Devotion On Flight: रविवार को 224 दादी भक्त वाराणसी के लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट से दिल्ली के लिए रवाना हुए. इस दौरान विमान के भीतर श्रद्धालुओं के हाथों में झंडे दिखाई दिए. वहीं, एक बच्ची के हाथ में त्रिशूल जैसी नुकीली चीज भी नजर आई. वीडियो और इस यात्रा की सामने आई तस्वीरों के बाद एयरपोर्ट की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं. इस मामले में अनुमति को लेकर न तो एयरपोर्ट अथॉरिटी के अधिकारी कुछ बता पाए और न ही इंडिगो के. सवाल यह है कि क्या यह धर्म के नाम पर एवियेशन सिक्योरिटी से खिलवाड़ नहीं है?

एयरपोर्ट और एरोप्लेन दुनिया की सबसे सख्त सुरक्षा वाली जगहों में से एक होते हैं. वहां पानी की बोतल, लाइटर और नेल कटर तक नहीं ले जाने दिया जाता. नियम कहता है कि केबिन में कोई भी नुकीली, धारदार या हथियार जैसी दिखने वाली चीज नहीं जाएगी. फिर एक बच्ची के हाथ में त्रिशूल, चाहे वह छोटा हो, लकड़ी का हो या प्लास्टिक का हो, केबिन तक कैसे पहुंच गया? त्रिशूल एक धार्मिक प्रतीक है लेकिन उसका आकार त्रिशूल जैसा ही है. सुरक्षा के हिसाब से यह एक हथियार की कैटेगरी में ही आता है.

अगर एक धर्म के त्रिशूल को छूट मिलेगी तो दूसरे धर्म के कृपाण, तलवार या किसी और प्रतीक को कैसे रोका जाएगा? सुरक्षा का नियम अंधा होना चाहिए. वह धर्म देखकर नहीं झुकना चाहिए. क्या यह वाराणसी एयरपोर्ट पर CISF और इंडिगो के ग्राउंड स्टाफ की चूक नहीं है? और यह चूक इसलिए भी गंभीर है क्योंकि वाराणसी हाई सिक्योरिटी वाला संवेदनशील एयरपोर्ट है. विमान में झंडे लहराने और छोटी बच्ची के हाथ में त्रिशूल देने की अनुमति किस नियम के तहत दी गई?

धर्म जब प्रार्थना से निकलकर प्रदर्शन बन जाता है तब वह दूसरों की जगह घेरने लगता है. एक बंद विमान में जहां 224 लोग बैठे हैं वहां झंडे लहराने का तुक क्या है? क्या इसके लिए बाकी यात्रियों की सहमति ली गई थी? बच्ची के हाथ में त्रिशूल देना सबसे खतरनाक बात है. क्या उस बच्ची को पता है कि उसके हाथ में क्या है? क्या वह जानती है कि धर्म क्या है? नहीं. वह तो बस वही कर रही है जो बड़ों ने उसे बता दिया. यह मासूमियत का इस्तेमाल है. धर्म को बचपन से ही दिमाग़ में घुसा देना यह संस्कार नहीं है, यह कंडीशनिंग है.

भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह तो कतई नहीं है कि हर धर्म एयरपोर्ट और एयरोप्लेन के भीतर तक पहुंच जाये. अगर 224 लोग किसी इस्लामिक संगठन से जुड़े होते तो क्या हवाई जहाज के भीतर बहुमत में होने के कारण उन्हें एक साथ नमाज पढ़ने की अनुमति दी जाती? क्या यह सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं होता? हवाई जहाज जैसे हाई सिक्योरिटी वाले पब्लिक ट्रांसपोर्ट को तो धर्म से मुक्त रखना ही चाहिए. अगर आज हिंदू झंडे और त्रिशूल को इजाजत मिली तो कल दूसरे धर्म के लोग भी अपने प्रतीकों के साथ आएंगे और फिर विमान यात्रा तीर्थयात्रा में बदल जाएगी और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उस विमान में बैठा हर यात्री हिंदू था? क्या उस विमान में मुस्लिम, ईसाई, सिख या नास्तिक नहीं बैठा था? उसकी असहजता का जिम्मेदार कौन है?

धर्म निजी होना चाहिए. किसी की आस्था उसके घर, मंदिर मस्जिद और मन तक ही सिमित होनी चाहिए लेकिन जब आप अपने धर्म को एयरपोर्ट की सुरक्षा लाइन पार कराकर विमान की सीट तक ले आते हैं तब आप आस्था नहीं, अपना दबदबा दिखा रहे होते हैं और सुरक्षा एजेंसियों का झुक जाना इस दबदबे की सबसे बड़ी जीत है. Devotion On Flight

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