मनोज के गुजर जाने के बाद शालिनी नितांत तन्हा हो गई थी. नया शहर व उस शहर के लोग उसे अजनबी मालूम होते थे. पर वह मनोज की यादों के सहारे खुद को बदलने की असफल कोशिश करती रहती.

शहर की उसी कालोनी के कोने वाले मकान में मानस रहते थे. उन्होंने ही जख्मी मनोज को अस्पताल पहुंचाने के लिए ऐंबुलैंस बुलवाई थी. मनोज की देखभाल में उन्होंने पूरा सहयोग दिया था. सो, मानस से शालिनी का परिचय पहचान में बदल गया था.

मानस ने अपना कर्तव्य सम झते हुए शालिनी को सामान्य जीवन गुजारने के लिए प्रोत्साहित करते हुए कहा, ‘‘शालिनीजी, आप कल से फिर मौर्निंगवाक शुरू कर दीजिए, पहले मैं ने आप को अकसर पार्क में वाक करते हुए देखा है.’’

‘‘हां, पहले मैं नित्य मौर्निंगवाक पर जाती थी. मनोज जिम जाते थे और मु झे वाक पर भेजते थे. उन के बाद अब

दिल ही नहीं करता,’’ उदास शालिनी

ने कहा.

‘‘मैं आप की मनोदशा सम झ सकता हूं. 4 साल पहले मैं भी अपनी पत्नी खो चुका हूं. जीवनसाथी के चले जाने से जो शून्य जीवन में आ जाता है उस से मैं अनभिज्ञ नहीं हूं. किंतु सामान्य जीवन के लिए खुद को तैयार करने के सिवा अन्य विकल्प नहीं होता है.’’

दो पल बाद वे फिर बोले, ‘‘मनोजजी को गुजरे हुए 3 महीने से ज्यादा हो चुके हैं. अब वे नहीं हैं, इसलिए आप को अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है. आप खुद को सामान्य दिनचर्या के लिए तैयार कीजिए.’’

मानस ने अपना तर्क रखते हुए आगे कहा, ‘‘शालिनीजी, मैं आप को उपदेश नहीं दे रहा बल्कि अपना अनुभव बताना चाहता हूं. सच कहता हूं, पत्नी के गुजर जाने के बाद ऐसा महसूस होता था जैसे जीवन समाप्त हो गया, अब दुनिया में कुछ भी नहीं है मेरे लिए, किंतु ऐसा होता नहीं है. और ऐसा सोचना भी उचित नहीं है. किंतु मृत्यु तो साथ संभव नहीं है. जिस के हिस्से में जितनी सांसें हैं, वह उतना जी कर चला जाता है. जो रह जाता है उसे खुद को संभालना होता है. मैं ने उस विकट स्थिति में खुद को व्यस्त रखने के लिए मौर्निंगवाक शुरू की, फिर एक कोचिंग इंस्टिट्यूट जौइन कर लिया. रिटायर्ड प्रोफैसर हूं, सो पढ़ाने में दिल लगता ही है. इस के बाद भी काफी समय रहता है, उस में व्यस्त रहने के लिए घर पर ही कमजोर वर्ग के बच्चों को फ्री में ट्यूशन देता हूं तथा हफ्ते में 2 दिन सेवार्थ के लिए एक अनाथाश्रम में समय देता हूं. इस तरह के कार्यों से अत्यधिक आत्मसंतुष्टि तो मिलती ही है, साथ ही समय को फ्रूटफुल व्यतीत करने का संतोष भी प्राप्त होता है. आप से आग्रह करना चाहता हूं कि आप इन कार्यों में मु झे सहयोग दें.

‘‘अच्छा, अब मैं चलता हूं. कल सुबह कौलबैल दूंगा, निकल आइएगा, मौर्निंगवाक पर साथ चलेंगे, शुरुआत ऐसे ही कीजिए.’’

अन्य विकल्प न होने के कारण शालिनी ने सहमति में सिर हिला दिया.

सच में मौर्निंगवाक की शुरुआत से वह एक ताजगी सी महसूस करने लगी. उस ने मानस के साथ कमजोर वर्ग के बच्चों को पढ़ाना व अनाथालय में समय देना भी प्रारंभ कर दिया. इन सब से उसे अद्भुत आत्मसंतुष्टि का अनुभव होता.

दो दिनों से मानस मौर्निंगवाक के लिए नहीं आए. शालिनी असमंजस में पड़ गई, शायद मानस ने सोचा हो कि शुरुआत करवा दी, अब उसे खुद ही करना चाहिए. शालिनी पार्क तक चली गई. किंतु उसे  मानस वहां भी दिखाई नहीं दिए. जब तीसरे दिन भी वे नहीं आए तब उसे भय सा लगने लगा कि कहीं एक विधवा और एक विधुर के साथ का किसी ने उपहास बना, मानस को आहत तो नहीं कर दिया, कहीं उन के साथ कुछ अप्रिय तो घटित नहीं हो गया, ऐक्सिडैंट…? नहींनहीं, वे ठीक हैं, उन के साथ कुछ भी बुरा नहीं हुआ है. इन्हीं उल झनों में उस के कदम मानस के घर की ओर बढ़ चले. दरवाजे पर ताला पड़ा था. दो पल संकोचवश ठिठक गई, फिर वह उन के पड़ोसी अमरनाथ के घर पहुंच गई. अमरनाथ और उन की पत्नी ने उस का स्वागत करते हुए कहा, ‘‘आइए, शालिनीजी, कैसी हैं? हम लोग आप के पास आने की सोच रहे थे किंतु व्यस्तता के कारण समय न निकाल पाए.’’

शालिनी ने उन्हें धन्यवाद देते हुए पूछा, ‘‘आप के पड़ोसी मानसजी क्या बाहर गए हुए हैं? उन के घर पर…’’

‘‘नहींनहीं, उन्हें डिहाइड्रेशन हो गया था. वे अस्पताल में हैं. हम उन से कल शाम मिल कर आए हैं. अब वे ठीक हैं,’’ अमरनाथजी ने बताया.

शालिनी सीधे अस्पताल चल दी. विजिटिंग आवर होने के कारण वह मानस के समक्ष घबराई सी पहुंच गई, ‘‘कैसे हैं आप, क्या हो गया, कैसे हो गया, आप ने मु झे इतना पराया सम झा जो अपनी तबीयत खराब होने की सूचना तक नहीं दी. मैं पागलों सी परेशान हूं. न दिन में चैन है न रात में नींद.’’

‘‘ओह शालू, इतना मत परेशान हो, मु झे माफ कर दो. मु झे तुम्हें खबर करनी चाहिए थी किंतु तुम्हें मेरा हाल

कैसे मालूम हुआ?’’ मानस ने आश्चर्य

से कहा.

‘‘आज मैं हैरानपरेशान अमरनाथजी के घर पहुंच गई. वहीं से सब जान कर सीधी चली आ रही हूं. आप बताइए, अब आप कैसे हैं, तथा यह हाल कैसे हुआ?’’ शालिनी की आंखें सजल हो उठीं.

मानस भी भावुक हो उठे, उन्होंने शालिनी का हाथ अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘प्लीज, परेशान मत हो, मैं एकदम ठीक हूं. उस दिन रामरतन रात में खाना बनाने न आ सका, साढ़े 8 बजे के बाद फोन करता है, ‘सर, आज नहीं आ सकूंगा, पत्नी को बहुत चक्कर आ रहे हैं.’ मैं ने कह दिया कि ठीक है, तुम पत्नी को डाक्टर को दिखाओ, अभी मैं ही कुछ बना लेता हूं. सुबह सब ठीक रहे तो जरूर आ जाना.

‘‘मैं ने कह तो दिया, किंतु कुछ बना न सका. सो, नुक्कड़ की दुकान से पकौड़े ले आया, वही हजम नहीं हुए बस, रात से दस्त और उल्टियां शुरू हो गईं.’’

‘‘मनजी, आप मु झे कितना पराया सम झते हैं. मेरे घर पर, खाना खा सकते थे, किंतु नहीं, आप नुक्कड़ की दुकान पर पकौड़े लेने चल दिए, जबकि आप के घर से दुकान की अपेक्षा मेरा घर करीब है. सिर्फ आप बात बनाते हैं कि तुम्हें अपनत्व के कारण सम झाता हूं कि स्वयं को संभालो और सामान्य दिनचर्या का पालन करो. मैं ने आज आप का अपनापन देख लिया.’’

‘‘सौरी शालू, मु झे माफ कर दो,’’ मानस ने अपने कान पकड़ते हुए कहा, ‘‘वैसे अच्छा ही हुआ, तुम्हें खबर कर देता तो तुम्हारा यह रूप कैसे देख पाता, तुम्हें मेरी इतनी फिक्र है, यह तो जान सका.’’

शालिनी ने हौले से मानस की बांह में धौल जमाते हुए अपनी आंखें पोंछ लीं तथा मुसकरा दी.

भावनाओं की आंधी सारी औपचारिकताएं उड़ा ले गई. मानस शालिनी को ‘शालू’ कह बैठे, वही हाल शालिनी का था, वह  ‘मानसजी’ की जगह ‘मनजी’ बोल गई. भावनाओं के ज्वार में मानस भूल ही गए कि उन के कमरे में उन की बेटी सुगंधा भी मौजूद है. शालिनी तो उस की उपस्थिति से अनभिज्ञ थी, अतिभावुकता में उसे मानस के सिवा कुछ दिखाई ही नहीं दिया.

एकाएक मानस की नजरें सुगंधा से

टकराईं. संकोचवश शालिनी का

हाथ छोड़ते हुए उन्होंने परिचय करवाते हुए कहा, ‘‘शालिनी, इस से मिलो, यह मेरी प्यारी बेटी सुगंधा है. यह आई तो औफिस के काम से थी किंतु मेरी तीमारदारी में लग गई.’’

शालिनी को सुगंधा की उपस्थिति का आभास होते ही उस की हालत तो रंगे हाथों पकड़े गए चोर सी हो गई. वह सुगंधा से दोचार औपचारिक बातें कर  झटपट विदा हो ली.

अस्पताल से लौटते समय शालिनी अत्यधिक सकुचाहट में धंसी जा रही थी. वह भावावेश में क्याक्या बोल गई, न जाने मानस क्या सोचते होंगे. सुगंधा का खयाल आते ही उस की सकुचाहट बढ़ जाती, न जाने वह बच्ची क्या सोचती होगी, कैसे उस का ध्यान सुगंधा पर नहीं गया, वह स्वयं को सम झाती. मानस के लिए व्यथित हो कर ही तो वह अस्पताल पहुंच गई थी, भावनाओं पर उस का नियंत्रण नहीं था. इसलिए जो मन में था, जबान पर आ गया.

मानस घर आ गए थे. अब वे पूरी तरह स्वस्थ थे. सुगंधा को कल लौट जाना था.

सुगंधा ने मानस एवं शालिनी के  परस्पर व्यवहार को अस्पताल में देखा था. इतना तो वह सम झ चुकी थी कि दोनों के मध्य अपनत्व पनप चुका है, बात जाननेसम झने की इच्छा से उस ने बात छेड़ते हुए कहा, ‘‘पापा, शालिनी आंटी इस कालोनी में नई आई हैं, मैं ने उन्हें पहले कभी नहीं देखा?’’

‘‘हां बेटा, महीने पहले ही आई हैं. उन के पति मनोज बैंक मैनेजर थे. काफी हंसमुख, जिंदादिल इंसान थे. 3 महीने पहले कालोनी के मोड़ पर नशे में धुत ट्रक ड्राइवर ने उन पर गाड़ी चढ़ा दी. बेचारे बुरी तरह जख्मी हो गए थे. मैं ने ही ऐंबुलैंस मंगवा कर उन्हें अस्पताल ले जाने की व्यवस्था की थी. किंतु जीवनमृत्यु के कड़े संघर्ष में जीवन पर मृत्यु भारी पड़ी, वे चल बसे. शालिनीजी तन्हा रह गईं. वे बेहद उदास रहती थीं. मैं ने अपना कर्तव्य सम झ उन्हें सामान्य जीवन हेतु प्रोत्साहित किया. हम मौर्निंगवाक पर साथ जाने लगे तथा वे मेरे साथ बच्चों को पढ़ाने एवं अनाथाश्रम में भी समय देने लगीं.’’

‘‘पापा, आप ने उन्हें सहयोग दे कर बहुत अच्छा किया. उन पर तो सच में बहुत बड़ी विपत्ति आ पड़ी. पापा…’’ इतने में उस के पति कुणाल का फोन आ गया. वह उस में व्यस्त हो गई.

शाम की चाय पितापुत्री ने साथ ही ली. मानस बोले, ‘‘साथ में चाय पीने का आनंद ही कुछ और है, वरना टीवी के आगे अकेले पीनी पड़ती है, तो यह मजा नहीं आता.’’

प्याले की चाय खत्म करते हुए सुगंधा ने हंसते हुए कहा, ‘‘बात तो सही है पापा, मु झे भी आप के साथ चाय पीने में चाय ज्यादा स्वादिष्ठ लगी. पापा, मु झे शालिनी आंटी से मिलना है, प्लीज, मु झे उन के घर ले चलिए.’’

संकोचवश, मानस ने थोड़ा नानुकर की किंतु इच्छा तो उन की भी थी. सो सुगंधा की जिद के बहाने चल दिए शालिनी के घर.

शालिनी अचानक मानस एवं सुगंधा को अपने घर आया देख, अत्यधिक आश्चर्यचकित थी, किंतु उस की खुशी अवर्णित थी. वह दोनों की आवभगत में लग गई. सुगंधा ने प्रशंसा करते हुए कहा, ‘‘आंटी, आप का घर बहुत सुंदर है. आप ने सजाया भी बहुत सुंदर  है,’’ वह एक पेंटिंग देख कर मुग्ध सी हो कर बोली, ‘‘आंटी, बड़ी सुंदर पेंटिंग है. इस में आप का नाम लिखा है. क्या यह पेंटिंग आप ने बनाई है?’’

‘‘हां, यह पेंटिंग मैं ने मनोज की पसंद पर बनाई थी. मु झे पेंटिंग का शौक है,’’ शालिनी ने कहा.

शालिनी ने दोनों से डिनर के लिए आग्रह किया. दोनों ने आग्रह स्वीकार किया. तीनों को ही परस्पर साथ अच्छा लग रहा था.

शालिनी डिनर की तैयारी हेतु रसोई में चली गई. सुगंधा भी साथ हो ली. वह शालिनी से घुलमिल कर मदद करने लगी. मानस यह कहते हुए चले आए, ‘‘मु झे भी कुछ काम दे दो, कुछकुछ बनाना तो मैं भी जानता हूं.’’

‘‘हांहां जानते हैं, तभी तो उस दिन कुछ न बना कर पकौड़े लेने नुक्कड़ की दुकान पर चले गए थे,’’ शालिनी के कटाक्ष पर तीनों ही हंस पड़े.

तीनों ने साथ ही डिनर किया, सुगंधा ने खुश होते हुए कहा, ‘‘पापा, आंटी तो मम्मा जैसी कुशल कुक हैं. इन के हाथों में भी वही जादू है कि खाने वाला उंगलियां चाटता रह जाए. मैं ने ठीक कहा न पापा?’’

मानस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हंड्रैड परसैंट सही कहा बेटा. अच्छा देखो, व्यंजन भी शुभि की पसंद के हैं. वह भी ये ही व्यंजन बनाती थी, मलाईकोफ्ते, पनीरमसाला, बूंदी रायता, जीरा राइस, चपाती, सलाद, हरी चटनी, और मीठे में पुडिंग.’’

सुगंधा ने आश्चर्य से कहा, ‘‘आंटी, आप तो हमारे आने के बाद बाहर भी नहीं गई हैं, फिर भी इतनी तरह के व्यंजन बना लिए. क्या आप रोज…’’

सुगंधा की बात खत्म नहीं हुई थी कि शालिनी बोल पड़ी, ‘‘नहीं बेटा, मैं रोज इतने व्यंजन नहीं बनाती. पहले जरूर बनाती थी, मनोज खाने के शौकीन थे. दरअसल, मु झे आप दोनों के खाने पर बुलाने का मन था, किंतु बेटा, तुम्हें कल ही लौटना है, सो दुविधावश बोल न सकी. क्या मालूम तुम्हारे पास इतना समय है या नहीं, इसलिए सोचा था कि मलाईकोफ्ता और पुडिंग बना कर तुम्हारे घर पहुंचा दूंगी.’’

मानस तपाक से बोले, ‘‘अच्छा हुआ जो हम आ गए वरना आप तो हमें पुडिंग और मलाईकोफ्ते में ही निबटा देतीं. देखो कल ही ठीक हुआ हूं और जम कर खा बैठा,’’ उन के कहने के अंदाज पर तीनों फिर हंस पड़े.

डिनर के बाद मानस एवं सुगंधा घर लौटने लगे. शालिनी ने अपनी एक पेंटिंग सुगंधा को भेंट में दी. सुगंधा, धन्यवादस्वरूप शालिनी का चरण स्पर्श करना चाहती थी, किंतु शालिनी ने सस्नेह उसे गले से लगा लिया. दोनों के मध्य स्नेह की डोर बंध चुकी थी. दोनों को परस्पर स्पर्श आत्मीय जान पड़ा था.

घर पहुंचते ही सुगंधा ने शालिनी की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘‘पापा, शालिनी आंटी मु झे बहुत अच्छी लगीं, एकदम अपनी सी, मानो, बरसों की पहचान हो.’’

मानस चुप ही रहे.

सुगंधा फिर बोली, ‘‘मम्मा की ही तरह शालिनी आंटी सुंदर, व्यवहारकुशल और असाधारण कुक हैं.’’

मानस को सुगंधा द्वारा शालिनी की प्रशंसा एवं अपनी मां से उस की तुलना सुखद जान पड़ रही थी, किंतु वे असमंजस में थे कि क्या प्रतिक्रिया दें. वे बोले, ‘‘तू कुछ और बात भी करेगी या शालिनी आंटी का गुणगान ही करती रहेगी. चल, अभी 9 बजे हैं, सैंट्रल मौल चलते हैं. 5 दिनों के बाद तेरा जन्मदिन है, तेरे लिए तेरी पसंद का कोई गिफ्ट ले लेते हैं, सुबह तो तू चली जाएगी.’’

‘‘पापा, आप मु झे बिना मार्केट गए मु झे मेरी पसंद का गिफ्ट दे सकते हैं. प्रौमिस कीजिए, इनकार नहीं करेंगे,’’ सुगंधा ने अनुनय करते हुए कहा.

‘‘हां बेटा, बोल तू क्या चाहती है. प्रौमिस, मैं सहर्ष तेरे समक्ष प्रस्तुत करूंगा,’’ मानस ने जिज्ञासा से कहा.

‘‘पापा, आप मु झे मम्मी ला दीजिए. आप शालिनी आंटी से  शादी कर लीजिए,’’ सुगंधा ने मानस से नजरें मिलाते हुए कहा.

‘‘क्या मांग लिया बेटा, यह क्या कह दिया, इस उम्र में शादी करने से परिवार, समाज, सब हमारी खिल्ली उड़ाएंगे, सभी हम से रिश्ता समाप्त कर देंगे,’’ मानस ने आहिस्ता से कहा.

‘‘पापा, अब समाज की सोच विकसित हो गई है. सभी इस तरह के विवाह को सहर्ष स्वीकार करते हैं. फिर पापा, तन्हाई तो आप और आंटी  झेलते हैं न, इस बार की ही सोचिए. आप की तबीयत अचानक खराब हो गई, वह तो मौके की बात थी कि मैं पहुंच गई वरना आप अकेले कितने परेशान हो जाते. जीवनसाथी रहने से दोनों एकदूसरे की देखभाल कर लेते हैं,’’ सुगंधा ने अपना तर्क रखा.

‘‘बेटा, तेरी बात सही है किंतु समाज में अनेक हैं जो जीवनसाथी से बिछुड़ कर जीवन व्यतीत कर रहे हैं. अब इस उम्र में शादी…’’

‘‘पापा, मैं औरों की नहीं जानती, मु झे मेरे पापा की फिक्र है. पापा, यह भी सोचिए, दोबारा जीवन में योग्य साथी का आना भी तो एक संयोग ही है. सब को ऐसा मौका नहीं मिल पाता है. आप और आंटी एकदूसरे के योग्य हैं. जीवन के इस मोड़ पर आ मिले हैं तो जीवनसाथी क्यों नहीं बन सकते हैं?

‘‘पापा, मैं भी सब सम झती हूं. आप दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं. फिर शादी करने में क्या हर्ज है? आप दोनों एकदूसरे की परस्पर देखभाल भी कर सकेंगे. एकदूसरे के जीवन के शून्य को भी भर सकेंगे. आप के साथ कोई है इस से मैं भी निश्ंिचत रह सकूंगी. सच कहती हूं पापा, मु झे आप की बहुत चिंता रहती है.’’

मानस शांत, गहन चिंता में बैठ गए. सुगंधा ने ही उन्हें टटोलते हुए कहा, ‘‘क्या बात है पापा, नाराज हो गए?’’

‘‘नहीं, बेटा, तू तो मु झे, मेरे हित में ही सम झा रही है किंतु मु झे भय है. शालिनी मु झे स्वार्थी सम झ मु झ से दोस्ती न तोड़ बैठे. उस का अलगाव मैं सहन न कर सकूंगा,’’ मानस ने धीरेधीरे कहा.

‘‘पापा, वे आप से प्यार करती हैं किंतु नारीसुलभ सकुचाहट तो स्वाभाविक है न, पहल तो आप को ही करनी होगी.’’

‘‘मेरी बेटी, इतनी बड़ी हो गई मु झे पता ही नहीं चला,’’ मानस के इस वाक्य पर दोनों ही मुसकरा दिए.

सुगंधा लौट गई, किंतु मानस को

सम झा कर ही नहीं धमका कर

गई कि वे जल्दी से जल्दी शालिनी से शादी की बात करेंगे वरना वह स्वयं यह जिम्मेदारी पूरी करेगी.

मौर्निंगवाक पर मानस एवं शालिनी सुगंधा के संबंध में ही बातें करते रहे. मानस बोले, ‘‘5 वर्ष हो गए सुगंधा की शादी हुए. जब भी जाती है मन भारी हो जाता है. उस के आने से सारा घर गुलजार हो जाता है, जाती है तो अजीब सूनापन छोड़ जाती है.’’

शालिनी ने कहा, ‘‘बड़ी प्यारी है सुगंधा. खूबसूरत होने के साथसाथ सम झदार भी, उस की आंखें तो विशेष सुंदर हैं, अपने में एक दुनिया समेटे हुए सी मालूम होती है वह.’’

मानस खुश होते हुए बोले, ‘‘वह अपनी मां की कार्बनकौपी है. मैं शुभि को अद्भुत महिला कहता था, रूप एवं गुण का अद्भुत मेल था उस के व्यक्तित्व में.’’

शालिनी सुगंधा के साथ विशेष जुड़ाव महसूस करने लगी थी. उस ने सुगंधा के पति, उस की ससुराल के संबंध में विस्तृत जानकारी ली तथा अत्यधिक प्रसन्न हुई कि बहुत सम झदार एवं संपन्न परिवार है.

मौर्निंगवाक से लौटते समय शालिनी का घर पहले आता है. रोज ही मानस उसे उस के घर तक छोड़ते हुए अपने घर की ओर बढ़ जाते थे, आज शालिनी ने आग्रह करते हुए कहा, ‘‘मनजी, आज आप ब्रेकफास्ट एवं लंच मेरे साथ ही लीजिए. आज ही सुगंधा लौट कर गई है, आप को अपने घर में आज सूनापन ज्यादा महसूस होगा.’’

मानस जल्दी ही मान गए. उन्होंने सोचा, इस बहाने शालिनी से अपने दिल की बात कर सकेंगे.

काफी उल झन के बाद मानस ने शालिनी से साफसाफ कहना उचित सम झा, ‘‘शालू, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं किंतु तुम से एक वादा चाहता हूं. यदि तुम्हें मेरी बात आपत्तिजनक लगे तो साफ इनकार कर देना किंतु नाराजगी से दोस्ती खत्म नहीं करना.’’

शालिनी ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा, ‘‘ऐसा क्यों कह रहे हैं, आप की दोस्ती मेरे जीवन का सहारा है, मनजी. खैर, चलिए वादा रहा.’’

‘‘शालू, मैं तुम से शादी करना चाहता हूं, क्या मेरा सहारा बनोगी?’’ मानस ने शालिनी की आंखों में देखते हुए कहा.

शालिनी ने नजरें  झुका लीं और धीरे से बोली, ‘‘यह क्या कह बैठे, मनजी, भला यह भी कोई उम्र है शादी रचाने की.’’

‘‘देखो शालू, हम दोनों अपनेअपने जीवनसाथी को खो कर जीवन की सांध्यबेला में अनायास ही मिल गए हैं. हम दोनों ही तन्हा हैं. हम एकदूसरे का सहारा बन फिर से जीवन में आनंद एवं उल्लास भर सकते हैं. जीवन के उतारचढ़ाव में परस्पर सहयोग दे सकते हैं.

‘‘मैं अपनी पत्नी शुभि को बहुत चाहता था, किंतु बीमारी ने उसे मु झ से छीन लिया. मेरी शुभि भी मु झे बहुत चाहती थी. अपनी बीमारी के संघर्ष के दौरान भी उसे अपनी जिंदगी से ज्यादा मेरे जीवन की फिक्र थी. एक दिन मु झ से बोली, ‘मनजी, मेरा आप का साथ इतना ही था. आप को अभी लंबा सफर तय करना है. अकेले कठिन लगेगा. मेरे बाद अवश्य योग्य जीवनसाथी ढूंढ़ लीजिएगा,’ अपनी शादी वाली अंगूठी मेरी हथेली पर रख कर बोली, ‘इसे मेरी तरफ से स्नेहस्वरूप आप प्यार से उसे पहना देना. मैं यह सोच कर खुश हो लूंगी कि मेरे मनजी के साथ उन की फिक्र करने वाली कोई है.’’’

मानस, अपनी पत्नी को याद कर बेहद गंभीर हो गए थे, दो पल रुक कर स्वयं को संयत कर बोले, ‘‘मैं ने तुम्हें एवं मनोज को भी साथसाथ देखा था, गृहप्रवेश के अवसर पर तथा अस्पताल के दुखद मौके पर. तुम दोनों का प्यार स्पष्टत: परिलक्षित था. मनोज को भी अपनी जिंदगी से ज्यादा तुम्हारे जीवन की चिंता थी. वे सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी ही चिंता व्यक्त करते थे. मैं आईसीयू में उन से मिलने जब भी जाता, सिर्फ तुम्हारे संबंध में चिंता व्यक्त करते थे. उस दिन उन्हें आभास हो चला था कि वे नहीं बचेंगे. अत्यधिक कष्ट में बोले थे, ‘दोस्त, मैं तुम्हें अकसर पुनर्विवाह की सलाह देता था, और तुम हंस कर टाल जाते थे. किंतु अब तुम से वचन चाहता हूं, मेरी शालू को अपना लेना. तुम्हारे साथ वह सुरक्षित है, यह सोच मुझे शांति मिलेगी. हम ने परिवारों के विरोध के बावजूद अंतर्जातीय विवाह किया था. सभी संबंध खत्म हो गए थे. मेरे बाद एकदम अकेली हो जाएगी मेरी शालू. दोस्त, मेरा आग्रह स्वीकार कर लो, मेरे पास समय नहीं है.’

‘‘उन की दर्द भरी याचना पर मैं हां तो न कर सका था किंतु स्वीकृति हेतु सिर अवश्य हिला दिया था. मेरी सहमति जान कर उस कष्ट एवं दर्द में भी उन के चेहरे पर एक स्मिति छा गई थी किंतु शालिनी, तुम्हारी नाराजगी के डर से मैं तुम से कहने का साहस न जुटा सका था.

‘‘सच कहता हूं शालू, सांत्वना और सहयोग ने मनोज के आग्रह के बाद कब प्यार का रूप ले लिया, इस का आभास मु झे भी नहीं हुआ. किंतु मेरे प्यार की सुगंध मेरी बेटी सुगंधा ने महसूस कर ली है,’’ कहते हुए मानस धीरे से मुसकरा दिए.

शालिनी नीची नजरें किए हुए शांत बैठी थी. मानस ने ही कहा, ‘‘शालू, मैं ने तुम्हें मनोजजी की, सुगंधा की एवं अपनी भावनाएं बता दी हैं. अंतिम निर्णय तुम ही करोगी. तुम्हारी सहमति के बिना हम कुछ भी नहीं करेंगे.’’

शालिनी ने आहिस्ताअहिस्ता कहना शुरू किया, ‘‘मनोज ने जैसा आग्रह आप से किया था वैसी ही इच्छा मु झ से भी व्यक्त की थी. मु झ से कहा था, ‘शालू, दुनिया में अकेली औरत का जीवन दूभर हो जाता है. मानसजी भले इंसान हैं तथा विधुर भी हैं. उन का हाथ थाम लेना. तुम सुरक्षित रहोगी तो मुझे शांति मिलेगी.’ मेरी चुप्पी पर अधीर हो कर बोले थे, ‘शालू, मान जाओ, हां कह दो, मेरे पास समय नहीं है.’

‘‘उन की पीड़ा, उन की अधीरता देख मैं ने भी स्वीकृति में सिर हिला दिया था. मेरी स्वीकृति मान उन्होंने हलकी मुसकराहट से कहा था, ‘मेरी शादी वाली अंगूठी मेरी सहमति मान, मानस को पहना देना. उस में लिखा ‘एम’ अब उन के लिए ही है.’ किंतु मैं भी आप की दोस्ती न खो बैठूं, इस संकोच में आप से कुछ कह न सकी,’’ वह हलके से मुसकरा दी.

मानस इत्मीनान से बोले, ‘‘चलो, सुगंधा की जिद के कारण सभी बातें साफ हो गईं. मैं तो तुम्हें चाहने लगा हूं, यह स्वीकार करता हूं. तुम्हारा प्यार भी उस दिन अस्पताल में उजागर हो चुका है. मेरी  सुगंधा तो हमारी शादी के लिए तैयार बैठी है. तुम भी इस विषय में अपने बेटे से बात कर लो.’’

शालिनी ने उदासीनता से कहा, ‘‘मेरा बेटा तो सालों पहले ही पराया हो गया. अमेरिका क्या गया वहीं का हो कर रह गया. 4 साल से न आता है न हमारे आने पर सहमति व्यक्त करता है. उस की विदेशी पत्नी है तथा उस ने तो हमारा दिया नाम तक बदल दिया है.

‘‘मनोज के क्रियाकर्म हेतु बहुत कठिनाई से उस से संपर्क कर सकी थी. मात्र 3 दिन के लिए आया था. मानो संबंध जोड़ने नहीं बल्कि तोड़ने आया था. कह गया, ‘यों व्यर्थ मु झे आने के लिए परेशान न किया करें, मेरे पास व्यर्थ का समय नहीं है.’

‘‘अकेली मां कैसे रहेगी, न उस ने पूछा, न ही मैं ने बताया. अजनबी की तरह आया, परायों की तरह चला गया,’’ शालिनी की आंखें भीग आई थीं.

मानस ने उस के आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘शालू, जिस बेटे को तुम्हारी फिक्र नहीं है, जिस ने तुम से कोई संबंध, संपर्क नहीं रखा है, उस के लिए क्यों आंसू  बहाना. मैं तुम से एक वादा कर सकता हूं, हम दोनों एकदूसरे का इतना मजबूत सहारा बनेंगे कि हमें अन्य किसी सहारे की आवश्यकता ही नहीं होगी.’’

शालिनी अभी भी सिमटीसकुचाई सी बैठी थी. मानस ने उस की अंतर्दशा भांपते हुए कहा, ‘‘शालू, यह तुम भी जानती होगी तथा मैं भी सम झता हूं कि इस उम्र में शादी शारीरिक आवश्यकता हेतु नहीं बल्कि मानसिक संतुष्टि के लिए की जाती है. शादी की आवश्यकता हर उम्र में होती है ताकि साथी से अपने दिल की बात की जा सके. एक

साथी होने से जीवन में उमंगउत्साह बना रहता है.’’

फोन के जरिए सुगंधा सब बातें जान कर खुशी से उछलते हुए बोली, ‘‘पापा, इस रविवार यह शुभ कार्य कर लेते हैं, मैं और कुणाल इस शुक्रवार की रात में पहुंच रहे हैं.’’

रविवार के दिन कुछ निकटतम रिश्तेदार एवं पड़ोसियों के बीच मानस एवं शालिनी ने एकदूसरे को अंगूठी पहनाई, फूलमाला पहनाई तथा मानस ने शालिनी की सूनी मांग में सिंदूर सजा दिया.

सभी उपस्थित अतिथियों ने करतल ध्वनि से उत्साह एवं खुशी का प्रदर्शन किया. सभी ने सुगंधा की सोच एवं सम झदारी की प्रसंशा करते हुए कहा कि मानस एवं शालिनी के पुनर्विवाह का प्रस्ताव रख, सुगंधा ने प्रशंसनीय कार्य किया है. सुगंधा ने घर पर ही छोटी सी पार्टी का आयोजन रखा था.

सोमवार की पहली फ्लाइट से सुगंधा एवं कुणाल को लौट जाना था. शालिनी भावविभोर हो बोली, ‘‘अच्छा होता, बेटा कुछ दिन रुक जातीं.’’

सुगंधा ने अपनेपन से कहा, ‘‘मम्मी,

अभी तो हम दोनों को जाना ही

पड़ेगा, फाइनल रिपोर्ट का समय होने के कारण औफिस से छुट्टी मिलना संभव नहीं है.’’

‘‘ठीक है, इस बार जाओ किंतु प्रौमिस करो, दीवाली पर आ कर जरूर कुछ दिन रहोगे,’’ शालिनी ने आदेशात्मक स्वर में कहा.

सुगंधा को शालिनी का मां जैसा अधिकार जताना भला लगा. वह भावविभोर हो उस के गले लग गई. उसे आत्मसंतुष्टि का अनुभव हो रहा था. होता भी क्यों नहीं, उसे  मां जो मिल गई थी. दोनों के अपनत्त्वपूर्ण व्यवहार को देख कर मानस की आंखें भी सजल हो उठीं. Hindi Story

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