जिस देश में संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार देता है, वहां अब संविधान की बात करना ही अपराध बन गया है. गांधी जयंती के दिन मुंबई के शिवाजी पार्क में चुनाव आयोग की निष्पक्षता और वोटर लिस्ट से जुड़े सवालों को लेकर प्रदर्शन करने पहुंचे सीजेपी के लोगों को पुलिस ने बसों में भरकर हिरासत में ले लिया. दूसरी तरफ यही बीजेपी सरकार धार्मिक जुलूसों के लिए सड़कें खाली कराती है, सुरक्षा देती है और पूरी मशीनरी लगा देती है. ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या संविधान, चुनाव और अपने वोट के अधिकार की बात करने वाला नागरिक अपराधी है?
किसी भी लोकतंत्र की बुनियाद निष्पक्ष चुनाव पर खड़ी होती है. अगर चुनाव ही फिक्स हो जाएँ तो डेमोक्रेसी की मौत तय हो जाती है. 2023 के बाद से चुनाव आयोग का रवैया लोकतंत्र का गला घोंटने का ही रहा. चुनाव आयोग बीजेपी का दफ्तर बन गया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार बीजेपी के लिए काम करते नजर आये. वोटर लिस्ट से गायब होते रहे और जनता चुपचाप लोकतंत्र की मौत का तमाशा देखती रही. सितंबर में जब इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के करनामे सुबूत के साथ बाहर आये तो जनता को होश आया. इसी मुद्दे को लेकर 2 अक्टूबर को CJP ने मुंबई के शिवाजी पार्क में शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट का ऐलान किया था. सीजेपी के लोग इसी धांधली के लिए जिम्मेदार मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांग रहे थे. असल में तो यह लोकतंत्र को बचाने की आखिरी कोशिश ही है.
सरकार का रवैया यह था कि गांधी जयंती पर सीजेपी के शांतिपूर्ण प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी गई. शिवाजी पार्क को पुलिस छावनी में बदल दिया गया और लोगों को बसों में भरकर थाने ले जाया गया. अब सवाल यह है कि क्या यह सरकार जनता की है या सिर्फ धर्म के धंधेबाजों की है? मुंबई पुलिस ने पहले ही इस प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया इसके लिए पुलिस ने बॉम्बे हाईकोर्ट के 2013 के आदेश का हवाला दिया था. अनुमति न मिलने के बाद CJP ने कहा कि वो शांतिपूर्ण तरीके से जमा होंगे और गिरफ्तारी देंगे. दोपहर बाद शिवाजी पार्क के बाहर प्रदर्शनकारी जुटने लगे तो पुलिस ने सुरक्षा कड़ी कर दी और लोगों को बसों में भरकर हिरासत में लेना शुरू किया. दिल्ली के जंतर मंतर पर भी AISA और यूथ कांग्रेस के प्रदर्शनकारियों को इसी तरह हिरासत में लिया गया.
CJP का दावा था कि 2 अक्टूबर को करीब 50 हजार लोग जुट सकते हैं और इसके लिए उन्होंने 200 वॉलंटियर और मेडिकल कैंप की व्यवस्था की थी. वहीं 2 अक्टूबर के आंदोलन से एक दिन पहले CJP संस्थापक अभिजीत डिपके को मरीन ड्राइव पर तख्तियां लेकर घूमते हुए पुलिस ने कुछ देर के लिए हिरासत में लिया था हालांकि बाद में उन्हें छोड़ दिया गया था.
मुंबई भारत का दिल है. इसे भारत की फाइनेंशियल कैपिटल भी कहते हैं. यहां शेयर मार्केट है. यहां बड़े बैंक हैं. यहां फिल्म इंडस्ट्री है. यहीं देश का सबसे बड़ा प्रोटेस्ट शुरू हो चुका है. अगर दादर, शिवाजी पार्क और आसपास की सड़कें बंद हुईं तो लोकल ट्रेन पर भी असर पड़ेगा. ऑफिस जाने वाले लोग फंस जाएंगे. शेयर मार्केट के लोग समय पर नहीं पहुंच पाएंगे. दुकानें बंद होंगी. होटल और टैक्सी का काम रुकेगा. अगर यह प्रोटेस्ट लंबा चला तो दुनिया भर में खबर जाएगी कि भारत की फाइनेंशियल कैपिटल में अशांति है. निवेशक डर जाएंगे. उन्हें लगेगा कि यहां स्थिरता नहीं है. मुंबई पुलिस के रवैवे के बाद CJP ने कहा है कि वो घर नहीं जाएंगे और जब तक ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा नहीं हो जाता तब तक शिवाजी पार्क में डटे रहेंगे. सवाल यह है कि अगर हजारों लोग सड़क पर सो गए तो पुलिस क्या करेगी? क्या सरकार के लिए इतने लोगों को बसों में भरकर ले जाना आसान होगा?
CJP कह तो रही है कि वे गांधी के रास्ते पर चलते हुए प्रोटेस्ट को शांतिपूर्ण बनाये रखेंगे लेकिन भीड़ को कंट्रोल करना मुश्किल होता है. एक छोटी सी चिंगारी बड़ी आग बना सकती है. अब सबकी नजर मुंबई पुलिस पर है. क्या पुलिस इन प्रदर्शनकारियों को कंट्रोल कर पायेगी? वैसे तो भाजपा सरकार को बसों में भरकर लोगों को ले जाने का बहुत पुराना अनुभव है. जब CJP के लोग गांधी जयंती पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हैं तो उन्हें बसों में भरकर थाने ले जाया जाता है. जब छात्र जंतर मंतर पर पेपर लीक पर आंदोलन करते हैं तो उन्हें बसों में भरकर कहीं दूर छोड़ दिया जाता है लेकिन जब कांवड़िए सड़क जाम करते हैं तो उन्हीं बसों से उन्हें जल चढ़ाने के लिए भेजा जाता है.
यही भाजपा का असली सच है. धर्म एक नशा है और भाजपा इस नशे की डीलर है. कांवड़ियों की भीड़ असल में धर्म के नाम पर तांडव करने वाली भीड़ है. इस भीड़ में वोट बैंक बनने का पोटेन्शियल छुपा होता है इसलिए इनके लिए ट्रेफिक डाइवर्ट किया जाता है, पुलिस सुरक्षा देती है और हेलीकॉप्टर से फूल फेंके जाते हैं लेकिन जो लोग संविधान की बात करते हैं, वोटर लिस्ट में धांधली की बात करते हैं, उन्हें अपराधी की तरह बसों में ठूंस कर थाने ले जाया जाता है. लोकतंत्र का असली मतलब तो यह होता है कि सत्ता का कोई धर्म नहीं होना चाहिए लेकिन भाजपा ने लोकतंत्र को धर्म का गुलाम बना दिया है. कांवड़ यात्रा आस्था नहीं, सत्ता का प्रदर्शन है. उसमें लाठी डंडे चलते हैं, दुकानों पर नाम लिखवाए जाते हैं, फिर भी सरकार कहती है कि यह संस्कृति है और दूसरी तरफ गांधी के नाम पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना अपराध बन जाता है.





