Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्षी दलों के आरोप लगातार गंभीर होते जा रहे हैं. विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग ने जिस तरह से मतदाता ची में बदलाव और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया आगे बढ़ाई, उससे करोड़ों लोगों ने मतदान का अधिकार खो दिया है. इस मामले को इसलिए ज्यादा गंभीर माना जा रहा है क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मनमाने रवैये को लेकर चुनाव आयोग के ही दो अन्य चुनाव आयुक्तों – सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की कई आपत्तियां अब सामने आ चुकी हैं.
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले करीब दस महीनों में दोनों चुनाव आयुक्तों ने कई बार ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर आपत्ति जताई थी. रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ मामलों में उन्होंने कैबिनेट सचिव को भी पत्र लिखे. इस खुलासे के बाद चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया और तीनों चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद को साफ़ कर दिया है. यानी चुनाव आयोग में जो भी फैसले लिए जा रहे थे वो सब अकेले ज्ञानेश कुमार ही ले रहे थे. जाहिर है ज्ञानेश कुमार मोदी-शाह के इशारे पर भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसा कर रहे थे.
सबसे बड़ा विवाद SIR और फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को लेकर खड़ा हुआ है. फॉर्म-6 वह फॉर्म है जिसे कोई नया मतदाता अपना नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए भरता है. मगर इसी फॉर्म-6 में मनमाने तरीके से SIR से जुड़े कुछ सवाल जोड़ दिए गए. नए मतदाता से पूछा जा रहा था कि क्या 2000 के दशक की शुरुआत में हुई पिछली SIR के दौरान क्या उसका नाम मतदाता सूची में था? या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी/नाना-नानी का नाम उस सूची में था? एक तीसरा विकल्प भी दिया गया था कि इनमें से किसी का नाम उस सूची में नहीं था? कागज पर इसे अनिवार्य नहीं बताया गया था, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक इस सवाल का जवाब दिए बिना फॉर्म जमा करना संभव ही नहीं था.
यहीं से विवाद शुरू हुआ. चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई को इस बदलाव पर आपत्ति जताई. उनका तर्क था कि फॉर्म-6 और फॉर्म-8 कानून के तहत तय फॉर्म हैं. इनमें बदलाव करने के लिए Registration of Electors Rules, 1960 में संशोधन जरूरी. सिर्फ चुनाव आयोग के आदेश या SIR की गाइडलाइन के जरिए इन फॉर्म में बदलाव नहीं किया जा सकता है. जोशी ने यह भी कहा कि अगर फॉर्म में बदलाव जरूरी है तो इसका प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जाना चाहिए. इसके बाद 19 मई को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी विवेक जोशी की आपत्ति से सहमति जताई. यानी चुनाव आयोग के तीन सदस्यों में से दो ने इस बदलाव की कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठाए.
नया वोटर आखिर किस कसौटी पर वोट देगा?
मतदान का अधिकार किसी नागरिक को उसकी उम्र, नागरिकता और सामान्य निवास के आधार पर मिलता है. सवाल यह है कि किसी 18 साल के नए मतदाता के लिए यह क्यों जरूरी हो कि उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम किसी पुरानी SIR की मतदाता सूची में था या नहीं?
मान लीजिए किसी परिवार का नाम पिछली SIR के बाद बनी मतदाता सूची में नहीं था. अब उसी परिवार का कोई बच्चा 18 साल का होकर पहली बार वोट देने के योग्य हुआ है. ऐसे में वह फॉर्म-6 में पहले दो विकल्प कैसे चुनेगा?
यही वह सवाल है जिसने इस पूरी प्रक्रिया को विवादित बना दिया है. विपक्ष का कहना है कि इससे नए मतदाताओं पर अनावश्यक शक पैदा हो सकता है और ऐसे लोगों को वोटर लिस्ट में शामिल होने में परेशानी हो सकती है.
दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां
गौरतलब है कि चुनाव आयोग तीन सदस्यों वाली एक संवैधानिक संस्था है. तीनों चुनाव आयुक्तों के अपने-अपने अधिकार हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के प्रशासनिक नेतृत्व की भूमिका निभाते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण फैसलों में आयोग एक सामूहिक संस्था के रूप में काम करता है. इसलिए अगर दो चुनाव आयुक्त किसी फैसले पर लगातार आपत्ति दर्ज कराते हैं तो यह एक गंभीर सवाल पैदा करता है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट की मानें तो करीब दस महीने में दोनों चुनाव आयुक्तों ने 14 बार ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर आपत्ति जताई. एक मामले में तो एक ही दिन में चार बार आपत्ति दर्ज किए जाने की बात सामने आई है. सवाल यह नहीं है कि तीन चुनाव आयुक्तों में मतभेद क्यों हुआ, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर आखिर फैसला क्या हुआ और उन्हें कितनी गंभीरता से लिया गया?
दरअसल दोनों आयुक्तों की आपत्तियों को ज्ञानेश कुमार ने रद्दी की टोकरी में डाल कर भारतीय जनता पार्टी को चुनावों में जीत दिलाने के लिए वोट चोरी का अनोखा सिस्टम एसआईआर के रूप में डेवलप किया और देश भर में चला दिया. नतीजा बंगाल की कमान ममता बनर्जी के हाथ से जाती रही. दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार में भी इसी की बदौलत सत्ता भाजपा के हाथों में आ गई. और अब इस प्रयोग को अन्य राज्यों में होने वाले चुनाव में ज्ञानेश कुमार को करना था, मगर लगता है अब उनके पाप का घड़ा पूरी तरह भर चुका है, बस फूटने भर की देर है.
यह भी समझना जरूरी है कि मतदाता सूची से जुड़े फॉर्म में बदलाव के लिए पहले से कानूनी व्यवस्था मौजूद है. 2021 में संसद ने Representation of the People Act, 1950 में संशोधन किया था, जिसके बाद चुनाव आयोग मतदाताओं से आधार नंबर की जानकारी मांग सकता है. इसके बाद कानून मंत्रालय ने 17 जून 2022 को मतदाता पंजीकरण के नियमों और फॉर्म-6 में बदलाव से संबंधित अधिसूचना जारी की थी. इसका मतलब साफ है की जब भी मतदाता से जुड़ी जानकारी लेने के लिए फॉर्म में महत्वपूर्ण बदलाव किया जाता है तो उसके लिए तय कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाता है. फिर सवाल यह है कि SIR से जुड़े नए सवाल जोड़ने के मामले में वही प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई?
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर दाग
भारत में चुनाव आयोग से सबसे बड़ी उम्मीद यही होती है कि वह सत्ता और विपक्ष दोनों से बराबर दूरी बनाए रखे और हर नागरिक के वोट के अधिकार की रक्षा करे. अगर मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटते हैं, नए मतदाताओं के लिए नियम कठिन होते हैं और उसी आयोग के भीतर से उन प्रक्रियाओं पर कानूनी सवाल उठते हैं, तो स्वाभाविक रूप से जनता के मन में सवाल उठेंगे और आयोग के प्रति अविश्वास पैदा होगा. लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ वोट डालने की प्रक्रिया नहीं है. चुनाव की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि आम नागरिक को यह भरोसा हो कि उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित है, उसका वोट सुरक्षित है और चुनाव कराने वाली संस्था निष्पक्ष है.
यही भरोसा लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है. अगर उस भरोसे पर सवाल उठने लगें तो चुनाव आयोग को आरोपों का जवाब सिर्फ बयान से नहीं, बल्कि पूरी पारदर्शिता, दस्तावेजों और कानूनी प्रक्रिया के साथ देना होगा. Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar





