Delivery Workers: इसमें कोई दो राय नहीं कि जमेटो, blinkit, ओला, उबर और स्विगी जैसे प्लेटफार्म रोजगार पैदा कर रहे हैं और इससे आम आदमी को सहूलियत भी मिल रही है. किसी को खाना मंगवाना है बस दस मिनट में हाजिर. किसी को स्टेशन पहुंचना है तो रैपिडो हाजिर लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि यह तमाम प्लेटफार्म आम आदमी की ग्रोथ खत्म कर रहे हैं. यह आम आदमी की बचत पर डाका है. असल में तो यह अमीरों के शौक हैं जिनका शिकार मिडिल क्लास हो रहा है.
सच यह है कि ये प्लेटफॉर्म नौकरी नहीं, गिग देते हैं. गिग का मतलब है काम है तो पैसा है, काम नहीं तो पैसा नहीं. पहले एक आदमी टैक्सी चलाकर अपनी टैक्सी का मालिक होता था, वह रोज कमाता था, धीरे धीरे एक से दो, दो से चार टैक्सी कर लेता था और बेटे के लिए धंधा छोड़ जाता था. यह असली ग्रोथ थी, पूंजी बनती थी. अब ओला उबर में ड्राइवर मालिक नहीं है. गाड़ी उसकी, किस्त उसकी, पेट्रोल उसका, इंश्योरेंस उसका फिर भी वह नौकर है क्योंकि सबकुछ उसका होने के बावजूद किराया कंपनी तय करती है.
कंपनी हर राइड पर 25 से 30 प्रतिशत कमीशन काट लेती है. अगर ड्राइवर ने किस्त नहीं भरी तो गाड़ी बैंक वाला उठा ले जाता है. मतलब एक ड्राइवर 1500 से 2000 रुपये रोज कमाने के लिए 12 घंटे खटेगा लेकिन कभी वह फ्लीट का मालिक नहीं बन पाएगा. यह रोजगार नहीं है बल्कि यह मॉर्डन बंधुआ मजदूरी है. ओला, उबर हर राइड पर 25 से 30 प्रतिशत कमीशन काटती है. फर्क साफ है कि कंपनियां अपने नेटवर्क के नाम पर दोगुना पैसा ले रही हैं.
डिलीवरी बॉय की बात करें तो उसके लिए कोई प्रमोशन नहीं है. एक फैक्ट्री में चपरासी भी 10 साल बाद क्लर्क बन सकता है लेकिन स्विगी जोमैटो और ब्लिंकिट में 10 साल काम करने वाला लड़का 10 साल बाद भी डिलीवरी बॉय ही रहता है. उसकी सैलरी नहीं बढ़ती, PF नहीं कटता, हेल्थ इंश्योरेंस नहीं होता, एक्सीडेंट हो गया तो कंपनी हाथ खड़े कर देती है. रिसर्च के अनुसार भारत में गिग वर्कर की औसत कमाई सभी खर्च निकालने के बाद 15000 से 18000 के बीच रहती है और इसमें से वह अपना बाइक का मेंटेनेंस और मोबाइल का डेटा भी खुद देता है. यह पैसा घर चलाने लायक तो है लेकिन इससे बचत नहीं हो सकती.
मिडिल क्लास की लूट पर चलता धंधा
ये तमाम प्लेटफार्म असल में मिडिल क्लास की लूट पर चल रहे हैं. इन प्लेटफॉर्म ने सहूलियत के नाम पर आदत बिगाड़ी है. पहले घर में महीने का राशन एक साथ आता था. अब ब्लिंकिट पर रोज 200 रुपये का सामान मंगवाते हैं और हर बार 20 रुपये डिलीवरी और 30 रुपये हैंडलिंग फीस देते हैं. महीने में यही 1500 रुपये अमीर कंपनी के पास चला जाता है. जेब से पैसा जाता है पर लगता है कि टाइम बच रहा है. सच यह है कि अमीर निवेशक का पैसा इन प्लेटफॉर्म में लगा है, वह हर ऑर्डर पर घाटा दिखाकर मार्केट कब्जा कर रहा है और जब लोकल दुकान, लोकल टैक्सी स्टैंड खत्म हो जाएंगे तो यही कंपनियां दाम बढ़ा देंगी. यह वही ईस्ट इंडिया कंपनी वाला मॉडल है.
इससे अमीर और गरीब की खाई बढ़ रही है. डेटा देखिए. स्विगी और जोमैटो का वैल्यूएशन लाखों करोड़ में है लेकिन उनका डिलीवरी बॉय आज भी किराए के कमरे में रहता है. ओला उबर का मालिक अरबपति है लेकिन उसका ड्राइवर EMI पर जिंदगी काट रहा है. प्लेटफॉर्म ने बीच का पूरा पैसा जो पहले लोकल दुकानदार और लोकल टैक्सी मालिक का होता था और यह पैसा उसी मोहल्ले में खर्च होता था, अब यह पैसा विदेश में बैठे निवेशकों की जेब में चला जाता है. पहले पैसा मोहल्ले में घूमता था, अब पैसा ऊपर जाता है और वापस नहीं आता.
यही कारण है कि मिडिल क्लास को लगता है कि वह अमीर वाली लाइफ जी रहा है, 10 मिनट में सामान आ रहा है लेकिन महीने के आखिर में उसकी बचत जीरो हो जाती है. यह सहूलियत नहीं, शौक है और यह शौक अमीरों ने मिडिल क्लास को बेचा है. नतीजा साफ है. ये प्लेटफॉर्म सुविधा कम, लूट ज्यादा हैं. ये रोजगार नहीं दे रहे, रोजगार को छोटा कर रहे हैं और एक पूरी पीढ़ी को बिना पूंजी वाला मजदूर बना रहे हैं.
मज़बूरी का धंधा
भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार 40 प्रतिशत गिग वर्कर की कमाई 15000 रुपये महीना से भी कम है. नीति आयोग के मुताबिक देश में 2021 में 77 लाख गिग वर्कर थे, 2024 में 1.2 करोड़ हो गए और 2030 तक 2.35 करोड़ हो जाएंगे. सरकार इसे रोजगार मानती है लेकिन यह रोजगार नहीं है बल्कि मजबूरी का धंधा है.
बोरजो ने 40 शहरों में 2000 डिलीवरी वर्करों पर रिसर्च की. जिसके नतीजे चौँकाने वाले हैं. 77 प्रतिशत डिलीवरी वर्कर्स की सालाना कमाई ढाई लाख से कम निकली. सिर्फ 2.6 प्रतिशत ही 5 से 7.5 लाख तक पहुंच पाते हैं. 43 प्रतिशत ड्राइवर दिन का 500 रुपया भी खर्च काटने के बाद नहीं कमा पाते. वहीं 83 प्रतिशत ड्राइवर 10 घंटे से ज्यादा काम करते हैं, 60 प्रतिशत 12 घंटे से ज्यादा और 31 प्रतिशत 14 घंटे से ज्यादा सड़क पर रहते हैं. तुलना के लिए भारत में फैक्ट्री कानून में 8 घंटे काम तय है. सड़क पर गालियां और मारपीट आम बात है. 41.5 प्रतिशत डिलीवरी बॉय ने माना कि काम के दौरान उनके साथ हिंसा हुई.
कंपनी के दावे अलग हैं. जोमैटो के मालिक ने बताया कि 2025 में एक पार्टनर साल में औसत 38 दिन ही काम करता है और दिन के 7 घंटे. सिर्फ 2.3 प्रतिशत लोग 250 दिन से ज्यादा टिकते हैं. मतलब 65 प्रतिशत लोग एक साल में ही काम छोड़ देते हैं. यह फ्लेक्सिबिलिटी नहीं, थक कर भागने की मजबूरी है. राइड हेलिंग ड्राइवर की औसत कमाई 18000 से 28000 और डिलीवरी वर्कर की 12000 से 22000 के बीच है, जबकि डिजिटल फ्रीलांसर 25000 से 45000 कमा लेता है. काम के घंटे सबसे ज्यादा डिलीवरी वाले के हैं, 12 से 16 घंटे रोज. सोशल सिक्योरिटी लगभग किसी के पास नहीं है.
इसका मतलब साफ है. प्लेटफॉर्म का अरबों का प्रॉफिट नीचे वाले 77 प्रतिशत लोगों के 15000 रुपये के पसीने से बन रहा है. पूंजी ऊपर जा रही है, मेहनत नीचे रह जा रही है. 2026 में बेस कमीशन 18 से 28 प्रतिशत है, उस पर 18 प्रतिशत जीएसटी, 2 प्रतिशत पेमेंट गेटवे और विजिबिलिटी के लिए रोज 400 से 500 रुपये का ऐड. एक 500 रुपये के ऑर्डर पर कंपनी 125 रुपये कमीशन, 22 रुपये जीएसटी, 10 रुपये गेटवे और 50 रुपये डिस्काउंट का हिस्सा काट लेती है. यानी 207 रुपये वहीं साफ. रेस्टोरेंट को मिलता है सिर्फ 191 रुपये. अभी इसमें पनीर, तेल, गैस, कारीगर की पगार और पैकिंग का खर्च जोड़ो तो मार्जिन 10 प्रतिशत से नीचे आ जाता है. बेंगलुरु होटल एसोसिएशन ने इसी वजह से अगस्त 2025 में इन तमाम प्लेटफार्म के बहिष्कार की चेतावनी दी थी.
ग्राहक भी बचत नहीं कर रहा. MealMargin नाम की स्टडी के अनुसार अगर वही खाना अगर काउंटर पर जाकर लो तो 6 से 31 प्रतिशत सस्ता पड़ता है. वजह है प्लेटफॉर्म फीस 5 से 25 रुपये, पैकिंग चार्ज, डिलीवरी चार्ज. छोटा ऑर्डर 250 रुपये का हो तो यही फीस 36 प्रतिशत तक पड़ जाती है. मतलब 10 मिनट की सुविधा के लिए मिडिल क्लास हर थाली पर 80 से 100 रुपये एक्स्ट्रा दे रहा है.
स्विगी जोमैटो और ओला ने पिछले 5 साल में 50000 करोड़ से ज्यादा का घाटा दिखाकर मार्केट पर कब्जा किया है. यह घाटा विदेशी फंड से आया है. रणनीति यह है कि पहले सस्ता दो, लोकल ऑटो स्टैंड, लोकल ढाबा और किराना खत्म करो, फिर दाम बढ़ा दो. भारत में 2024 में क्विक कॉमर्स से लोकल किराना की बिक्री में 12 से 15 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है. यह पैसा पहले मोहल्ले में घूमता था, अब बेंगलुरु हेडक्वार्टर और फिर सिंगापुर की होल्डिंग कंपनी में जाता है इसीलिए खाई बढ़ रही है. ऊपर 1 प्रतिशत निवेशक का वैल्यूएशन 1 लाख करोड़ पार, नीचे 77 प्रतिशत वर्कर की सालाना आय ढाई लाख से कम. यह ग्रोथ नहीं, धन का वन वे ट्रांसफर है.
रोजगार पैदा हो रहा है या रोजगार का भ्रम?
काम तो मजदूर को नरेगा में भी मिलता है पर वह रोजगार नहीं कहलाता. रोजगार वह होता है जिसमें कल की सुरक्षा हो. जिसमें आदमी आज मेहनत करे तो कल उसकी मेहनत थोड़ी बड़ी हो जाए. उसकी अपनी पूंजी बने, उसकी अपनी पहचान बने. प्लेटफॉर्म ने इस पहचान को खत्म कर दिया है. पहले मोहल्ले में नाई की दुकान होती थी, पंसारी की दुकान होती थी, ऑटो स्टैंड होता था. नाम से जानते थे लोग. रामू काका की दुकान, फरीद भाई की टैक्सी. अब नाम खत्म हो गया है. अब सिर्फ एक ऐप है. ड्राइवर बदल गया तो भी ऐप वही है. डिलीवरी बॉय बदल गया तो भी ऐप वही है. आदमी गायब है, ऐप बाकी रह गया है. यही पूंजी का सबसे बड़ा खेल है. आदमी को हटाकर, सिस्टम को आगे रखा जाये ताकि पूरा समाज सिस्टम का गुलाम हो जाये.
इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे हुनर मर रहा है. जो लड़का पहले मोटर मैकेनिक बनता था, वह अब डिलीवरी बॉय बन रहा है क्योंकि इसमें तुरंत पैसा दिख रहा है लेकिन मैकेनिक में हुनर था, वह कल खुद की दुकान खोल सकता था. डिलीवरी में कोई हुनर नहीं. दस साल बाद भी वह वहीं रहेगा. इससे समाज का भरोसा भी टूट रहा है. पहले ग्राहक और दुकानदार में रिश्ता था. उधारी चलती थी, भरोसा चलता था. अब बीच में ऐप आ गया है. ग्राहक को लगता है कंपनी सेवा दे रही है, दुकानदार को लगता है कंपनी ऑर्डर दे रही है. दोनों को लगता है वे आजाद हैं पर दोनों कंपनी के नौकर बन गए हैं.
मोहल्ले की अर्थव्यवस्था जो आपस के भरोसे पर चलती थी, अब एक सर्वर पर चल रही है जो बेंगलुरु में है और मिडिल क्लास को लगता है वह सुविधा ले रहा है. असल में वह सुविधा नहीं, आदत खरीद रहा है. घर में दाल बनी है फिर भी फोन से बिरयानी मंगवा ली. जरूरत नहीं थी पर मंगवा ली क्योंकि ऐप ने कहा 10 मिनट में आएगी. यही आदत धीरे धीरे बचत खा जाती है. पहले मिडिल क्लास का पैसा मिडिल क्लास में घूमता था. किराना वाले से सब्जी वाले के पास, सब्जी वाले से दर्जी के पास. अब वही पैसा एक बटन दबाते ही ऊपर चला जाता है और लौटकर नहीं आता. ये प्लेटफार्म काम चलाऊ सिस्टम हैं इन्हें रोजगार कहना सही नहीं है. सिस्टम अच्छा है लेकिन जब यही सिस्टम आदत बन जाए तो वह गुलामी बन जाती है.





