Captain Smit Machar: “दर्द में हनुमान चालीसा पढ़ते रहे कैप्टन स्मित”. 3 अक्टूबर को नवभारत टाइम्स ने इस शीर्षक के साथ अख़बार के फ्रंट पेज पर खबर छापी. इस खबर के अनुसार कैप्टन स्मित ने प्रधानमंत्री मोदी से हॉस्पिटल के बेड पर से वीडियो कॉल पर 9 मिनट बात की. अख़बार को इस 9 मिनट की बातचीत में सिर्फ वह बात इतनी महत्वपूर्ण लगी जिसमें कैप्टन ने कहा की हनुमान चालीसा की वजह से उनकी जान बची. अख़बार ने कैप्टन स्मित के हवाले से फ्रंट पेज पर लिखा कि “जब मैं दर्द में होता हूँ तो हनुमान चालीसा पढ़ता हूँ और उस घटना के दौरान भी मैं हनुमान चालीसा पढ़ रहा था और मुझे पता है कि भगवान ने ही मुझे बचाया” अब सवाल यह है कि क्या 9 मिनट की बातचीत में सिर्फ यही बातें इतनी महत्वपूर्ण थीं जिसे अख़बार के पहले पन्ने पर जगह दी गई?
कैप्टन स्मित ने अपनी जान पर खेलकर सैकड़ों लोगों को बचाया. इसके लिए उनकी जितनी तारीफ की जाए कम है लेकिन कैप्टन स्मित की आस्था उनका निजी मामला है. दर्द में कोई हनुमान चालीसा पढ़े, कोई नानक नाम जपे या कोई अल्लाह को याद करे, इससे किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए. दिक्कत तब शुरू होती है जब एक सेकुलर कहलाने वाला अखबार उस निजी भावुकता को फ्रंट पेज पर चमत्कार बनाकर पेश करता है. यही है आज की मेनस्ट्रीम मीडिया की औकात. ये पत्रकारिता नहीं, धर्म की दलाली है.
अखबार का काम सवाल पूछना है, भ्रम फैलाना नहीं लेकिन नवभारत टाइम्स ने वही किया जो आजकल हर बड़ा चैनल और अखबार कर रहा है. धर्म बेचो, TRP कमाओ. कैप्टन स्मित को अपनी आस्था की अभिव्यक्ति की पूरी आजादी भी है लेकिन अख़बार एक सेकुलर संस्था होती है उसे किसी की भावुकता भरी अभिव्यक्ति को इस तरह पेश नहीं करना चाहिए जिससे किसी खास धर्म के प्रति लोगों में भ्रम पैदा हो.
सवाल यह है कि अगर हनुमान चालीसा पढ़ने से जान बचती है तो कैप्टन स्मित को संघर्ष ही क्यों करना पड़ा? वो तो चालीसा पढ़ रहे थे, भगवान को एक पल में आकर सब ठीक कर देना चाहिए था. फिर खून, दर्द, अस्पताल, ऑपरेशन ये सब क्यों? अगर भगवान अपनी चापलूसी से खुश होकर एक व्यक्ति की जान बचा सकता है तो पिछले साल हुए विमान हादसे में 200 से ज्यादा लोगों की जानें क्यों गईं? अगर भगवान कैप्टन स्मित की जान बचा सकता है तो पिछले साल ही नदी में कई लोग मारे गये और इस दुर्घटना में एक बच्चे को बचाते हुए उसकी मां भी मारी गई थी. क्या इन दर्दनाक मौतों के लिए भगवान जिम्मेदार नहीं है?
क्या इस तरह की बातें दिल्ली अग्निकांड, सत्य निकेतन हादसा, लखनऊ हादसा और नेपाल त्रासदी में मरने वालों के साथ मज़ाक नहीं है? मक्का में हज के दौरान 2 हजार से ज्यादा हाजियों की मौतें हुईं तब अल्लाह कहाँ था? दुर्घटनायें होती हैं कई लोग मारे जाते हैं और कई लोग बच भी जाते हैं इन्हें चमत्कार नहीं हादसा समझकर कारणों को ढूंढा जाना चाहिए. इसपर धर्म का झूठा बखेड़ा खड़ा करना बिलकुल भी सही नहीं है.
कैप्टन स्मित हनुमान चालीसा की वजह से नहीं बचे, वो अपनी बहादुरी और सूझबूझ की वजह से बचे. अगर चालीसा में जान बचाने की ताकत होती तो अस्पतालों में डॉक्टरों की जगह पुजारी बैठे होते और दवाओं की जगह चालीसा की किताबें बंट रही होतीं लेकिन आज की दलाल मीडिया को ये बात समझ नहीं आएगी क्योंकि मीडिया को अब खबर नहीं चाहिए, उसे भक्त चाहिए. उसे पाठक नहीं चाहिए, उसे भीड़ चाहिए इसीलिए 9 मिनट की बातचीत में से उसने वो 10 सेकंड चुन लिए जिससे धर्म का नशा और गहरा हो.
असल में तो यह पत्रकारिता की मौत है. जब अखबार फ्रंट पेज पर तर्क की जगह चमत्कार छापने लगे, समझ लो कि वो अब लोकतंत्र का पहरेदार नहीं, धर्मसत्ता का प्रचारक बन चुका है. कैप्टन की बहादुरी को नमन है लेकिन उनकी बहादुरी को चालीसा का चमत्कार बताकर छोटा करना सही नहीं है. दलाल मीडिया से सीधा सवाल यह है कि अगली बार जब कोई विमान हादसा होगा और उस हादसे कोई नहीं बचेगा तो क्या फ्रंट पेज पर यह खबर छापी जाएगी कि भगवान ने उन्हें क्यों नहीं बचाया? Captain Smit Machar





