भी जानकारी दी गयी है. यानी कि दुर्गा पूजा का यह क्रिष्ती पंडाल सही मायनों में सत्यजीत रे को महज श्रृद्धांजलि ही नहीं बल्कि उन पर जानकारी का खजाना है.
पर अहम सवाल यह कि नास्तिक फिल्मकार सत्यजीत रे का दुर्गा पूजा पंडाल में क्या काम? इस पर ‘‘क्रिष्ती दुर्गा पूजा’ कमेटी की सेक्रेटरी देवनीता भूषण कहती हैं-‘‘
जी हॉ! पूरे विष्व में भारतीय सिनेमा का नाम रोषन करने वाले फिल्मकार सत्यजीत रे को लोग नास्तिक मानते हैं. पर सच यह है कि यह अंध भक्तो की व्याख्या है. सत्यजीत रे का दूर्गा पूजा से खास जुड़ाव रहा है. मगर वह मूर्ति पूजा और पूजा पाठ के पाखंड,आडंबर,व्यवसायी करण के खिलाफ अपनी आवाज अपनी फिल्मों के माध्यम से उठाते रहे हैं. उन्होने हमेषा लोगो को जागरूक करने का काम किया.सत्यजीत रे पूरी तरह से फेमीनिस्ट थे. वह नारी पूजा के हिमायती थे.नारी को हमेषा महान बताते रहे हैं. तो दुर्गा पूजा क्या है. दुर्गा पूजा भी तो नारी पूजा ही है.’’
देवनीता आगे कहती हैं-‘ रे का जन्म ब्रह्म समाज में हुआ था. इस एकेश्वरवादी संप्रदाय का प्रतिपादन राजा राममोहन रॉय ने किया था, जो बहुदेववादी विधर्मियों और हिंदू अनुष्ठानों के घोर विरोधी थे. इस प्रकार, उनका वैचारिक दृष्टिकोण राम मंदिर या अन्य स्थानों में मूर्ति पूजा के विरुद्ध था. ब्रह्म समाज के आश्रमों में आयोजित प्रार्थना सभाओं में शामिल नहीं होते थे, इसलिए वे ब्रह्म उपासक भी नहीं हैं, बल्कि उन्होंने ऐसी फिल्में बनाईं जो हिंदू धर्म की विशिष्ट विशेषताओं के विरुद्ध जाती हैं. इसके बावजूद उनकी फिल्मो में दुर्गा पूजा मौजूद हैं. लेकिन सत्यजीत रे ने अपनी कई फिल्मों में धर्म, धार्मिक अंधविश्वास और रूढ़िवादिता को प्रमुखता से दिखाया. 1960 मे ंरिलीज फिल्म ‘देवी’में उन्होंने सीधे तौर पर अंधविश्वास और कट्टरता पर बात की है.
इस फिल्म में धार्मिक अंधविश्वास और अंधभक्ति को दिखाया. कहानी में एक ससुर अपनी बहू (शर्मिला टैगोर) को देवी काली का अवतार मानने लगता है, जिसके बाद अंधविश्वास के कारण पूरा परिवार एक त्रासदी की ओर बढ़ जाता है. सत्यजीत रे के अनुसार, यह फिल्म धर्म पर हमला नहीं बल्कि धार्मिक कट्टरता और रूढ़िवादिता पर एक टिप्पणी थी. फिल्म ‘‘महापुरुष’’ में ढोंगी धर्मगुरुओं और बाबाओं पर एक तीखा और हास्यप्रद प्रहार किया. इसमें दिखाया गया है कि कैसे लोग अंधविश्वास में आकर फर्जी साधु-संतों के जाल में फंस जाते हैं.’’फिल्म ‘‘सद्गति’ हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी शोषण के क्रूर चेहरे को उजागर किय.‘‘गणशत्रु’’ में दिखाया है कि कैसे एक डॉक्टर मंदिर के चरणामृत (दूषित पानी) से फैल रही बीमारी को रोकने की कोशिश करता है, लेकिन धार्मिक ठेकेदार और अंधविश्वासी लोग उसे ही ‘धर्म का दुश्मन’घोषित कर देते हैं. तो हम सभी सत्यजीत रे को यह ‘दुर्गापूजा पंडाल’ समर्पित कर नई पीढ़ी को उनके सिनेमा के माध्यम से जागरूक करना चाहते हैं. हमारे लिए दुर्गा पूजा उत्सव है.संस्कृति है.’’
राध कुंडू कहती हैं-‘‘इस बार हमने अपने पंडाल में सत्यजीत रे और अभिनेता उत्तम कुमार दोनों को श्रृद्धांजली देने का काम किया है. यह वर्ष फल्मकार सत्यजीत राय की 105 वीं जन्म जयंती और 34 वीं पुण्यतिथि तथा अभिनेता उत्तम कुमार की 100 वीं जन्मजयंती और 66 वीं पुण्यतिथि,सत्यजीत रे निर्देषित व उत्तम कुमार के अभिनय से सजी फिल्म ‘‘नायक’’ के 60 साल पूरे होने का वर्ष है. फिल्म ‘नायक’ आ मफिल्म नही थी. इसमें उत्तम कुमार के साथ षर्मिला टैगोर थीं. यह एक अजेय फिल्मस्टार,महानायक की बात की गयी है, जो वासतव में अंदर से बेहद परेषान और डरा हुआ इंसान हैं. फिल्म में स्टारडम के पीछे छिपे अकेलेपन औैर मानसिक असुरक्षा को दर्षाती है. दूसरी बात हम सत्यजीत रे की फिल्मों की थीम के माध्यम सक हम नई पीढ़ी तक अपने कल्चर को भी पहुॅचाना चाहते हैं. हम सत्यजीत रें के साहित्य व उनकी फिल्मों को भी लोगों तक पहुॅचना चाहते हैं.’’
संकू लाहिरी कहते हैं-‘‘सत्यजीत रे नास्तिक थे,पर दुर्गा पूजा से उनका संबंध था.उनके करियर की पहली फिल्म ‘पाथेर पंचाली’ में भी दुर्गा पूजा है. उनकी जासूसी कहानी वाली फिल्म ‘जय बाबा फेलुदा’ में भी है.पर उनके लिए दुर्गा पूजा मतलब धर्म नही रहा. बल्कि एक उत्सव हुआ करता था.’’ Durga Puja 2026




