CSR Fund Misuse: वोट चोरी के खिलाफ जनता सड़कों पर है लेकिन बीजेपी के पिछले 12 सालों के रिकॉर्ड खंगालने पर पता चलता है की चोरी सिर्फ वोटों की नहीं हुई बल्कि सरकार के हर महकमे भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गयें हैं. बीजेपी ने भक्तों तक को नहीं छोड़ा, दान के पैसों में चंदा चोरी की गई. कॉर्पोरेट्स को एलेक्ट्रोरल बॉन्ड के नाम पर लूटा गया. वोटर्स का वोट SIR के नाम पर लूटा गया. पिछले 12 सालों में सरकार के हर विभाग और हर मंत्रालय में जमकर लूट मचाई गई और यह लूट यही नहीं रुकी. अभी हाल की एक रिपोर्ट में चौँकाने वाले खुलासे हुए हैं. टैक्स देने वाली जनता का पैसा CSR फंड के नाम पर लूटा गया है.
द न्यूज़ मिनट्स की एक रिपोर्ट ने सीएसआर के पूरे मॉडल पर सवाल खड़ा कर दिया है. द न्यूज़ मिनट की ताज़ा इन्वेस्टिगेशन के मुताबिक सरकारी कंपनी ओएनजीसी ने 2013 से 2025 के बीच 20 ऐसे संगठनों को 670.97 करोड़ रुपये सीएसआर फंड से दिए हैं जिनका लिंक आरएसएस से जुड़ा है. ओएनजीसी ने 2015 से 2025 के बीच कुल 4,531 करोड़ रुपये 2000 से ज्यादा संगठनों को सीएसआर में बांटे, इसमें से अकेले आरएसएस से जुड़े 20 संगठनों को 668 करोड़ यानी करीब कुल फंड का 14.7 फीसदी हिस्सा मिला है.
इस रिपोर्ट में संगठनों को तीन हिस्सों में बांटा गया है. 9 सीधे RSS से जुड़े हैं, 9 ऐसे हैं जो RSS से जुड़े लोगों ने शुरू किए या जिनके हेड आरएसएस विचार से जुड़े हैं और 2 ऐसे संगठन हैं जिन्होंने आरएसएस के साथ मिल कर काम किया है. ONGC की CSR रिपोर्ट में ये आंकड़े खुद मौजूद हैं.
अब सवाल यहीं से शुरू होता है. कंपनी एक्ट के तहत हर बड़ी कंपनी को अपने प्रॉफिट का 2 फीसदी हिस्सा सामाजिक काम पर खर्च करना पड़ता है. ओएनजीसी देश की महारत्न पीएसयू है जो देश के 70 फीसदी कच्चे तेल और 84 फीसदी गैस का उत्पादन करती है. इस सरकारी कंपनी के सीएसआर का पैसा असल में जनता का पैसा है, टैक्सपेयर का पैसा है. जब इसी पैसे का 14.7 फीसदी हिस्सा आरएसएस की विचारधारा से जुड़े 20 संगठनों को चला जाए तो सवाल उठना लाजिमी है कि क्या CSR का इस्तेमाल आरएसएस की विचारधारा की फंडिंग के लिए हो रहा है?
यह भ्रष्टाचार भी वोट चोरी और चंदा चोरी से कम नहीं है. चंदा चोरी का मॉडल इलेक्टोरल बॉन्ड और राममंदिर घोटाले में उजागर हुआ. CSR वाला मॉडल थोड़ा अलग है लेकिन पैटर्न वही है. बीजेपी ने सरकारी संसाधन से अपने इकोसिस्टम को मजबूत किया. बीजेपी कहती है की पैसा हॉस्पिटल और स्कूलों को दिया गया. सवाल यह है कि अगर सीएसआर का फंड आरएसएस के हॉस्पिटल और स्कूलों में गया तो जो हॉस्पिटल इन संगठनों के कंट्रोल में होंगे वहाँ किसका इलाज होगा? और जो स्कूल इनके नियंत्रण में होंगे वहाँ किस विचारधारा की पढ़ाई होगी?
जो संगठन आरएसएस की विचारधारा पर खड़े हैं. वहां से कार्यकर्ता भी तैयार वही होंगे. आरएसएस के इन्हीं संस्थानों के लोग सिस्टम में घुसेंगे और फिर चोरी और लूट का इकोसिस्टम और ज्यादा मजबूत होगा. बीजेपी की लूट का यही मॉडल है और वोट चोरी इसी मॉडल का सबसे जरुरी हिस्सा है क्योंकि वोट चोरी से सत्ता मिलती है और बाकी लूट के लिए सत्ता जरुरी है. जब वोट चोरी रुकेगी तभी बाकी की लूट भी खत्म होगी.
संबित पात्रा को इंडिपेंडेंट डायरेक्टर क्यों बनाया गया?
संबित पात्रा को सितंबर 2017 में अपॉइंटमेंट्स कमिटी ऑफ कैबिनेट ने ओएनजीसी बोर्ड में नॉन-ऑफिसियल इंडिपेंडेंट डायरेक्टर के तौर पर 3 साल के लिए नियुक्त किया था. उनकी नियुक्ति को लेकर एनर्जी वॉचडॉग नाम के एनजीओ ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती भी दी थी, बाद में हाईकोर्ट ने एनजीओ की यह याचिका खारिज कर दी थी. 2021 में संबित पात्रा को आईटीडीसी का चेयरमैन बनाया गया. इस वक़्त तक वह बीजेपी के स्पोक्स पर्सन थे. 2024 में वो पुरी से सांसद चुने गए. यानी वो बिना चुने हुए ही 2017 से 2021 तक ओएनजीसी बोर्ड में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर रहे और 2021 के बाद वह आईटीडीसी के चेयरमैन बना दिए गये.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी रूलिंग पार्टी के नेशनल स्पोक्सपर्सन का PSU बोर्ड में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर होना सही है? कम्पनीज एक्ट 2013 की धारा 149(6) में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर का प्रमोटर से संबंध नहीं होना चाहिए, इसी आधार पर संबित पात्रा को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी. तब कोर्ट ने नियुक्ति को तो सही ठहरा दिया लेकिन पब्लिक परसेप्शन में ये सवाल आज भी है कि जब बोर्ड में ही पार्टी के लोग बैठे होंगे तो CSR का पैसा कहां जाएगा?
इस भ्रष्टाचार पर जब रिपोर्ट पब्लिश हुई थी तब तक सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया था और जेपीसी ने भी इस रिपोर्ट का जिक्र कॉर्पोरेट लॉज़ अमेण्डमेंट बिल 2026 पर चर्चा के दौरान किया था कि CSR में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर की निगरानी जरूरी है लेकिन यहां सवाल यह है कि बीजेपी का स्पोक्स पर्सन ओएनजीसी बोर्ड का इंडिपेंडेंट डायरेक्टर क्यों बनेगा?
670 करोड़ रूपये के घपले का आंकड़ा सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है. ये सवाल है कि क्या PSU का 2 परसेंट CSR, जो गरीब, आदिवासी के स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए होना चाहिए वो एक खास नेटवर्क की फंडिंग बन रहा है? असल में तो यह इलेक्ट्रोरल बांड और मंदिर के चंदा चोरी से भी बड़ा मामला है क्योंकि एलेक्ट्रोरल बांड कम्पनियों की लूट में सरकारी वसूली है तो मंदिर का चंदा वह पैसा है जिसे जनता खुद लूटने वालों की झोली में डालती है लेकिन सीएसआर वाली लूट में तो सीधे सरकारी खजाने से पैसा जा रहा है और यह पैसा देश के मेहनतकश लोगों का है.
चोरी और लूट धर्म का हिस्सा
इस देश में दान का कॉन्सेप्ट बहुत पुराना है. मंदिर में चढ़ावा, दान, गुरुदक्षिणा और सेवा के नाम पर आम जनता को जमकर लूटा गया. आरएसएस कहता है हम रजिस्टर्ड नहीं हैं, हम गुरुदक्षिणा से चलते हैं. 19 जुलाई 2026 को द न्यूज़ मिनट ने जब ओएनजीसी की सीएसआर रिपोर्ट खंगाली तो पता चला कि आरएसएस की गुरुदक्षिणा का असली सोर्स क्या है? असल में मंदिरों का दान, दान नहीं, इन्वेस्टमेंट होता है. डर से मुक्ति का इन्वेस्टमेंट और मरने के बाद की मुक्ति का इन्वेस्टमेंट और यह दोनों इन्वेस्टमेंट्स का रिटर्न कभी भी नहीं मिलता. यह पैसा पहले पुरोहितों के घरों में जाता था अब सरकार और धर्म के दलाल मिलकर हड़पते हैं.
दान का पैसा कहाँ गया यह भक्त जानें लेकिन ओएनजीसी का पैसा टैक्सपेयर का पैसा है. कंपनी एक्ट में 2 परसेंट CSR इसलिए नहीं बनाया गया था कि आरएसएस इस पैसे से अपना वैचारिक इकोसिस्टम खड़ा करे. भगवान के नाम पर चढ़ावा चोरी और समाजकल्याण के नाम पर CSR की लूट दोनों एक ही धंधे का हिस्सा हैं.
बीजेपी सरकार ने सिर्फ वोटरों से छल नहीं किया बल्कि जिन भक्तों ने बीजेपी पर भरोसा कर उसके बनाये मंदिरों की दान पेटियों को भरा वहाँ भी चोरी करवाई गई इसलिए आज का प्रोटेस्ट सिर्फ वोट बचाने का प्रोटेस्ट नहीं है. आज जो जनता सड़कों पर आंदोलन कर रही है वह सिर्फ वोट चोरी का हिसाब नहीं मांग रही बल्कि इस बार वह चोरी और लूट के पूरे इकोसिस्टम को ध्वस्त करने का मन बना चुकी है. बीजेपी के भ्रष्टाचार की किताब में चुनाव आयोग तो बस एक चैपटर है. यह आंदोलन बीजेपी की पूरी किताब को ख़ारिज करने पर तुला है. CSR Fund Misuse




