Pooja Meri Jaan Review: नवजोत गुलाटी की फिल्म ‘पूजा मेरी जान’ कंटेम्पररी विषय पर है, जिस में एकतरफा प्यार, मेल साइकोलौजी, टौक्सिसिटी और महिला की ‘न’ को न स्वीकार पाने की मेल ईगो दिखाई गई है. लेकिन अच्छे इरादे से बनाई गई फिल्म एक बढ़िया फिल्म बन जाए, यह जरूरी नहीं. फिल्म की एडिटिंग और कहानी इतनी ढीली है कि यह एक तीखी थ्रिलर बनने के बजाय सोशियोलौजी का चैप्टर महसूस होने लगती है.
कहानी दिल्ली के एक थिएटर ग्रुप से शुरू होती है. स्टेज पर शेक्सपियर का नाटक ‘रोमियो एंड जुलियट’ चल रहा है. नाटक खत्म होते ही रोमियो बना अनिकेत (विक्रम सिंह चौहान) सब के सामने स्टेज पर ही जुलियट यानी पूजा डोगरा (मृणाल ठाकुर) को शादी के लिए प्रपोज कर देता है. पूजा सालों से अनिकेत को सिर्फ एक दोस्त मानती आई है और उस ने बारबार उसे ‘फ्रैंडजोन’ किया है. सरेआम हुए इस तमाशे से खफा हो कर पूजा उसे बुरी तरह दुत्कार देती है. रिजैक्शन के दर्द को न झेल पाने की वजह से अनिकेत आत्महत्या कर लेता है. उस से पहले वह कई कौल, मैसेजेस पूजा को भेजता है जिन्हें पूजा इग्नोर कर देती है.
अब पूजा को आत्महत्या के लिए उकसाने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया जाता है. पूजा का मीडिया ट्रायल शुरू होता है और उसे सोशल मीडिया पर दोषी करार दे दिया जाता है. उस की वकील दोस्त सना (हुमा कुरैशी) कोर्ट में उस की लड़ाई लड़ने आती है, जबकि दूसरी तरफ से वकील जतिन (विजय राज) पूजा को सजा दिलाना चाहता है, जो पुरुषहितैषी भी है. इस के बाद फिल्म कोर्टरूम ड्रामा में बदल जाती है जहां आखिरकार निष्कर्ष निकलता है कि पुरुषों का लव रिजैक्शन न झेल पाना कभी एसिड अटैक, कभी रेप या कभी आत्महत्या जैसे कदम लेने तक पहुंचा देता है.
समस्या यह कि फिल्म बारीक बिंदु पर खुल कर बात करने के बजाय जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालती है. कोर्टरूम ड्रामा ‘पिंक’ या ‘सैक्शन 375’ जैसी फिल्मों ने अदालती बहसों में जो धार दिखाई थी, वह यहां मिसिंग है. जब पूजा की वकील सना कोर्ट में पूजा का बचाव करती है, तो उस के तर्क कानून की दलीलों से ज्यादा ट्विटर के थ्रेड जैसे लगते हैं, जो बस जुड़ते जाते हैं.
अनिकेत के किरदार को गढ़ने में भी लेखकों ने बहुत बड़ी चूक की है. किसी इंसान की दीवानगी और उस के सनकीपन की जड़ें समाज की कंडीशनिंग से जुड़ी होती हैं. अनिकेत एक सिंगल मदर का बेटा है, जिस के दोस्त भी उसी मर्दवादी सोच के शिकार हैं. फिल्म के पास मौका था कि वह यह दिखाए कि कैसे ‘प्यार दोस्ती है’ और ‘हसीना मान जाएगी’ जैसी फिल्मी बातों ने हमारे देश के युवाओं के दिमाग में जहर घोला है. लेकिन फिल्म इस मानस को गहराई से खंगालने के बजाय बहुत सतही ढंग से छू कर निकल जाती है. अनिकेत के किरदार का कोई ठोस मनोविज्ञान सामने नहीं आ पाता.
ऐक्टिंग की बात करें तो मृणाल ठाकुर ने अपना काम ठीक किया है. उस का किरदार अनिकेत के साथ ग्रे शेड में होता है जहां वह सहज भी है और डरी भी. मगर मेकर्स इस किरदार को सही से संभाल नहीं पाते. विक्रम सिंह चौहान ने एक जनूनी और जिद्दी आशिक के रोल में ठीकठाक काम किया है. वह पजेसिव लड़का बना है जो पूजा को हर हाल में पाना चाहता है. हुमा कुरैशी ने बढ़िया काम किया है, हालांकि उस के डायलौग में ड्रामा ज्यादा ठूस दिए गए हैं.
विजय राज एक मर्दवादी और औरतों को ले कर पूर्वाग्रह से जकड़ा वकील बना है. फिल्म में ‘रेड हार्ट’ इमोजी वाला सीन उन की ऐक्टिंग को न्याय देता है. तकनीकी रूप से 117 मिनट की यह फिल्म रफ्तार के मामले में तो चुस्त है लेकिन इस का बैकग्राउंड स्कोर और सिनेमेटोग्राफी बेहद साधारण हैं. एडिटिंग ने फिल्म को छोटा जरूर रखा लेकिन कई जगह अचानक सीन बदल जाते हैं तो ग्लिच जैसा महसूस होता है.
कुल मिला कर अगर आप सिर्फ एक हलकीफुलकी, एक बार देखी जा सकने वाली कोर्टरूम थ्रिलर देखना चाहते हैं, तो इसे देख सकते हैं. फिल्म महिलाओं के लिए पूर्वागृह को तोड़ती है. फिल्म ओटीटी पर मौजूद है, झटपट निबटाई जा सकती है. Pooja Meri Jaan Review





