Women Rights: भारत में बेटा पैदा करना एक इन्वैस्टमैंट समझा जाता है. बेटा होगा तो बुढ़ापे में लाठी बनेगा लेकिन असल में लाठी बहू बनती है. बेटा तो कुछ न करते हुए भी बाप की प्रौपर्टी का मालिक बन जाता है लेकिन बहू को सेवा के बदले क्या मिलता है? दिनरात की सेवा, दवा, खाना, पेशाब व मल साफ करना यह सब बहू के जिम्मे डाल दिया जाता है. बहू अपने पति के मांबाप के बुढ़ापे को ढोने में अपनी जवानी बरबाद करती है तो समाज कहता है कि देखो, बेटा कितना भाग्यशाली है? असल में यह मर्द के भाग्य के नाम पर औरत का शोषण है. अभी हाल ही एक फैसले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने इसी शोषणवादी मानसिकता को तोड़ा है.

कर्नाटक हाईकोर्ट में एक पति ने अपनी पत्नी को मेंटिनैंस देने से मना करते हुए कहा था कि वह घर का काम नहीं करती, उस के मांबाप की सेवा नहीं करती और बिना इजाजत अपने मायके चली जाती है, इसलिए वह मेंटिनैंस की हकदार नहीं है. इस पर 3 अगस्त को कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस चिल्लाकुर सुमलता ने कहा कि “पत्नी को अपने मातापिता से मिलने के लिए पति की इजाजत लेने की जरूरत नहीं है और उसे जबरन ससुराल वालों की सेवा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. शादी किसी को कंट्रोल करने या गुलाम बनाने का लाइसैंस नहीं है. पत्नी का समर्पण उस की आज्ञाकारिता से नहीं नापा जा सकता. शादी बराबरी का रिश्ता है, मालिक और नौकर का नहीं.”

हमारा समाज बेटे को सरकारी पैंशन योजना समझता है. लोग बेटा इसलिए चाहते हैं कि बुढ़ापे में सहारा बनेगा लेकिन पति के मांबाप के बुढ़ापे का असली सहारा बहू बनती है क्योंकि सेवा बेटा नहीं, उस की पत्नी करती है. मतलब, पैंशन का पैसा बेटा लेगा और पैंशन की ड्यूटी बहू निभाएगी. पति अपनी सास की दो दिन सेवा नहीं करता, वह ससुराल जाता है तो दामाद की तरह पैर पसार कर सेवा लेता है लेकिन पत्नी से उम्मीद की जाती है कि वह शादी के पहले दिन से ही सासससुर के पैर दबाए, उन के मरने तक उन की सेवा करे और पति के मरने के बाद भी उसी घर में नौकरानी बन कर रहे. असल में यह पितृसत्ता का सब से चालाक बिजनैस मौडल है.

धर्म और परंपरा ने इस बिजनैस मौडल को पवित्रता का नाम दे दिया है. कहा गया कि बहू का तो जन्म ही सास की सेवा के लिए हुआ है. अगर बहू सेवा न करे तो वह संस्कारहीन है. लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस चिल्लाकुर सुमलता ने तराजू के दूसरे पलड़े को देखा और कहा कि सेवा प्रेम से हो सकती है, जबरदस्ती नहीं. अगर बहू प्रेम से करे तो वह रिश्ते की खूबसूरती है लेकिन उसे उस का जन्मसिद्ध कर्तव्य मान लेना पितृसत्ता है. औरत भी इंसान है, कोई फ्री की इंश्योरैंस पौलिसी नहीं.

असल में यह पूरी सेवा वाली थ्योरी धर्म के नाम पर चलती है. बहू को सासससुर की सेवा से पुण्य मिलेगा, स्वर्ग मिलेगा, अगला जन्म सुधरेगा लेकिन पुण्य हमेशा औरत के हिस्से में आता है और प्रौपर्टी हमेशा बेटे के हिस्से में जाती है. अगर सेवा इतनी ही पुण्य की चीज है तो बेटा खुद क्यों नहीं करता? क्योंकि बेटे को पता है कि पुण्य से पेट नहीं भरता, प्रौपर्टी से भरता है. कोर्ट ने इसी पाखंड को तोड़ा है. औरत का जन्म किसी के मांबाप की सेवा करने के लिए नहीं हुआ है. Women Rights

 

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...