Asian Games 2026: एशियाई खेलों में भारतीय खिलाड़ियों के गले में चमचमाते मेडल पूरे देश को गौरवान्वित कर रहे हैं. मगर इन मेडल्स की चमक के पीछे हमारी खेल व्यवस्था की बदहाली का अंधकार भी क्या कोई देखता है? भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है, कमी है तो उस प्रतिभा को बचपन में पहचानने, उसे मैदान देने, प्रशिक्षित करने, पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने और दस-पंद्रह साल तक उसका हाथ थामे रखने वाली व्यवस्था की. 140 करोड़ से ज्यादा आबादी और दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देश में विश्वस्तरीय खिलाड़ी बनने का अवसर आखिर कितने बच्चों को मिलता है?

जापान के आइची-नागोया में हुए 2026 एशियाई खेल भारत के लिए केवल मेडल्स की गिनती का उत्सव नहीं, बल्कि वह आईना दिखाने का अवसर भी है कि एशिया के दूसरे देशों के मुकाबले हमने पिछले सात दशकों में अपने बच्चों, युवाओं और खेल संस्कृति में कितना निवेश किया है.

एशियन गेम्स में नि:संदेह हमारे खिलाड़ियों ने अभूतपूर्व प्रदर्शन किया. महिला क्रिकेट टीम ने श्रीलंका को फाइनल में 147 रन से हराकर भारत को पहला स्वर्ण दिलाया. स्मृति मंधाना ने 45 गेंदों में 79 रन की शानदार पारी खेल कर लड़कियों की प्रतिभा का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया.

शूटिंग में एलावेनिल वलारिवन, हिमांशु ढिल्लों, रुद्रांक्ष पाटिल और दूसरे निशानेबाजों ने मेडल्स जीते. मैतेयी समुदाय से आने वाली मीराबाई चानू ने वेटलिफ्टिंग में सिल्वर मेडल हासिल किया. मणिपुर की नाओरेम रोशिबिना देवी, जो एक किसान परिवार से आती हैं, ने वुशु में सिल्वर जीता और सतनाम सिंह-सलमान खान की जोड़ी ने रोइंग के पुरुष डबल स्कल्स में ब्रॉन्ज हासिल किया.

इन खिलाड़ियों की उपलब्धियां जितनी शानदार रहीं, उतना ही असुविधाजनक यह सवाल है कि भारत को ये खिलाड़ी व्यवस्था ने दिए हैं या ये खिलाड़ी व्यवस्था की तमाम कमियों को पार करके अपने जुझारूपन से यहां तक पहुंचे हैं? इस फर्क को समझना बहुत जरूरी है.

मेडल भारत का, मगर संघर्ष किसका?

भारत में जब कोई खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मंच पर पदक जीतता है तो पूरा सरकारी तंत्र उसके साथ तस्वीर खिंचवाने को आतुर दिखने लगता है. बड़े बड़े नेता, उद्योगपति, सिनेस्टार उससे निकटता दिखाने लगते हैं. राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री उसकी प्रशंसा में कसीदे काढ़ने लगते हैं. स्पोर्ट्स अधिकारी उसका गुणगान करते हैं. सोशल मीडिया पर खिलाड़ी के लिए बधाइयों की बाढ़ आ जाती है. विभिन्न स्तर पर नकद पुरस्कार घोषित किये जाते हैं और बड़े बड़े मंचों से खिलाड़ी को देश का गौरव बताया जाता है. उसका मेडल भारत का मेडल होता है.

लेकिन असली सवाल उस दिन का नहीं है जब खिलाड़ी भारत के लिए मेडल जीतता है और पोडियम पर खड़ा होकर भारत का नाम रोशन करता है, बल्कि सवाल उस दिन का है जब वह 12 साल का था. वह खेलने के लिए छटपटा रहा था, मगर गरीब माँ-बाप के पास उसकी खेल सामग्री जुटाने और उसको बेहतर प्रशिक्षण दिलवाने के लिए पैसे नहीं थे. उसको उस वक़्त वह डाइट नहीं मिल रही थी जब उसके खेल को उस ताकत की जरूरत थी. जब स्टेट लेवल पर खेलने के लिए भी उसे गन्दी राजनीति और भेदभाव का सामना करना पड़ा था. भारत के तमाम बड़े खिलाड़ियों का शुरुआती सफर इन्हीं कठिनाइयों के साथ आरम्भ हुआ और जब इन सबसे जूझते हुए उन्होंने अपने दम पर मेडल हासिल करने शुरू किये तब स्पोर्ट्स मंत्रालय से लेकर मंत्री-संत्री तक उसका गुणगान करने लगे.

‘सरिता’ यही सवाल उठा रही है कि देश के लिए मेडल जीतने वाला खिलाड़ी जब संघर्ष कर रहा था, तब उसके पास जूते थे या नहीं? उसके स्कूल में खेल का मैदान था या नहीं? उसको प्रशिक्षित करने वाला कोच था या नहीं? उसे दूध, अंडा, फल और पर्याप्त प्रोटीन मिलता था या नहीं? जिला स्तर की प्रतियोगिता में जाने के लिए उसके पास किराया था या नहीं? क्या उस वक़्त उसके माता-पिता को भरोसा था कि खेल में बच्चे का भविष्य बन सकता है या वे उससे कह रहे थे – “खेल-कूद छोड़ो, पढ़ाई पर ध्यान दो.” आखिर ये सब कब देखा जाएगा?

हम मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों का खूब सम्मान करते हैं, लेकिन एक अच्छा खिलाड़ी बनाने की प्रक्रिया पर उतना निवेश नहीं करते. हम शुरू से उनका हाथ नहीं थामते. यह भारतीय खेल व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना है.

चीन, जापान, कोरिया जैसे देश जहां शिक्षा, कौशल विकास, तकनीक पर बड़ा निवेश कर अपने युवाओं को प्रशिक्षित कर रहे थे, भारत ने अपनी युवा ताकत को धार्मिक आस्था और कर्मकांड के कुंड में ढकेला हुआ है. हमारी सरकारों ने आस्था को शिक्षा का, कर्मकांड को विज्ञान का और धार्मिक गौरव को आर्थिक उपलब्धि का विकल्प बना दिया है. भारतीय जनता पार्टी की सरकार में ये सब और तेजी से हुआ और हो रहा है. देश भर में मंदिरों, मस्जिदों, गुदद्वारों और चर्चों की संख्या तेजी से बढ़ती गई मगर स्कूल-कॉलेज का निर्माण कछुवे की रफ़्तार भी नहीं पकड़ पाया. बल्कि मोदी सरकार के केंद्र की सत्ता में आने के बाद तो देश भर में जो सरकारी स्कूल किसी तरह चल रहे थे, वे भी बंद होते जा रहे हैं. एक आंकड़े के अनुसार बीते एक दशक में देश में करीब 94,000 सरकारी स्कूल ख़त्म कर दिए गए हैं.

चीन की बात करें तो वहां बच्चों के लिए खेल व्यवस्था बहुत संगठित, केंद्रीकृत और प्रतिभा-चयन आधारित है. बचपन से ही स्कूल, स्थानीय खेल केंद्र, खेल अकादमियां और राष्ट्रीय स्तर की प्रशिक्षण व्यवस्था जो एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं, प्रतिभाशाली बच्चों के प्रशिक्षण पर पूरा ध्यान देती हैं. चीन में आधिकारिक खेल-प्रशिक्षण ढांचा इस तरह बना है कि सभी संस्थाएं एक दूसरे से जुड़ी हैं यानी स्कूल/स्थानीय स्तर → बाल खेल प्रशिक्षण → जिला/शहर स्तर → प्रांतीय स्पोर्ट्स स्कूल → प्रांतीय टीम → राष्ट्रीय स्तर. बच्चा खुदबखुद एक स्तर से निकल कर दूसरे स्तर पर आ जाता है. सरकार की नीति में प्राथमिक स्तर पर बड़े आधार से प्रतिभा खोजने, फिर बेहतर खिलाड़ियों को क्रमशः ऊंचे स्तर पर ले जाने की व्यवस्था पर जोर है. वहां जिम्नास्टिक्स, डाइविंग, तैराकी, टेबल टेनिस, बैडमिंटन, मार्शल आर्ट्स आदि खेलों में प्रतिभा की पहचान काफी छोटी उम्र में शुरू होती है. पुराने चीनी राज्य-खेल मॉडल में तो स्पोर्ट्स स्कूलों में 6-7 साल के बच्चे भी प्रवेश लेते थे. उनकी तैयारी ओलंपिक्स को ध्यान में रख कर उस छोटी उम्र से कराई जाती थी. आज चीन में कई स्पोर्ट्स स्कूल हैं जहां सिर्फ खेल नहीं होता बल्कि सामान्य स्कूली शिक्षा, खेल प्रशिक्षण, प्रतियोगिताओं में भागीदारी, कोचिंग, चिकित्सा निगरानी, फिटनेस प्रशिक्षण और कई मामलों में रहने और खाने की सुविधा सब एक साथ मिलती है. स्थानीय सरकारों पर इन स्कूलों के लिए मैदान, सुविधाएं, पैसा और कर्मचारी उपलब्ध कराने में सहयोग करने की जिम्मेदारी होती है. चीन में सरकारी पैसा केवल खिलाड़ी को पुरस्कार देने में नहीं लगता, बल्कि पूरे पाइपलाइन पर लगता है:

प्रतिभा खोज → प्रशिक्षण → कोच → मैदान → उपकरण → प्रतियोगिता → चिकित्सा → पोषण → खेल विज्ञान → उच्चस्तरीय प्रशिक्षण

2025 में चीन के राष्ट्रीय खेल प्रशासन के लॉटरी पब्लिक-वेलफेयर फंड से अकेले 923.0179 मिलियन युआन (लगभग 92.3 करोड़ युआन) युवा खेलों के reserve talent development यानी भविष्य के खिलाड़ियों की तैयारी पर लगाए गए हैं. तो ऐसे देश के खिलाड़ियों से हमारी क्या बराबरी हो सकती है? जहां सारा भार अकेले खिलाड़ी और उसके परिवार को वहन करना पड़ता है.

ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां खिलाड़ियों के परिवार ने खिलाड़ी के प्रशिक्षण, यात्रा, उपकरण और प्रतियोगिताओं का खर्च उठाने के लिए अपनी जमीन या दुकान बेच दी या जेवर गिरवी रख दिए. 2014 में कॉमन वेल्थ गेम्स में ब्रॉन्स और 2018 में एशियन गेम्स में ट्रिपल जंप में गोल्ड मेडल जीतने वाले अरपिंदर सिंह के पिता जो भारतीय सेना में हवलदार के पद से रिटायर हुए थे, बेटे की ट्रेनिंग जारी रखने के लिए अपनी डेढ़ एकड़ जमीन गिरवी रख दी थी.

वारंगल के एक मजदूर परिवार से आने वाली दीप्थी को एथलीट बनाने के लिए उनके माता-पिता ने अपनी एक एकड़ जमीन 2016 में लगभग 9 लाख रुपये में बेच दी. वह जमीन परिवार की सबसे मूल्यवान संपत्ति थी. बाद में दीप्थी ने एशियन पैरा गेम्स में स्वर्ण और पैरालंपिक स्तर पर सफलता हासिल की. पुरस्कार राशि मिलने के बाद उन्होंने उसी जमीन का आधा हिस्सा 11 लाख रुपये में वापस खरीदा. यह कहानी केवल त्याग की नहीं, बल्कि उस आर्थिक जोखिम की है जो गरीब परिवार खिलाड़ी बनाने के लिए उठाते हैं.

शूटिंग में नाम कमाने वाली सोनम मस्कर के पिता को 2022 में राइफल और शूटिंग किट खरीदने के लिए जमीन और दुकान बाजार मूल्य से बहुत कम पर बेचनी पड़ीं. सोनम मस्कार को अभी जापान में हुए 2026 एशियाई खेलों में सिल्वर मेडल प्राप्त हुआ है.

क्रिकेट खिलाड़ी कार्तिक शर्मा के पिता मनोज शर्मा कहते हैं कि बेटे की ट्रेनिंग और टूर्नामेंटों का खर्च उठाने के लिए परिवार ने प्लॉट और खेती की जमीन बेची. उनकी मां राधा ने भी अपने जेवर भी बेच दिए. एक टूर्नामेंट में कार्तिक और उनके पिता के पास होटल में रहने के पैसे खत्म हो गए तो उन्हें रात गुजारने के लिए नाइट शेल्टर का सहारा लेना पड़ा. पिता कहते हैं कि एक दिन तो दोनों को भूखे भी सोना पड़ा. बाद में कार्तिक अंडर-19, रणजी ट्रॉफी और फिर आईपीएल तक पहुंचे थे.

पैरा-एथलीट शर्मिला धनकर की मां संतोष ने बेटी का खेल करियर जारी रखने के लिए परिवार की आधा एकड़ जमीन बेच दी, जिससे लगभग 25 लाख रुपये मिले. इसके बाद 2023 में घर बेचकर करीब 10 लाख रुपये जुटाए, ताकि ट्रेनिंग और प्रतियोगिताओं का खर्च चलता रहे. 2026 में शर्मिला ने कॉमन वेल्थ गेम्स गोल्ड मेडल जीता. यानी एक समय परिवार जिस घर और जमीन को बेचकर खिलाड़ी का करियर बचा रहा था, उसी खिलाड़ी ने बाद में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए पदक जीता. मगर उसके संघर्षकाल में कोई सरकार उसके साथ नहीं खड़ी थी.

ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं. किसी ने खेत की जमीन बेची, किसी ने घर गिरवी रखा, किसी मां ने अपने जेवर बेच दिए और किसी पिता ने अपनी नौकरी छोड़कर बच्चे के प्रशिक्षण के लिए दूसरे शहर में डेरा डाला. सवाल यही है कि क्या किसी बच्चे की प्रतिभा की कीमत उसके परिवार की संपत्ति होनी चाहिए?

एक प्रतिभाशाली बच्चा अगर किसान का बेटा है तो उसके पिता को खेत बेचने की जरूरत क्यों पड़े? अगर वह निम्न-मध्यवर्गीय परिवार से है तो उसकी मां को अपने जेवर क्यों बेचने पड़ें? अगर परिवार के पास पैसे नहीं हैं तो क्या उस बच्चे का अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बनने का सपना वहीं खत्म हो जाना चाहिए?

यहीं से भारत की खेल नीति पर सवाल उठता है. भारत पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को मंच पर बुलाकर सम्मानित करता है, उनके गले में फूलों की माला डालता है, पुरस्कार राशि देता है और उनकी तस्वीरें अखबारों की सुर्खियां बनती हैं. लेकिन शायद ही कभी हम यह सवाल पूछते हैं कि उस पदक तक पहुंचने से पहले खिलाड़ी के परिवार ने क्या-क्या खोया था?

सरकार और खेल संस्थाओं का काम केवल पदक जीतने के बाद खिलाड़ी को सम्मानित करना नहीं होना चाहिए. जरूरत उस समय है जब खिलाड़ी 10-12 साल का है, जब उसके पास महंगे जूते खरीदने के पैसे नहीं हैं, जब अच्छे कोच की फीस परिवार के बजट से बाहर है, जब प्रतियोगिता के लिए दूसरे शहर जाने का किराया जुटाना मुश्किल है और जब पौष्टिक भोजन भी अतिरिक्त खर्च बन जाता है.

पदक जीतने के बाद खिलाड़ी को करोड़ों का पुरस्कार मिलना अच्छी बात है, लेकिन उससे पहले हजारों ऐसे बच्चे खेल छोड़ चुके होते हैं जिनके परिवार उनकी प्रतिभा पर खर्च नहीं उठा पाए. भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है, प्रतिभा को गरीबी, महंगे प्रशिक्षण और अवसरों की कमी के कारण रास्ते में खो देने की समस्या है.

हम बच्चों को खेल के मैदान तक नहीं देते और मेडल की उम्मीद रखते हैं

खेल प्रतिभा को पहचानने कर खिलाड़ी बनाने की असली फैक्ट्री राष्ट्रीय स्टेडियम नहीं बल्कि स्कूल का मैदान होता है. लेकिन जब देश में स्कूल ही खत्म होते जा रहे हैं और जो बचे हैं वे ज्यादातर बदहाल हैं तो फिर प्रतिभाओं को सामने आने का अवसर किस तरह मिलेगा?

भारत में सरकारी स्कूलों की संख्या 2014-15 के लगभग 11.07 लाख से घटकर 2024-25 में करीब 10.13 लाख रह गई. यानी लगभग 94 हजार स्कूल बंद हो गए. सरकारी दस्तावेज इस बाबत स्कूलों के समेकन की बात कहते हैं, मगर संख्या में आई इतनी बड़ी गिरावट अपने आप में सार्वजनिक शिक्षा के ढांचे पर गंभीर सवाल खड़ा करती है.

और जो स्कूल बचे हैं, उनमें कितनों के पास ऐसा खेल ढांचा है जिससे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी निकल सके? कितने सरकारी स्कूलों में 400 मीटर का ट्रैक है? कितनों में नियमित प्रशिक्षित कोच है? कितनों में जिमनास्टिक की व्यवस्था है? कितनों में स्विमिंग पूल है? कितनों में शूटिंग, टेबल टेनिस, बैडमिंटन या वेटलिफ्टिंग की वैज्ञानिक ट्रेनिंग होती है? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कितने स्कूल हर साल अपने बच्चों की खेल क्षमता का वैज्ञानिक परीक्षण करते हैं?

जिस देश में खेल का मतलब महज स्कूल के सालाना “स्पोर्ट्स डे” में बोरा दौड़ और नींबू-चम्मच प्रतियोगिता तक सीमित हो, वहां प्रतिभाएं किस तरह पनपेंगी?

खेलों के प्रति नजरिया बहुत सकारात्मक नहीं है

दूसरी तरफ बहुतेरे माता पिता हैं जो खेलकूद को अब तक दोयम दर्जे की चीज मानते हैं. शाम को बाप ऑफिस से घर लौटे और उसका बच्चा गली में खेलता हुआ दिखाई दे जाये तो वह चीखता है – पहले पढ़ाई कर लो, खेल बाद में हो सकता है. या सारा दिन बस खेल चलता है, पढाई कब करोगे? यानी आम जादमी खेल को कुछ समझता ही नहीं है. यही सोच शुरुआती उम्र में लाखों प्रतिभाओं को खेल से बाहर कर देती है.

एक बच्चा अगर 10 साल की उम्र में शानदार धावक है, लेकिन उसके माता-पिता को लगता है कि एथलेटिक्स में भविष्य सुरक्षित नहीं है, तो वह बच्चा 15 साल की उम्र तक किसी दूसरे करियर की दौड़ में चला जाता है. मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर, सरकारी कर्मचारी, एमबीए या किसी सुरक्षित नौकरी में देखना चाहता है.

भारत में खेल अभी भी बड़ी संख्या में परिवारों के लिए जोखिम इसलिए है क्योंकि एक तो खेलों के प्रति जागरूकता नहीं है. दूसरे सरकार न तो स्कूलों में खेल को प्रोत्साहन देती है, न खिलाड़ियों को खेल संसाधन मुहैया करवाती है, न खिलाड़ियों के लिए अच्छी डाइट की व्यवस्था हो पाती है और न उन्हें अपनी प्रतिभा प्रदर्शन का कोई मौक़ा मिल पाता है.

सरकार प्रतिभा खोजती नहीं, चमत्कार का इंतजार करती है

मान लीजिए किसी गांव में 12 साल की लड़की असाधारण तेजी से दौड़ती है. उसे कौन खोजेगा?
उसका स्कूल?
ब्लॉक शिक्षा अधिकारी?
जिला खेल अधिकारी?
राज्य खेल विभाग?
भारतीय खेल प्राधिकरण?
कोई प्रशिक्षित कोच?
या फिर हमें इंतजार करना होगा कि किसी दिन उसकी दौड़ का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो जाए?
हमारी खेल नीति यही है.

हमारे यहां टैलेंट आइडेंटिफिकेशन का प्रोसेस ही नहीं है. जबकि विश्वस्तरीय खेल व्यवस्था में बच्चे की गति, ताकत, प्रतिक्रिया समय, लचीलापन, सहनशक्ति और शारीरिक संरचना देखकर यह पहचानने की कोशिश की जाती है कि वह किस खेल के लिए अधिक उपयुक्त हो सकता है. भारत में लाखों बच्चों को कभी यह जानने का अवसर नहीं मिलता कि वे किस खेल में असाधारण हो सकते थे.

हम प्रतिभा पैदा नहीं करते. प्रतिभा पैदा हो जाए तो उसे खोज नहीं पाते. वह खुद सामने आ जाए तो उसे पर्याप्त संसाधन नहीं दे पाते. और जब वह इन सब बाधाओं को पार करके मेडल जीत लेती है तो उसे व्यवस्था और देश की सफलता बताने लगते हैं.

भारत में कितने बच्चों के माता-पिता अपने दस साल के बच्चे से कहते हैं – “तुम बैडमिंटन खिलाड़ी बनो.”
“तुम तैराक बनो.”
“तुम एथलीट बनो.”
“तुम रोइंग करो.”
“तुम जिम्नास्ट बनो.”
“तुम बॉक्सर बनो.”
आमतौर पर सुनाई देता है.-.“पहले पढ़ाई कर लो, खेल बाद में होता रहेगा.”

यानी हमने बच्चों को बचपन से समझा दिया कि पढ़ाई जीवन का जरूरी हिस्सा है और खेल फालतू समय की गतिविधि. फिर हम पूछते हैं कि चीन, जापान या दक्षिण कोरिया से जितने बढ़िया खिलाड़ी निकलते हैं उतने हमारे यहाँ क्यों नहीं निकलते?

देश मंत्रों से नहीं, संस्थाओं से आगे बढ़ते हैं

1951 में पहले एशियाई खेल नई दिल्ली में हुए थे. उस समय एशिया का बड़ा हिस्सा गरीबी, युद्ध और औपनिवेशिक तबाही से निकल रहा था. दक्षिण कोरिया युद्ध की विनाशलीला से जूझ रहा था. चीन गरीब था. जापान द्वितीय विश्व युद्ध की तबाही से उबर रहा था. भारत भी औपनिवेशिक शोषण से निकला था. मगर सात दशक बाद अब तस्वीर बिल्कुल बदल चुकी है.

जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और सिंगापुर ने अलग-अलग आर्थिक और राजनीतिक रास्ते अपनाए. उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल, तकनीक, विनिर्माण और मानव पूंजी में भारी निवेश किया. बेहतर खेल नीतियां बनायीं. प्रतिभाओं को ढूंढा, तराशा और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं के काबिल बनाया. मगर हमने क्या किया?

हमने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च बनाये. अपनी युवा ताकत को धार्मिक आस्था और कर्मकांड के कुंड में ढकेला. हमारी सरकारों ने आस्था को शिक्षा का, कर्मकांड को विज्ञान का और धार्मिक गौरव को आर्थिक उपलब्धि का विकल्प बना दिया. भारतीय जनता पार्टी की सरकार में ये सब और तेजी से हुआ और हो रहा है. देश भर में मंदिरों, मस्जिदों, गुदद्वारों और चर्चों की संख्या तो तेजी से बढ़ती गई मगर स्कूल-कॉलेज का निर्माण कछुवे की रफ़्तार भी नहीं पकड़ पाया. और मोदी सरकार के केंद्र की सत्ता में आने के बाद देश भर में जो सरकारी स्कूल किसी तरह चल रहे थे, वे भी लगातार बंद होते जा रहे हैं.

धार्मिक आस्था व्यक्ति और समाज के जीवन का हिस्सा हो सकती है, लेकिन मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च स्कूल, प्रयोगशाला, खेल मैदान और औद्योगिक नीति का विकल्प नहीं हो सकते.

देश मंत्रों से नहीं, संस्थाओं से चलते हैं. अर्थव्यवस्था आशीर्वाद से नहीं, उत्पादन से बढ़ती है. रोजगार कर्मकांड से नहीं, निवेश और उद्योग से पैदा होता है. वैज्ञानिक उपलब्धियां नारों से नहीं, प्रयोगशालाओं से निकलती हैं और विश्वस्तरीय खिलाड़ी भाषणों से नहीं, मैदान, कोच, पोषण और वर्षों के प्रशिक्षण से बनते हैं.

किसी भी सरकार की खेल नीति की असली परीक्षा उद्घाटन, विज्ञापन और पदक विजेताओं के अभिनंदन से नहीं, बल्कि इस बात से होनी चाहिए कि एक गरीब परिवार का दस साल का बच्चा खेल व्यवस्था में प्रवेश करके 20 साल की उम्र तक टिक सकता है या नहीं?

मेडल के बाद करोड़ों देने से बेहतर है मेडल से पहले हजारों देना

खिलाड़ी पदक जीत ले तो लाखों-करोड़ों के पुरस्कार घोषित होते हैं. मगर जब वही खिलाड़ी किशोर अवस्था में अपने जूते, डाइट, कोचिंग और यात्रा के लिए संघर्ष कर रहा होता है, उस समय छोटी-सी नियमित आर्थिक सहायता भी उसे नहीं मिल पाती है.

पदक जीतने के बाद पुरस्कार देना अच्छी बात है, लेकिन असली मदद तब होगी जब खिलाड़ी पदक जीतने की तैयारी कर रहा होता है. मणिपुर के एक साधारण किसान परिवार में पली-बढ़ीं मैरी कॉम ने किशोरावस्था में बॉक्सिंग को अपनाया. उस समय लड़कियों का बॉक्सिंग आम बात नहीं थी. परिवार और समाज की दख़लअंदाजियों के बावजूद मेरी कॉम ने प्रशिक्षण जारी रखा. शुरुआत में उन्हें अपने खेल के लिए पर्याप्त सुविधाएं और संसाधन भी उपलब्ध नहीं थे. मगर उन्होंने तय किया कि बॉक्सिंग केवल शौक नहीं, बल्कि उनका करियर होगा. शादी और जुड़वां बच्चों की माँ बनने के बाद भी वह अपने बॉक्सिंग करियर में बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं.

याद होगी क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी पर बनी फिल्म ‘एमएस धोनी : द अनटोल्ड स्टोरी’ जहां धोनी को धोनी बनाने में उसके दोस्तों ने कितनी मदद की थी, जबकि उसके पास खेलने के लिए एक अच्छा बैट तक नहीं था. या फिर उस फिल्म को याद करें जिसमें तेज दौड़ लगाने वाले खिलाड़ी के पास एक अदद जूता तक नहीं था और कोच की मदद ने उसे मिल्खा : द फ्लाइंग सिख बना दिया. निसंदेह दोनों ही खिलाड़ियों का जुझारूपन उन्हें उस मुकाम तक ले गया मगर हमारे आस पास लाखों बच्चे हैं जिन्हें अपनी प्रतिभा को सामने लाने के लिए आर्थिक मदद की बेतरह जरूरत है. व्यवस्था का अर्थ ही यह है कि प्रतिभा को चमत्कार करने की जरूरत न पड़े.

गरीब बच्चे के लिए अवसर की कमी

गरीब बच्चे ज्यादा प्रतिभाशाली हो सकते हैं, लेकिन सबसे कम अवसर उन्हें मिलते हैं. शहर के संपन्न परिवार का बच्चा निजी अकादमी में जा सकता है. महंगा कोच रख सकता है. अच्छा आहार ले सकता है. विदेश में प्रशिक्षण प्राप्त कर सकता है. लेकिन किसी गरीब परिवार का बच्चा? उसके लिए तो खेल तभी करियर बन सकता है जब सरकारी या सामुदायिक व्यवस्था उसे रास्ता दे. ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें किसी गांव का बच्चा भी विश्व चैंपियन बनने का सपना देख सके और उसके परिवार को यह न कहना पड़े -“बेटा, खेलकर क्या करोगे?”

बेटियों के सामने मैदान से पहले समाज खड़ा है

महिला खिलाड़ियों की समस्या और जटिल है. भारत की बेटियों ने बार-बार साबित किया है कि अवसर मिलने पर वे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों का मुकाबला कर सकती हैं. मौजूदा एशियाई खेलों में महिला क्रिकेट, मीराबाई चानू, रोशिबिना देवी और अन्य महिला खिलाड़ियों की उपलब्धियां इसका उदाहरण हैं. लेकिन किसी छोटे शहर या गांव की लड़की खेलना चाहे तो पहला मुकाबला अक्सर विपक्षी खिलाड़ी से नहीं, अपने सामाजिक माहौल और अपने परिवार से होता है.
कपड़े कैसे होंगे?
शाम को घर से बाहर कैसे जाएगी?
दूसरे शहर कौन लेकर जाएगा?
कोच पुरुष हुआ तो?
शादी कैसे होगी?
खेल पर पैसा क्यों खर्च किया जाए? इससे दहेज़ आ जाएगा. ससुराल में हमारी नाक कटने से बच जाएगी.
इन सवालों का बोझ लड़कियों पर लाद कर हम उनकी प्रतिभा को कुचल देते हैं.

खेल संघ राजनीति और राजनेताओं से मुक्त हों

भारतीय खेलों की दूसरी बड़ी बीमारी खेल प्रशासन को लेकर लंबे समय से उठते विवाद है. खेल संघ खिलाड़ी तैयार करने के लिए बनाये जाते हैं मगर भारत में ये सत्ता और प्रतिष्ठा के केंद्र बन गए हैं. तमाम भारतीय खेल संघों के अध्यक्ष और अन्य पदों पर राजनेताओं का कब्जा है, जिन्हें खेल का ‘ख’ भी नहीं पता होता ऐसे लोग इन पदों पर बैठ कर सिर्फ पॉलिटिक्स करते हैं. अपनी मनमानी चलाते हैं, खेल बजट में भ्रष्टाचार करते हैं और खिलाड़ियों का शोषण करते हैं, जबकि इन पदों पर खेल से जुड़े लोगों को होना चाहिए.

20वां एशियाई खेल जापान में खेला गया. यदि वहां के कुश्ती महासंघ के पिछले पांच अध्यक्षों के बारे में पढ़ें तो पता चलता है कि उसके वर्तमान अध्यक्ष हिदेतोशी तोमियामा कुश्ती के विश्व चैम्पियन, ओलम्पिक स्वर्ण पदक विजेता, कोच और शिक्षाविद होने के साथ ओलम्पिक और अंतर्राष्ट्रीय खेलों की जिम्मेदारियों को उठाने वाले एक खिलाड़ी हैं.

हिदेतोशी तोमियामा से पहले यो जीरो उएताके (1999-2003) भी दो बार के ओलंपिक चैम्पियन रहे. उनसे पहले शोजो सासाहारा (1989-1999) भी ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता और विश्व चैंपियन रहे. 1947 से 1983 तक कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बने इचिरो हत्ता आधुनिक जापानी कुश्ती के प्रमुख संस्थापकों में से एक थे. उन्होंने 36 वर्ष तक फेडरेशन का नेतृत्व किया.

मगर भारत में खिलाड़ी नहीं बल्कि पॉलिटिशियन खेल संघों पर हावी हैं और वहां वे अपनी गन्दी राजनीति खेलते हैं. अनेक खेल संघों पर आरोप है कि वहां खिलाड़ियों का यौन उत्पीड़न, मानसिक शोषण आम है. ये खेल संघ निष्पक्ष भी नहीं हैं. इनमें खिलाड़ियों का चयन, संसाधन और अवसर पारदर्शी प्रक्रिया से तय नहीं होते हैं. जिनके कोई माईबाप निकल आये उनका चयन हो जाता है.

हाल ही में कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष भाजपा नेता बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ दिल्ली के जंतर मंतर पर महिला रेसलर्स ने जिस प्रकार धरना दिया और यौन उत्पीड़न के जो घिनौने आरोप सिंह पर लगाए, वह देश को शर्मसार करने वाले हैं. यह पूरा एपिसोड कुश्ती के इतिहास में काले पन्ने के तौर पर हमेशा के लिए दर्ज हो गया है. अदालत ने 2024 में बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आरोप तय किए थे. बृजभूषण सिंह लगातार आरोपों से इनकार करते रहे. अगस्त 2026 में दिल्ली की अदालत ने उन्हें इस मामले में बरी भी कर दिया, अब पहलवानों की ओर से फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई है.

खेल संघों का मूल उद्देश्य खिलाड़ियों और खेल को मजबूत करना होना चाहिए. जब खेल संस्थाओं में प्रशासनिक अनुभव और खेल की समझ से अधिक राजनीतिक प्रभाव महत्वपूर्ण हो जाता है, तो प्राथमिकताएं खिलाड़ियों से हटकर दूसरे हितों की ओर मुड़ जाती हैं. खेल संघों में ऐसे लोगों की जरूरत है जिन्हें संबंधित खेल की समझ हो, प्रशासन चलाने का अनुभव हो और जो खिलाड़ियों के हितों को केंद्र में रख कर काम करें. चयन प्रक्रिया, कोच की नियुक्ति, प्रतियोगिताओं का आयोजन और आर्थिक संसाधनों के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही होनी जरूरी है.

उच्च जातियों और धनाढ्य वर्ग के बच्चे खेल से दूर

भारतीय खेल जगत में एक दिलचस्प बात यह दिखती है कि अंतर्राष्ट्रीय फलक पर चमकने वाले अधिकांश खिलाड़ी पिछड़ी जाति, दलित समुदाय या आदिवासी समुदाय से आते हैं जबकि सवर्ण जाति के खिलाड़ी संख्या में कम हैं. जबकि उनके पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है. दरअसल गांव, छोटे शहर और मजदूर परिवारों के बच्चे चूंकि बचपन से ही शारीरिक श्रम और खुले वातावरण में अधिक सक्रिय होते हैं, लिहाजा खेलने की ताकत इस तबके में अधिक है. उच्च और धनाढ्य वर्ग का ऐश-ओ-आराम की नौकरियों के प्रति ज्यादा झुकाव है.

खेल संघों में तो विभिन्न पदों पर सवर्ण जाति के लोगों का कब्जा है मगर सवर्ण अपने बच्चों के लिए खेल को करियर के तौर पर कम तवज्जो देते हैं. उच्च और मध्यवर्गीय परिवारों में अक्सर बच्चे के लिए डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, कॉरपोरेट नौकरी या व्यवसाय को अधिक सुरक्षित करियर माना जाता है. खेल में चोट, चयन की अनिश्चितता, सीमित सीटें और लंबा प्रशिक्षण काल होता है, इसलिए परिवार सोचता है कि जब पढ़ाई के जरिए सुरक्षित करियर मिल सकता है तो बच्चा खेल में इतना जोखिम क्यों ले? संपन्न परिवार के पास खेल के बजाय दूसरे सुरक्षित विकल्प होते हैं.

संपन्न परिवारों की समस्या सामाजिक प्रतिष्ठा की भी है. कई परिवारों में “बच्चा क्या कर रहा है?” का जवाब सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा होता है. बच्चा डॉक्टर बन रहा है तो अच्छा करियर है, इंजीनियर बन रहा है – अच्छा करियर, सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा है – सुरक्षित भविष्य मगर खिलाड़ी बन रहा है तो कहा जाता है कि पहले देखो चयन होता है या नहीं? उच्च वर्ग को जोखिम उठाना मंजूर नहीं है.

भारत की समस्या यह नहीं कि किस जाति में प्रतिभा ज्यादा है और किसमें कम. असली समस्या यह है कि किस परिवार को अपने बच्चे को खेल का जोखिम लेने की आजादी है. जिस परिवार के पास आर्थिक सुरक्षा है, वह खेल को अक्सर जोखिम मानता है और जिस परिवार के पास सीमित साधन हैं, उसके लिए वही खेल कभी-कभी सामाजिक उन्नति की सीढ़ी बन जाता है. Asian Games 2026

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