BRICS Summit: दुनिया पहले से ही बहुत से खेमों में बंटी हुई है. हर खेमे का हर देश अपनी पहले सोचता है, विश्व कल्याण और जन कल्याण की बाद में. ऐसे में ब्रिक्स जैसी समिट, शिखर सम्मेलन,  बेमतलब की किट्टी पार्टी सा बन कर रह जाती है. ब्राजील, रूस, इंडिया, चीन, साउथ अफ्रीका देशों के नाम के पहले अक्षरों का यह शब्द एक तरह से अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए बनाया गया था लेकिन किसी भी देश ने ब्रिक्स के लिए अमेरिका से संबंध खराब नहीं किए.

इसलिए आज ब्रिक्स एक तमाशा बन कर रह गया है. हां, इस बहाने इन और अन्य सदस्य देशों के नेताओं को एकदूसरे से मिलने का एक अवसर जरूर मिल जाता है. जब ब्रिक्स का गठन हुआ था तब पहले 5 देश तेजी से तरक्की कर रहे थे लेकिन अब वे सब अमेरिकी सिरफिरे खब्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ऊटपटांग फैसलों के शिकार हैं. रूस ने यूक्रेन से बेमतलब का युद्ध छेड़ कर अपनी माली हालत बिगाड़ ली है जबकि भारत में मंदिर राजनीति चालू है जिस के आगे जनकल्याण के सारी कदम स्वाहा हो गए लग रहे हैं.

ब्राजील और साउथ अफ्रीका की अर्थव्यवस्थाएं वैसी नहीं रह पाईं जैसी 2012 में थीं. यानी, ब्रिक्स देशों में ब्रेक्स साफ दिख रहे हैं.

आज यह संस्था यानी ब्रिक्स बेकार में जनता का पैसा फूंकती है. भारत इस बार मेजबानी कर रहा है जिस का मौका बारीबारी से हर देश को मिलता है. पर जी-20 की तरह प्रचार यह किया जा रहा है कि इस से भारत का नाम ऊंचा हो गया है जिस का श्रेय नरेंद्र मोदी को जाना चाहिए.

भारत बड़ा देश है, उस के प्रधानमंत्री के पास टैक्स का बड़ा धन है पर ब्रिक्स टीमों में उस की प्रति व्यक्ति आय सब से कम है. जिस भारत मंडपम में यह सम्मेलन हुआ उस के 5 किलोमीटर के दायरे में कम से कम 5 लाख लोग झुग्गियों में रहते मिल जाएंगे, यानी, वे अभी भी 1947 में जी रहे हैं.

उन सड़कों, जो एयरपोर्टों से होटलों तक जाती हैं और होटलों से भारत मंडपम, जिसे प्रगति मैदान कहा जाता था, के अलावा शहरभर की सड़कें गड्ढों, अतिक्रमण, खराब ट्रैफिक लाइटों, टूटे स्ट्रीट फर्नीचर, कूड़े के ढेरों से भरी हैं. यह भारत मंडपम के 5 किलोमीटर के दायरे में भी दिख जाएगा. पुरानी दिल्ली 5 किलोमीटर से कम दूर है.

वे देश, जहां कुछ भी ठीक नहीं है, कैसे ढोल पीट सकते हैं कि वे अपने देशों, दुनिया की 40 फीसदी आबादी, के लिए ब्रिक्स के जरिए नया युग लाएंगे. भारत को ब्रिक्स के सम्मेलन को आयोजित करने की अपनी बारी आने पर करते रहना चाहिए लेकिन हर नए प्रधानमंत्री को खयाल रखना चाहिए कि वह इसे वार्षिक मीटिंग समझे और मेजबानी करने के लिए देश की जनता पर रोब न झांड़े कि वह विश्वनेता बन गया है, रातोंरात. BRICS Summit

 

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