Vote Right: दिल्ली में पिछले कुछ दिनों से जो हो रहा है वह द्वापर के महाभारत युद्ध से कम नहीं है. फर्क सिर्फ इतना है कि वह लड़ाई चचेरे राजकुमार भाइयों के बीच जमीन की थी और यह आम जनता के अधिकारों की है. उस युद्ध में हरेक के हाथ में हथियार था. इसमें हक मांगने बालों के हाथों में सिर्फ संविधान है. इस संविधान से बड़ा शस्त्र तो सुदर्शन चक्र भी नहीं था जिसकी ताकत तीन बार चलने के बाद खत्म हो जाती थी.
संविधान मानव निर्मित एक ऐसा हथियार है जिसकी धार और मार शाश्वत है. सुदर्शन चक्र विष्णु ने कृष्ण को दिया था. जिसका कृष्ण ने शिशुपाल के खिलाफ इस्तेमाल किया था और उसका बेजा इस्तेमाल करते जयद्रथ की हत्या के लिए भी किया था. युद्ध के नियम तोड़ते इसे कृष्ण ने गुस्से में भीष्म को मारने की गरज से भी किया था. लेकिन अर्जुन ने कृष्ण को यह `पाप` करने से रोक लिया था. वर्ना तो भीष्म कृष्ण के हाथ में सुदर्शन चक्र देख अपने हथियार फेक सर झुका कर खड़े हो गए थे.
महाभारत की लड़ाई पांडवो ने जीती उन्हें राजपाट मिला. जाहिर है उससे आम जनता को कुछ हासिल नहीं हुआ . उलटे कई बच्चे अनाथ हो गये, लाखों औरतें बेवा हो हो गईं. लेकिन दिल्ली की चल रही लड़ाई आम जनता सीधे राजा से लड़ रही है. वह कह रही है यह कोई द्वापर नहीं जिसमे सारा राजपाट क्षत्रिय राजकुमारों और उन्हें नचाने बाले ब्राह्मणों का ही हो.
यह लोकतांत्रिक युग है जिसमे सब बराबर हैं और सब का सब कुछ है, जमीन भी, आसमान भी, हवा भी और इंटरनेट से लेकर एआई भी. ऐसे में आप या आपके इशारे पर नाचती चुनाव आयोग जैसी लोकतांत्रिक संस्थाएं भेदभाव करेंगी और वोट का संवैधानिक हक छीनेंगी तो कोई कृष्ण या अर्जुन नहीं बल्कि राहुल और दिपके हमारी लड़ाई सड़कों पर आकर लड़ेंगे. और वे कोई अवतार नहीं हैं, न ही चमत्कारी दिव्य पुरुष हैं. वे हमारी आपकी तरह आम आदमी हैं जिन्हें मानवाधिकारों की जिद खास बनाती है.
उस महाभारत से सिवाय खूनखराबे के कुछ नहीं मिला क्योंकि कानून नाम की कोई चीज नहीं थी. जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर सिस्टम चलता था. इस महाभारत में जनता लाठियां छीनने इकट्ठा हो रही है, ताकि सुकून से रह सके और बराबरी का हक हासिल कर सके. इसमें कोई खूनखराबा नहीं है क्योंकि `आफ्टर आल` राज कानून का है और जो भी अपना राज थोपने की कोशिश करेगा उसे वोट के जरिये गद्दी से उतार दिया जाएगा.
लड़ाई इसी वोट चोरी की है, वोट का हक छीनने की है और अगर जनता यह लड़ाई हार गई तो सरकार तो इन्हीं की रहेगी. जिसका ये लोग खासतौर से प्रधानमन्त्री और गृहमंत्री अक्सर दावा भी करते रहते हैं कि अगले इतने और उतने सालों तक सरकार हमारी ही रहेगी. किस दम पर यह दावा किया जाता है यह राज जब खुलने लगा है तो जिम्मेदारो ने मुंह में दही जमा लिया है. बोलने को अपने पुछल्लों को छोड़ दिया है जो न्यूज़ चैनलों पर बोलते कम हैं चिल्लाते ज्यादा हैं
द्वापर की जनता गुलामी की जिंदगी जीने मजबूर थी क्योंकि सब कुछ यानी सारा सिस्टम सवर्णों की मुट्ठी में कैद था. यह सिस्टम धर्म की देन था. वर्ण व्यवस्था इसका मुख पृष्ठ थी. ब्राह्मण पूजा और दान दक्षिणा इसकी भूमिका और उपसंहार थे. इसलिए जनता राजाओं के इशारे पर नाचते मरने के लिए कुरुक्षेत्र भी पहुँच जाती थी.
वह `वार` था और दिल्ली में जो हो रहा है वह `प्रोटेस्ट` है . शिक्षित, बुद्धिजीवी इन शब्दों में फर्क आसानी से समझ सकते हैं. लेकिन दिक्कत वे भक्त हैं जो हर दौर में अवतारों के मोहताज रहे हैं, राजा की गुलामी ढोना अपना धर्म और कर्म समझते हैं. लगभग दस फीसदी इन सवर्णों ने मान लिया है और जो सच भी है कि सरकार जो भी करेगी वह द्वापर सरीखी धर्म रक्षा के लिए होगा. मंदिरों और विप्रों के दबदबे और रोजी रोटी के लिए होगा दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों को दबाए रखने के लिए होगा. फिर वह चाहे वोट चोरी ही क्यों न हो अगर इससे यह सब होना मुमकिन है तो उसे होने दिया जाए. जिसे लेकर हंगामा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है और राजा चैन की बंसी बजा रहे हैं.




