Indian Sports System: स्कौटलैंड के ग्लासगो में 23 जुलाई से 2 अगस्त, 2026 तक चले कौमनवैल्थ गेम्स में इस बार भारतीय खिलाडिय़ों ने कुल 39 पदक जीते थे. 13 गोल्ड, 17 सिल्वर और 9 ब्रौन्स के साथ भारत पदक तालिका में चौथे स्थान पर रहा. हालांकि, प्रतियोगिता का आकार पहले के मुकाबले छोटा था.

भारत ने 10 खेलों में सिर्फ 122 खिलाडिय़ों का दल उतारा था.

सब से ज्यादा चर्चा बौक्सिंग की हुई. भारत ने बौक्सिंग में 7 स्वर्ण पदक जीते, मीराबाई चानू ने लगातार तीसरा कौमनवैल्थ गेम्स गोल्ड जीत कर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की थी.

39 पदकों से कहीं बड़ी है यह कहानी

अस्मिता डे ने जूडो में भारत का पहला कौमनवैल्थ गोल्ड जीत कर इतिहास रचा. हर्ष सिंह ने भी जूडो में गोल्ड हासिल किया. बौक्सिंग में नई लड़कियों ने कमाल किया तो पैराएथलेटिक्स में शर्मिला धांकर और दिलीप गावित ने दिखाया कि शारीरिक चुनौतियां प्रतिभा के रास्ते में दीवार नहीं बन सकतीं. खिलाडिय़ों का यह जोश भारतीय खेल जगत की एक बड़ी उम्मीद है.

भारत के लिए ग्लासगो में खिलाडिय़ों का बेहतरीन प्रदर्शन सिर्फ 39 मैडल्स हासिल करने भर की कहानी नहीं है. असली बात यह है कि नई पीढ़ी के ये गरीब घरों के खिलाड़ी अपने दम पर आगे आ रहे हैं और अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं.

भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है. असली चुनौती यह है कि छोटे शहरों, गांवों और साधारण परिवारों से निकलने वाली प्रतिभाओं को लगातार बेहतर प्रशिक्षण, पोषण, खेल सुविधाएं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताएं कैसे मिलें. कौमनवैल्थ गेम्स का मंच भारत के लिए एक तरह की प्रयोगशाला है. यहां जो खिलाड़ी चमकते हैं, उन में से कई आगे एशियन गेम्स और ओलिंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करते हैं. कौमनवैल्थ गेम्स 1940-55 तक ब्रिटेन के गुलाम रहे देशों का खेल का मंच है.

जंतरमंतर पर बैठी महिला पहलवानों के साथ हुई एक बड़ी घटना के बाद भी भारतीय खेल व्यवस्था यह सुनिश्चित नहीं कर पाई कि भविष्य में किसी महिला खिलाड़ी को अपने अधिकार के लिए जंतरमंतर तक न जाना पड़े और न ही वह ऐसी शिकायतों के लिए कोई स्वतंत्र व्यवस्था बना पाई. महिला खिलाड़ियों को यह भरोसा भी नहीं दिलाया गया कि शिकायत करने पर उन का चयन, प्रशिक्षण और कैरियर प्रभावित नहीं होगा.

राज्य स्तरीय फुटबौल संघों और निजी/सरकारी क्रिकेट अकादमियों पर भी समयसमय पर युवा महिला खिलाडिय़ों द्वारा चयन के बदले अनुचित मांग करने या दुर्व्यवहार के आरोप लगाए गए हैं.

खेलसंघ या सत्ता के छोटेछोटे साम्राज्य?

भारत में अनेक खेलसंघ बने हैं मगर वे खेलों की संस्था कम, कुछ लोगों की निजी जागीर ज्यादा हैं. इन खेलसंघों में लोग वर्षों तक अपने पदों पर बने रहते हैं. एक ही परिवार के लोग अलगअलग पदों पर होते हैं. राजनीतिक रसूख वाले लोग खेल प्रशासन में हैं. वहां खिलाडिय़ों की प्रतिभा से ज्यादा अधिकारियों की ताकत की गूंज सुनाई देती है और चयन से ले कर प्रतियोगिता तक पारदर्शिता सवालों के घेरे में होती है.

खेल का मूल सिद्धांत होना चाहिए : सब से अच्छा खिलाड़ी चयनित हो और सब से अच्छा खिलाड़ी जीते. लेकिन ज्यादातर खिलाडिय़ों को लगता है कि मैदान पर प्रदर्शन से ज्यादा जरूरी किसी अधिकारी की कृपा है. ऐसे में खेल की भावना वहीं मर जाती है.

खिलाड़ी को यह भरोसा होना चाहिए कि उस का चयन उस के प्रदर्शन से होगा, न कि किसी फोनकौल से. उस में यह ताकत होनी चाहिए कि वह अधिकारी की गलत बात का विरोध कर पाए. उसे यह भरोसा होना चाहिए कि शिकायत करने पर उसे टीम से बाहर नहीं निकाला जाएगा. महिला खिलाड़ी को यह भरोसा होना चाहिए कि उस के शरीर, उस की गरिमा और उस का भविष्य किसी अधिकारी की निजी संपत्ति नहीं है.

मौजूदा सरकारी आंकड़ों के अनुसार एसएआई की विभिन्न योजनाओं में करीब 9,432 खिलाड़ी प्रशिक्षण ले रहे हैं. इन में लगभग 6,793 आवासीय और 2,639 गैरआवासीय खिलाड़ी हैं. आवासीय खिलाडिय़ों को बोर्डिंग, स्पोर्ट्स किट, स्टाइपैंड, प्रतियोगिता एक्सपोजर, शिक्षा, चिकित्सा और बीमा जैसी सुविधाएं दी जाती हैं. मार्च 2025 के लोकसभा जवाब के मुताबिक खिलाडिय़ों को साल में 330 दिनों तक बोर्डिंग सहित कई सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रावधान है.

योजनाएं हैं लेकिन प्रतिभा तक पहुंच कितनी है

खेलो इंडिया के तहत खिलाडिय़ों के लिए आउट औफ पौकेट अलाउंस और टीओपीएस के तहत चुनिंदा खिलाडिय़ों को 25,000 से 50,000 रुपए प्रतिमाह तक सहायता का प्रावधान है. ओलिंपिक पदक विजेताओं के लिए भी लाखों रुपए के नकद पुरस्कार निर्धारित हैं. लेकिन समस्या यह है कि इन योजनाओं की चमक तक पहुंचने से पहले ही हजारों प्रतिभाएं व्यवस्था के अंधेरे में खो जाती हैं.

सब से बड़ी कमी प्रतिभा पहचान और सूचना की पहुंच की है. आज भी अनेक ग्रामीण परिवारों को यह पता नहीं होता कि स्पोर्ट्स अथौरिटी का केंद्र कहां है, ट्रायल कब होंगे, आवेदन कैसे करना है और चयन के मानदंड क्या हैं. यदि प्रतिभा को अवसर की जानकारी ही नहीं मिलेगी तो केवल मैरिट की बात करना अधूरा होगा. इन संस्थाओं ने अखबारों में विज्ञापन देने बंद कर दिए है. बड़ी कंप्यूटर कंपनियों से करोड़ों के कंप्यूटर पोर्टल बनवा कर कह दिया कि उस पर आवेदन करो.

खेलों में भ्रष्टाचार सिर्फ पैसे का नहीं होता

खेल में भ्रष्टाचार को अकसर सिर्फ घोटाले और पैसे की हेराफेरी से जोड़ा जाता है. लेकिन असली भ्रष्टाचार उस से कहीं ज्यादा बड़ा है. जब योग्य खिलाड़ी को मौका नहीं मिलता और लाखों रुपयों की रिश्वत दे कर अयोग्य खिलाड़ी चयनित हो जाता है, तो वह भी भ्रष्टाचार है. जब खिलाड़ी से किसी अधिकारी के सामने झुकने की उम्मीद की जाती है तो वह भी संस्थागत भ्रष्टाचार है. जब शिकायत करने वाले खिलाड़ी को चुप कराने की कोशिश होती है, वह भी सत्ता का दुरुपयोग है. जब खेलसंघ अपने पदाधिकारियों को खिलाड़ियों से ऊपर समझता है तो वह भी भ्रष्टाचार है. जब सरकारें ऐसे संस्थानों पर कार्रवाई करने के बजाय राजनीतिक समीकरणों को प्राथमिकता देती हैं, तब यह केवल खेल प्रशासन की बात नहीं रह जाती बल्कि सत्ता और शासन की बात हो जाती है.

किसी खिलाड़ी के पिता ने खेत बेच कर प्रशिक्षण कराया. किसी ने रेलवे स्टेशन के पास बने छोटे मैदान में अभ्यास किया. किसी ने जूते खरीदने के लिए पैसे जुटाए. किसी ने चोट लगने के बाद अपने दम पर वापसी की. किसी ने आर्थिक तंगी के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच बनाई. और जब वह पदक जीतता है तो मंच पर तमाम नेता और अधिकारी उस के साथ खड़े हो कर तसवीर खिंचवाते हैं और व्यवस्था उस की जीत का पूरा श्रेय लेने की कोशिश करती है.

पदकों के पीछे संघर्ष की लंबी कहानियां

देश के कई ऐसे खिलाड़ी हैं जिन की अंतर्राष्ट्रीय पहचान चमकदार पदकों के बाद बनी, लेकिन उन पदकों के पीछे गरीबी, अभाव, बीमारी, चोट, सामाजिक भेदभाव और कभीकभी खेल व्यवस्था से टकराने की लंबी कहानी छिपी है.

मैरी कौम : सामाजिक सोच को चुनौती देती मुक्केबाज

मणिपुर के एक साधारण परिवार से आने वाली मैरी कौम ने जब मुक्केबाजी शुरू की थी, तब महिलाओं के लिए बौक्सिंग को ले कर समाज उदार नहीं था. उन की कहानी केवल गरीबी से निकलने की कहानी नहीं है, बल्कि उस सामाजिक सोच को चुनौती देने की कहानी भी है जिस में लडक़ी के लिए खेल, खासकर मुक्केबाजी, को ठीक नहीं माना जाता है. मैरी कौम पर बनी बायोपिक में भी इस बात का खुला जिक्र है.

मीराबाई चानू : अभाव से विश्व मंच तक

मणिपुर के एक छोटे से गांव से निकली मीराबाई चानू का बचपन भी बेहद गरीबी में बीता. उन के पिता मजदूर थे और मां सडक़ किनारे चाय की दुकान चलाती थीं. बचपन में मीराबाई जंगल से लकड़ियां सिर पर ढो कर लाने का काम करती थीं. एक दिन उन की असाधारण शारीरिक ताकत देख कर परिवार ने उन्हें वेटलिफ्टिंग की ओर जाने के लिए प्रेरित किया. पर समस्या यह थी कि प्रशिक्षण केंद्र करीब 20 किलोमीटर दूर था. रोज आनेजाने के लिए पैसे भी नहीं होते थे. ट्रक ड्राइवरों से लिफ्ट मांग कर वे केंद्र तक जाती थीं. मीराबाई चानू अपने संघर्षों से विश्व चैंपियन बनीं और टोक्यो ओलिंपिक में सिल्वर मैडल जीता. उन का संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ. कलाई, कंधे, कमर और कूल्हे की चोटों ने उन के कैरियर को बारबार रोका. मगर उन्होंने हर बार वापसी की.

विनेश फोगाट : मैट से बाहर व्यवस्था से लड़ाई

विनेश फोगाट की कहानी भारतीय खेल व्यवस्था के स्याह चेहरे को सामने लाती है. रियो ओलिंपिक में घुटने की गंभीर चोट ने उन का अभियान खत्म कर दिया था. इस के बाद उन्होंने लंबी मेहनत से वापसी की और एशियाई खेलों तथा राष्ट्रमंडल खेलों में गोल्ड मैडल जीते. लेकिन उन की सब से बड़ी लड़ाई मैट पर नहीं, जंतरमंतर पर हुई.

महिला पहलवानों के यौन उत्पीडऩ के खिलाफ आंदोलन में वे अग्रिम पंक्ति में खड़ी हुईं. इस संघर्ष ने उन्हें खेल प्रशासन और सत्ता के प्रभावशाली लोगों से टकराव की स्थिति में ला दिया. उन के साथ गंदी राजनीति खेली गई. पेरिस ओलिंपिक 2024 में वे फाइनल से पहले केवल 100 ग्राम अधिक वजन के कारण अयोग्य घोषित कर दी गईं. मगर विनेश फोगाट को खेल व्यवस्था के भ्रष्ट्र चक्र के भीतर अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए सदा याद किया जाएगा. ‘दंगल’ फिल्म में आमिर खान ने एस्टैब्लिशमेंट की जिद का दृश्य कई बार दिखाया है और उसी से अंत कराया है जब पहलवान लडक़ी के पिता को स्टेडियम के एक कमरे में एक अधिकारी के कहने पर बंद कर दिया जाता है. यह वास्तव में होता है, कई गुना होता है.

दुती चंद : अपने शरीर और नियमों के खिलाफ सवाल

दुती चंद का संघर्ष अलग तरह का था. 2014 में उन्हें ऊंचे एंड्रोजन स्तर से जुड़े नियमों के कारण प्रतियोगिताओं से बाहर कर दिया गया. उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी और मामला कोर्ट औफ आर्बिट्रेशन फौर स्पोर्ट तक पहुंचा. 2015 में सीएएस ने संबंधित नियमों को 2 साल के लिए निलंबित किया और अधिक वैज्ञानिक प्रमाण मांगे. इस संघर्ष का महत्त्व इसलिए भी बड़ा था क्योंकि सवाल केवल एक खिलाड़ी के कैरियर का ही नहीं था बल्कि यह था कि किस आधार पर किसी महिला खिलाड़ी को यह बताया जा सकता है कि उस का शरीर पर्याप्त महिला का नहीं है? दुति की कहानी खेल में भेदभाव और नियमों की मानवीय संवेदनशीलता पर बड़ी बहस का हिस्सा है.

देवेंद्र झाझरिया : शारीरिक चुनौती को ताकत बनाया

देवेंद्र झाझरिया बचपन में एक दुर्घटना के कारण अपना एक हाथ गंवा बैठे थे. लेकिन उन्होंने अपनी शारीरिक कमी को अपनी पहचान नहीं बनने दिया. भाला फेंक को अपना खेल बनाया और पैरालिंपिक इतिहास में भारत के सब से बड़े नामों में शामिल हुए. मगर सफलता मिलने के बाद भी संघर्ष खत्म नहीं हुआ. उन्हें अपने पहले पैरालिंपिक स्वर्ण के बाद दूसरे स्वर्ण के लिए 12 वर्ष इंतजार करना पड़ा. उन्होंने एथेंस 2004 के बाद रियो 2016 में फिर गोल्ड जीता.

दीपा मलिक : बीमारी और विकलांगता को मात देती कहानी

दीपा मलिक की कहानी असाधारण उदाहरणों में से एक है. स्पाइनल ट्यूमर के इलाज के बाद उन के शरीर का निचला हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया. कई सर्जरी और लगभग 200 टांकों के बाद उन्हें व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ा. लेकिन उन्होंने जोश नहीं खोया. पैराएथलेटिक्स में प्रवेश किया और रियो 2016 में शौटपुट में रजत पदक जीत कर पैरालिंपिक खेलों में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनने का इतिहास बनाया.

मिल्खा सिंह : विस्थापन से विश्व पहचान तक

मिल्खा सिंह की जिंदगी में भारत के विभाजन की हिंसा में परिवार के सदस्यों को खोने और शरणार्थी के रूप में नई जिंदगी शुरू करने की टीसें शामिल थीं. गरीबी, विस्थापन और असुरक्षा के बीच उन्होंने सेना में प्रवेश किया और वहीं से एथलेटिक्स की ओर बढ़े. बाद में वे भारत के सब से प्रसिद्ध धावक बने और 1960 रोम ओलिंपिक में 400 मीटर के फाइनल में चौथे स्थान तक पहुंचे. उन की कहानी का महत्त्व इस बात में है कि जिस व्यक्ति के पास जीवन शुरू करने के लिए कुछ नहीं बचा था, उस ने दौड़ कर अपने देश की पहचान दुनिया तक पहुंचाई.

व्यवस्था की मदद के बिना भी आगे बढ़ते खिलाड़ी

ऊपर वर्णित सभी कहानियों को साथ रख कर देखें तो एक महत्त्वपूर्ण बात सामने आती है. भारत की खेल प्रतिभाएं व्यवस्था की मदद से नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमियों के बावजूद आगे बढ़ती दिखाई देती हैं. किसी के पास प्रशिक्षण केंद्र नहीं था, किसी के पास जूते और संसाधन नहीं थे, किसी को समाज की सोच से लडऩा पड़ा, किसी को अपने शरीर और बीमारी से लडऩा पड़ा, किसी को चोट के बाद फिर शुरुआत करनी पड़ी और किसी को खेल की संस्थागत व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज उठानी पड़ी.

इन खिलाडिय़ों की उपलब्धियों को केवल ‘मेहनत का फल’ कह कर छोड़ देना अधूरा होगा. उन की मेहनत असाधारण थी, लेकिन सवाल यह भी है कि अगर व्यवस्था ने शुरुआत से ही उन्हें बेहतर सुविधाएं, पारदर्शी चयन, सुरक्षित प्रशिक्षण वातावरण, वैज्ञानिक कोचिंग और आर्थिक सहायता दी होती, तो भारत ऐसी कितनी और प्रतिभाओं को विश्व मंच तक पहुंचा सकता था?

 हजारों प्रतिभाएं रास्ते में ही क्यों छूट जाती हैं

यही भारतीय खेल की सब से बड़ी विडंबना है. हम पदक जीतने वाले खिलाडिय़ों की सफलता पर गर्व करते हैं, लेकिन उन हजारों बच्चों की कहानी भूल जाते हैं जिन की प्रतिभा गरीबी, सुविधाओं की कमी, भेदभाव या खेल व्यवस्था की दीवारों से टकरा कर रास्ते में ही दम तोड़ देती है. बड़ा सवाल यह है कि जब खिलाड़ी संघर्ष कर रहा था तब व्यवस्था कहां थी?

खिलाडिय़ों का मानसिक शोषण

खेल में शोषण हमेशा छूने या धमकाने से नहीं होता. गौरतलब है कि खिलाडिय़ों का मानसिक शोषण भी उन की खेल स्पिरिट को मंद कर देता है. कभीकभी शब्द भी बहुत घातक हथियार बन जाते हैं-

‘तुम टीम में नहीं रहोगी.’

‘तुम्हारा कैरियर खत्म कर देंगे.’

‘हमारे खिलाफ जाओगी तो कहीं नहीं खेल पाओगी.’

‘चुप रहो, वरना चयन नहीं होगा.’

‘तुम्हारी जगह लेने वाले बहुत हैं.’

ऐसे वाक्य किसी खिलाड़ी को बाहर से चोट नहीं पहुंचाते, लेकिन भीतर से तोड़ देते हैं. युवा खिलाड़ी वर्षों की मेहनत के बाद राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचता है. उस के सामने उस का पूरा भविष्य होता है. दूसरी तरफ एक ऐसा अधिकारी होता है जो चयन समिति, कैंप, यात्रा, प्रतियोगिता और संसाधनों पर अपना प्रभाव रखता है. खिलाड़ियों के भविष्य की डोर उस की उंगलियों में फंसी होती है. इसी का फायदा उठा कर खिलाड़ियों पर मानसिक दबाव बनाया जाता है. सब से दुखद बात यह है कि ज्यादातर खिलाड़ी इन बातों की शिकायत नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें डर होता है कि अगर आवाज उठाई तो उन की वर्षों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा, उन्हें खेल संस्थान से बाहर कर दिया जाएगा. जब राजनीतिक पद, खेलसंघ और प्रशासनिक शक्ति एक ही जगह इकटठी हो जाती हैं तो खिलाड़ी कमजोर और अकेला पड़ जाता है.

फंड में हेराफेरी

सरकारी फंड से अकादमियों को मिलने वाले डाइट मनी, ट्रेनिंग किट और इंफ्रास्ट्रक्चर के पैसों में हेरफेर के मामले सामने आते रहे हैं. खिलाडिय़ों को मिलने वाली खुराक का स्तर बेहद खराब पाया जाता है जबकि कागजों में पूरा बजट खर्च दिखाया जाता है. कई राज्य स्तरीय अकादमियों और निजी सैंटरों पर आरोप लगते रहे हैं कि राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भेजने या ट्रायल पास कराने के लिए खिलाडिय़ों से रिश्वत मांगी जाती है.

कौमनवैल्थ गेम्स में पदक जीत कर लौटे खिलाडय़िों का स्वागत कीजिए, उन पर पुष्पवर्षा कीजिए, उन के घर जाइए, उन के मातापिता को सम्मान दीजिए, उन्हें आर्थिक सहायता दीजिए, लेकिन इस के साथसाथ उस व्यवस्था को बदलने की कोशिश शुरू होनी चाहिए जिस में जेनएल्फा और जेनबीटा का खिलाड़ी प्रवेश करने वाले हैं.

यहां धोनी वाला बौक्स….

फिल्मों ने दिखाया खिलाड़ियों का संघर्ष

भारतीय खेलों की चमकदार तसवीर के पीछे संघर्ष, गरीबी, भेदभाव, चोट, पारिवारिक दबाव और खेल व्यवस्था की बेरुखी की एक दुखभरी दुनिया भी है. पत्रकारिता जगत इस अंधेरे पक्ष को उजागर करने में हमेशा कोताही बरतता रहा, मगर हिंदी सिनेमा ने समयसमय पर इस अनदेखी दुनिया को परदे पर उतारने की हिम्मत दिखाई है.

‘चक दे इंडिया’ में महिला हौकी खिलाडिय़ों को सिर्फ मैदान के प्रतिद्वंद्वी से नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था के पूर्वाग्रहों से भी लड़ते दिखाया गया है. इस फिल्म ने बताया कि खिलाड़ियों को कैसे उन की क्षमता से ज्यादा उन के प्रदेश, भाषा और निजी जीवन के आधार पर परखा जाता है. महिला हौकी टीम के कोच कबीर खान का संघर्ष उस व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है जो प्रतिभा से पहले पहचान देखती है.

फिल्म ‘दंगल’ का संघर्ष अखाड़े में भी है और अखाड़े के बाहर भी. बेटियों को कुश्ती लड़ते देख गांव व समाज की हंसी व ताने और लड़कियों के लिए तय पारंपरिक भूमिकाओं को चुनौती देती इस फिल्म ने गांव से ले कर खेल अकादमी तक समाज और व्यवस्था की असलियत उजागर की है. लड़कियों का बाल कटवाना और लडक़ों के साथ कुश्ती की कठोर ट्रेनिंग करना उन दृश्यों में शामिल है, जहां सामाजिक सोच से सीधा टकराव दिखाई देता है.

फिल्म ‘मैरी कौम’ में गरीबी, पारिवारिक जिम्मेदारी, महिला होने की सामाजिक बंदिश और मां बनने के बाद खेल में वापसी का संघर्ष सामने आता है. वहीं ‘पंगा’ दिखाती है कि शादी और मातृत्व के बाद एक महिला खिलाड़ी के लिए दोबारा मैदान में लौटना कितना कठिन हो सकता है. इन फिल्मों में सवाल केवल पदक का नहीं, बल्कि यह तय करने के अधिकार का है कि महिला अपने जीवन का रास्ता खुद चुन सकती है या नहीं?

‘सांड की आंख’ में उम्र और लिंग दोनों सामाजिक पूर्वाग्रह बन कर सामने आते हैं. बुजुर्ग महिलाओं का निशानेबाजी सीखना ही उस सोच के खिलाफ विद्रोह है, जो मानती है कि खेल युवाओं और पुरुषों का क्षेत्र है.

‘साइना’ और ‘शाबाश मिठू’ जैसी फिल्मों में महिला खिलाडिय़ों के प्रशिक्षण, अनुशासन और पहचान बनाने की मुश्किलें सामने आती हैं. भारतीय महिला खिलाडिय़ों पर बनी फिल्मों ने खिलाडिय़ों के चयन, प्रशासनिक राजनीति और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों को बड़े सशक्त तरीके से उठाया है.

लेकिन सब से कड़वी तसवीर ‘पान सिंह तोमर’ और ‘भाग मिल्खा भाग’ जैसी फिल्मों में दिखाई देती है. मिल्खा सिंह के जीवन में विभाजन का दर्द और दहशत के साथ उन का व्यक्तिगत संघर्ष दिखाया गया है, जबकि पान सिंह तोमर की कहानी में एक राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी भी व्यवस्था और सामाजिक परिस्थितियों की उपेक्षा का शिकार किस तरह हो सकता है, इस का खुलासा है.

इन फिल्मों का असली महत्त्व यही है कि ये पदक की चमक के पीछे छिपे कड़े संघर्ष को दिखाती हैं. खिलाड़ी मैदान पर हारता या जीतता जरूर है, लेकिन उस की सब से कठिन लड़ाई अकसर मैदान के बाहर ही होती है.

अफसोस की बात यह है कि किसी खिलाड़ी ने अपनी ऐसी जीवनी नहीं लिखी जिस ने सरकारी व्यवस्था को जोरदार बखिया उखेड़ी हो. खिलाड़ी अपना मनोबल इस तरह खो बैठते हैं कि उन में तर्क और तथ्य जमा कर लिखने का साहस नहीं रहता. यह भी बड़े अफसोस की बात है कि ज्यादातर खिलाड़ी हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं को ही जानते हैं जबकि एस्टैब्लिशमैंट सारा इंग्लिश में काम करता है. खिलाड़ी नियम, कानून, बजट, न्याय जैसी बातें समझा ही नहीं पाते. Indian Sports System

 

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