Divorce and Depression: तलाक हुआ तो जिंदगी में क्याक्या और कैसेकैसे बदलाव तनाव और अवसाद की शक्ल में आएंगे और उन्हें कैसे मैनेज करना है, इस की ट्रेनिंग कहीं कोई नहीं देता. नतीजतन, लाखों लोग हताशा और निराशा के गर्त में डूब जाते हैं. जबकि, होना यह चाहिए कि तलाक को कलंक मानने की मानसिकता, जो मूलतया धर्म के दुकानदारों की देन है, को हर स्तर पर हतोत्साहित किया जाए, ताकि लोग तलाक के बाद भी खुशहाल जिंदगी जी पाएं.
अपने मरीजों को तनाव व डिप्रैशन से उबारने वाली व सटीक मनोवैज्ञानिक सलाह और इलाज देने वाली मनोचिकित्सक डाक्टर हेमिका अग्रवाल खुद को समझाने में नाकाम रहीं और इस तरह रहीं कि बीती 3 अगस्त की शाम उन्होंने 7वीं मंजिल से कूद कर आत्महत्या कर ली. गाजियाबाद में हेमिका और उन के पिता आर के चंद्रा, जो खुद भी जानेमाने वरिष्ठ मनोचिकत्सक हैं, को हरकोई जानता था.
लेकिन यह कम ही लोग जानते थे कि इस खूबसूरत युवा डाक्टर की जिंदगी में विकट की उथलपुथल मची हुई है, जिस का इलाज किसी के पास नहीं. आम हैरानपरेशान लोगों की तरह ऊपर से सामान्य दिखने वाली हेमिका बीते डेढ़ साल से न तो ढंग से खापी पा रही थीं और न ही सुकूनभरी नींद ले पा रही थीं.
गाजियाबाद एक्सटैंशन की औफिसर सिटी सोसाइटी में अभिजात्य और संभ्रांत लोग रहते हैं जो हेमिका की आत्महत्या की खबर सुनते ही हैरान और सकते की स्थिति में आ गए लेकिन जब आर के चंद्रा ने मीडिया और पुलिस को दिए अपने बयान में यह बताया कि हेमिका का तलाक कोई डेढ़ साल पहले हुआ था और पिछले कुछ दिनों से वे भारी मानसिक तनाव से गुजर रही थीं तो हर किसी को समझ आ गया कि हेमिका तलाक के बाद के अवसाद से जूझती खुद को और हालात को मैनेज नहीं कर पा रही थीं.
तलाक के बाद या उस की मुकदमेबाजी के दौरान ही अकसर लोग डिप्रैशन की गिरफ्त में आ जाते हैं. यह सोचना बेमानी है कि इस अवसाद के पुरुष शिकार नहीं होते. गुरुग्राम के सैक्टर 65 में स्थित एमथ्रीएम एमराल्ड हिल्स सोसाइटी में 45 वर्षीय निशांत कुमार ने भी हेमिका की तर्ज पर
2 मई की रात लगभग 9 बजे 8वीं मंजिल से कूद कर जान दे दी थी.
निशांत की शादी अब से कोई 12 साल पहले हुई थी. शादी के बाद ही वे पत्नी सहित अमेरिका चले गए थे जहां पतिपत्नी दोनों ही एक कंपनी में नौकरी करते थे लेकिन कुछ दिन पहले ही दोनों में विवाद होने लगे थे, जो बढ़तेबढ़ते अलगाव की दहलीज तक आ गए.
मामला अदालत तक पहुंचा जिस की अभी सुनवाई और पेशियां चल ही रही थीं. मौत से चंद दिन पहले ही निशांत भारत आ गए थे और गुरुग्राम में अपने पेरैंट्स व बहन के साथ रहने लगे थे लेकिन तलाक के दंश ने यहां भी उन का पीछा न छोड़ा तो उन्हें ऐसी जिंदगी से आजादी ही बेहतर लगी.
आएदिन कोई न कोई तलाकशुदा या मुकदमा लड़ रहे पतिपत्नी में से किसी न किसी के आत्महत्या कर लेने की खबर आम होती है तो यह सोचना बेहद स्वाभाविक है कि क्या इस के लिए सिर्फ वही जिम्मेदार थे या यह समाज, कानून और धर्म भी इस के जिम्मेदार हैं जिन्होंने तलाक को धार्मिक, पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कलंक करार देते तलाक के बारे में कई पूर्वाग्रह भी पैदा और प्रचलित कर रखे हैं?
जरूरी है तलाक केबाद की ट्रेनिंग
मुमकिन है दोनों ही बराबरी के जिम्मेदार हों लेकिन इन 2 उच्चशिक्षित और खासा कमा रहे अभिजात्यों की आत्महत्या से एहसास यह भी होता है कि इन्हें या इन के जैसों को कोई यह ट्रेनिंग नहीं देता कि अगर वैवाहिक जीवन सफल न हुआ या पार्टनर से पटरी न बैठी, जिस के चलते नौबत तलाक की आई तो उस के बाद की जिंदगी कैसे जीना है और तलाक के बाद के डिप्रैशन को कैसे मैनेज करना है. न केवल इन्हें बल्कि सभी को नसीहत बचपन से यही दी जाती है कि शादी का टूटना यानी तलाक होना कोई पाप या अपराध है जिस से बचना चाहिए. जाहिर है, ये स्थापित मान्यताएं वैवाहिक घुटन की बड़ी वजह होती हैं.
इस के बाद भी जिस तेजी से तलाक होने की संख्या बढ़ रही है उसे देख लगता तो यही है कि अब वक्त है कि युवाओं को आगाह कर दिया जाए या वे खुद ही दिमागी तौर पर शादी के साथ ही तलाक के लिए भी तैयार रहें. ऐसा कहने की वजह जाननेसमझने से पहले आंकड़ों पर नजर डालना अहम और जरूरी है.
बेंगलुरु स्थित एक प्रमुख ला फर्म प्राइम लीगल के मुताबिक पिछले कुछ सालों में खासतौर से महानगरों में तलाक के मामलों में 30 से 40 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है. इस में भी हैरान कर देने वाली बात यह है कि 50 साल से ज्यादा उम्र वाले कपल्स की तादाद भी 30 फीसदी के लगभग है (यानी ऐसे कपल्स जो 15 साल से ज्यादा का वक्त लाइफपार्टनर के साथ गुजार चुके हैं). इस उम्र से ज्यादा के कपल्स के तलाक को बोलचाल की भाषा में ग्रे डिवोर्स या सिल्वर स्प्लिटर्स या फिर ‘डायमंड डिवोर्स’ भी बाल काले से सफेद होने के चलते कहा जाता है.
यह संख्या, जाहिर है, अब दिनोंदिन बढ़ना ही है क्योंकि लोग जागरूक हो रहे हैं और शादी को सात जन्मों का बंधन करार देने और थोपने की रूढ़ि को नहीं मानते हैं. दोटूक कहा जाए तो वह दौर मैट्रोज से विदा हो चुका है और बी टियर शहरों की सीमाएं लांघ रहा है जिस में न केवल महिलाएं बल्कि पुरुष भी खूंटे के बैल की तरह शादी के बंधन में बंधे घुटते रहते थे लेकिन समाज के दबाब और डर के चलते शादी निभाने को मजबूर रहते थे.
नए दौर के कपल्स बेहतर समझते हैं कि शादी एक एग्रीमैंट या कंप्रोमाइज है जिसे निभाना या जबरदस्ती ढोना किसी भी तरह की अनिवार्यता नहीं है और ठीक इसी तरह तलाक कोई कलंक नहीं बल्कि 24X7 की घुटनभरी जिंदगी से आजादी है जिस की इजाजत और सहूलियत भारत का संविधान और कानून देता है.
अगर यह घुटन से आजादी है तो फिर क्यों हेमिका और निशांत जैसे हजारों लोग आत्महत्या कर लेते हैं जबकि उन्हें तो जश्न मनाना चाहिए. इस सवाल का जवाब बेहद साफ है कि हमारे यहां तलाक के बाद के हालात और जिंदगी का किसी को अंदाजा या तजरबा नहीं होता. इसलिए कुछ लोग यह आत्मघाती कदम उठा लेते हैं. अगर वे शादी से पहले की जिंदगी की तरह तलाक के बाद की जिंदगी भी जी पाते तो कोई वजह नहीं कि उन्हें जान गंवानी पड़ती.
खुद को प्रशिक्षित करें
प्री और पोस्ट मैरिज काउंसलिंग की दुकानें अब गलीगली खुल गई हैं. जाहिर है, फैमिली स्ट्रक्चर ऐसा नहीं रहा कि वहीं से यह सलाह मिले. युवा इन एजेंसियों की सेवाएं ले भी रहे हैं ताकि एक खुशहाल शादीशुदा जिंदगी गुजारने के टिप्स उन्हें मिल सकें लेकिन कहीं भी पोस्ट डिवोर्स काउंसलिंग एजेंसी नाम की चीज नहीं है जो यह बता पाए कि तलाक अगर हो जाए तो जिंदगी, समाज, परिवार और खुद की मानसिकता में क्याक्या बदलाव आते हैं और उन्हें कैसे मैनेज करना है. सो, कम से कम हेमिका और निशांत की तरह आत्महत्या करने की नौबत न आए.
बिलाशक शादी जिंदगी की एक अहम घटना या आयोजन कुछ भी कह लें है लेकिन इस के सफल होने की गारंटी कोई नहीं ले सकता. यह कब अलगाव और तलाक की हद तक जा पहुंचे, यह भी कोई नहीं बता सकता. यह ठीक है कि पश्चिमी देशों की तरह भारत में बातबात पर तलाक नहीं होते, यही वजह है कि यहां तलाक की दर महज एक फीसदी है.
लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि कपल्स तलाक नहीं लेना चाहते या अपनी मैरिड लाइफ एंजौय कर रहे होते हैं. दरअसल, धर्म, समाज और कानून तलाक की राह में बड़ा रोड़ा हैं. इस तिकड़ी की हर मुमकिन कोशिश यह रहती है कि कम से कम तलाक हों जिस से संस्कृति और संस्कारों की आड़ में चलने वाली धर्म की दुकान से आमदनी होती रहे. फिर भले ही कपल्स नारकीय घुटनभरी जिंदगी ढोते खुशियों से दूर और महफूज रहें. इस से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जो जितनी ज्यादा तकलीफ में रहेगा, तनाव और दुख झेलेगा. वह इन से नजात पाने के लिए दान, पुण्य और पूजापाठ भी ज्यादा करेगा.
ऐसा इसलिए कि देश की अदालतें भी सनातनी और धार्मिक टाइप की हैं जिन की हर मुमकिन कोशिश तलाक को हतोत्साहित करने की ही रहती है. इसलिए तलाक के मुकदमों में जानबूझ कर देर लगाई जाती है. हालांकि कभीकभार राहत देने वाले कुछ ऐसे फैसले भी आ जाते हैं जो कपल्स की व्यक्तिगत इच्छाओं, आजादी और भविष्य को गौर करते होते हुए होते हैं लेकिन ऐसे फैसले अकसर सुप्रीम कोर्ट से ही ज्यादा आते हैं. निचली अदालतों में तो पतिपत्नी सालों एड़ियां रगड़ते अधेड़ से बूढ़े हो जाते हैं लेकिन तलाक की डिक्री उन्हें नसीब नहीं होती. इसलिए अधिकतर कपल्स को बिना अदालत वाला नर्क यानी मौजूदा जिंदगी ही ज्यादा बेहतर लगती है.
फंसते या मरते वे हैं जो तलाक तो ले लेते हैं लेकिन इस के बाद की जिंदगी की दुश्वारियों का अंदाजा नहीं लगा पाते. एक त्रासदी, उपेक्षा अकेलापन और कुछ मामलों में अधूरापन भी उन्हें निगलने को तैयार बैठा रहता है. हेमिका बेहतर जानतीसमझती थीं कि इन हालात से कैसे निबटना है लेकिन वे खुद पर मनोविज्ञान के नियम, सिद्धांत और उपचार लागू नहीं कर पा रही थीं.
शादी के बाद बदली जिंदगी अकसर लोग सहज स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि उस में उल्लास, उत्साह और पूरे समाज की मौजूदगी रहती है लेकिन तलाक लेते वक्त और बाद की जिंदगी में कोई साथ नहीं होता. देखते ही देखते दूसरे तो दूसरे, खुद का नजरिया ही खुद के प्रति बदल जाता है. मानो, कोई भारी गलती या गुनाह तलाक ले कर कर दिया हो. यह गिल्ट या आत्मग्लानि तलाकशुदाओं को बेहद भारी पड़ती है यदि वे वक्त रहते इस से मुक्त न हो पाएं.
ऐसे हों मुक्त
1. तलाक के बाद जिंदगी में तेजी लाएं और किसी भी तरह के भार या अपराधबोध से बचने के लिए ये टिप्स अपनाएं-
2. तलाक लेना कोई गुनाह, पाप या अधर्म नहीं है. यह घुटनभरी जिंदगी से छुटकारा पाने का इकलौता रास्ता है.
3. तलाक की बात किसी से छिपाने की जबरन कोशिश न करें. जो भी संपर्क में आए उसे इस की सूचना जरूर दें. हर्ज की बात नहीं अगर व्हाट्सऐप के फैमिली व फ्रैंड्स ग्रुप्स में इसे शेयर किया जाए और संभावित सवालों के नपेतुले जवाब तैयार रखे जाएं लेकिन यह याद रखें कि आप को किसी को कोई स्पष्टीकरण नहीं देना है.
4. अपने शौक व इच्छाएं जिंदा रखें, उन्हें पूरा किए जाने में कोई लिहाज किसी का न करें.
5. एकांत से बचें और ज्यादा सोचें नहीं. कड़वा अतीत अपने जीवन व व्यक्तित्व पर हावी न होने दें.
6. शराब या किसी भी तरह के नशे का सहारा न लें. इस से गम कम नहीं होता बल्कि और बढ़ता है.
7. अलगाव या तलाक के मुकदमे के दौरान पतिपत्नी दोनों को ही अपनी यौनेच्छाओं को ज्यादा नहीं दबाना चाहिए. इस से यौन कुंठाएं जन्म लेती हैं जो घातक ही साबित होती हैं. इन्हें कानूनी दायरे में रहते सहूलियत के मुताबिक सुरक्षित तरीके से पूरा करना हर्ज की बात नहीं.
8. तलाक के बाद के विकल्पों अर्थात दूसरी शादी के बारे में गंभीरतापूर्वक न केवल सोचें बल्कि उस पर अमल भी वक्त रहते शुरू कर दें. इस से भी तनाव और अवसाद कम होते हैं. यह याद रखें कि दूसरी शादी कोई गुनाह नहीं बल्कि जिंदगी को पटरी पर लाने के लिए
जरूरी है.
9. अगर इस के बाद भी राहत न मिले तो मनोचिकित्सक या काउंसलर की सलाह लें जो आजकल हर जगह आसानी से उपलब्ध हैं.
10. और सब से अहम बात अच्छा साहित्य और पत्रिकाएं पढ़ने की आदत डालें. अच्छा सामयिक साहित्य सोशल मीडिया के इस दौर में बहुत राहत देने वाला साबित हो रहा है क्योंकि उस की छाप स्थायी होती है और सोशलमीडियाई छिछोरापन उस में नहीं होता.
उमर और आमिर जैसों
से सबक लें
तलाक के बाद और पहले मुकदमे के दौरान खुद को तनावमुक्त कैसे रखा जाए, इस की एक ताजी मिसाल जम्मूकश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला हैं जो राजनीति और व्यक्तिगत जिंदगी दोनों को ले कर उथलपुथल का शिकार रहे लेकिन उन्होंने सब्र नहीं खोया और अपने काम व कैरियर पर फोकस उन्होंने ढीला नहीं पड़ने दिया.
उमर अब्दुल्ला की शादी 32 साल पहले 1 सितंबर, 1994 को दिल्ली की जानीमानी बिजनैस वुमन पायल नाथ से हुई थी लेकिन आपसी अनबन और मतभेदों के चलते दोनों साल 2011 से अलग रह रहे थे. शादी के वक्त दोनों ही दिल्ली के नामी ओबेराय होटल में जौब करते थे. यहीं दोनों की जानपहचान हुई जो प्यार में तबदील हो गई. उमर मुसलमान थे और पायल सिख थीं लेकिन दोनों के परिवारजनों को कोई एतराज उन की शादी से नहीं था. एतराज और बवाल का डर कश्मीरी पंडितों का था, सो, दोनों ने इंगलैंड जा कर शादी की.
वजहें कुछ भी हों, उन के चलते अनबन शुरू हुई तो तलाक के लिए उमर ने फैमिली कोर्ट में अर्जी दी. इस के लिए उन्होंने पायल पर परित्याग सहित क्रूरता का आरोप लगाया था. जिसे साल 2016 में अदालत ने खारिज कर दिया था. मामला हाईकोर्ट पहुंचा जिस ने निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा. हाईकोर्ट ने पायल व दोनों बेटों के लिए गुजाराभत्ते का आदेश भी उमर को दिया. यह दिसंबर 2023 की बात है.
लेकिन अब तक उमर और पायल दोनों अदालती कार्रवाई से आजिज आ चुके थे. लिहाजा, उन्होंने समझदारीभरा फैसला यह लिया कि बजाय अदालतों में एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप मढ़ने के, बाहर ही समझौता कर लिया जाए. दोनों ने एकदूसरे पर दायर मुकदमे वापस लेते आपसी सहमति से तलाक ले लिया. इस बाबत दोनों ने संविधान के अनुच्छेद 142, जो सुप्रीम कोर्ट को असाधारण शक्ति देता है, का सहारा लिया. इस की वजह यह थी कि विवाह कानूनों, चाहे वह हिंदू विवाह अधिनियम हो या फिर अन्य व्यक्तिगत कानून हो, में सीधेतौर पर तलाक का कोई कानूनी आधार नहीं है.
यह बिलाशक बड़ी कानूनी खामी है कि तलाक के लिए किसी न किसी आधार, जो आरोप के सिवा कुछ और हो भी नहीं सकता, का होना जरूरी है. दरअसल, उमर और पायल की शादी इंगलैंड में वहां के नागरिक कानून के तहत हुई थी. प्रसंगवश यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं कि शुरू में उमर ने विदेशी विवाह अधिनयम 1969 की धारा 18 के तहत क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की मांग की थी. जिसे विशेष विवाह अधिनियम 1954 की धारा 27 (1) (ख) और 27 (1) (घ) के साथ पढ़ा गया था. चूंकि वे अपने लगाए आरोप साबित नहीं कर पाए थे इसलिए उन का मुकदमा खारिज होता रहा.
बहरहाल, नामी और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के दखल से सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत दोनों का तलाक संपन्न कराया यानी डिक्री दी लेकिन यह आसान नहीं था क्योंकि कानूनीतौर पर मामला उलझा हुआ था. अब अगर उमर भी थकहार कर बैठ जाते तो उन्हें तलाक न मिलता और कागजों में वे पायल के पति बने रहने को मजबूर रहते लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, इसलिए आखिरकार रास्ता निकल ही आया.
हालांकि इस में दोनों के 17 साल अदालतों में जाया हुए. ऐसे में निशांत जैसों का एकदो पेशी या तारीखों में घबरा जाना और आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठा लेना बताता है कि कपल्स को अदालती प्रक्रिया की जानकारी होना भी जरूरी है और इस का अंदाजा या आइडिया शादी के पहले से ही हो तो डिप्रैशन गिरफ्त में नहीं ले सकता.
नामी फिल्म अभिनेता आमिर खान ने तीसरी शादी गौरी सप्रैट से की थी तो हरकोई चौंका था क्योंकि आमिर अपनी पहली दोनों बीवियों को तलाक दे चुके थे और बिना किसी लिहाज या हिचक के सठियाई उम्र में तीसरी शादी कर रहे थे. इस विषय पर पाठक ‘सरिता’ के जुलाई (प्रथम) 2026 के अंक में विस्तार से रिपोर्ट ‘आमिर खान या निकाह खान’ शीर्षक से पढ़ चुके हैं.
13 (बी) में जाएं
आमिर ने कोई सिरदर्दी तलाकों में नहीं ली. उन्होंने दोनों पत्नियों से आपसी सहमति से तलाक लिया. यह तलाक का विवाद रहित आसान कानूनी तरीका है. हिंदू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 28 में इस का प्रावधान है.
उस में एक संयुक्त आवेदन पतिपत्नी को देना होता है कि हम दोनों का साथ रहना अब संभव नहीं व हमारे बीच कोई विवाद नहीं है, इसलिए हम तलाक चाहते हैं. अदालत एक या ज्यादा से ज्यादा 2 तारीखें कपल्स को देती हैं. इस बीच, सबकुछ ठीकठाक रहता है यानी दोनों पक्षों में से कोई पक्ष एतराज नहीं जताता है तो 6 महीने के अंदर तलाक की डिक्री दे दी जाती है.
कई मामलों में तो अदालतों ने इस 6 महीने की अवधि, जिसे कूलिंग औफ पीरियड भी कहते हैं, से भी कपल्स को छूट दी है. अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (2017) में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देते यह कहा था कि 6 महीने की अवधि निर्देशात्मक है, अनिवार्य नहीं. अगर सबकुछ ठीकठाक हो और पतिपत्नी दोनों सहमत हों तो फैमिली कोर्ट भी इस से छूट दे सकते हैं.
लेकिन इस के लिए जरूरी है कि पतिपत्नी दोनों अपने विवाद अदालत के बाहर सुलझा लें, मसलन मेंटिनैंस, दहेज व उपहारों का बंटवारा और बच्चे अगर हों तो उन की कस्टडी वगैरह. इस से फायदा यह है कि पतिपत्नी दोनों एकदूसरे पर सच्चेझूठे आरोप लगाने से बच जाते हैं जिन के चलते मुकदमे के दौरान और तलाक के बाद भी जो तनाव और अवसाद रहता है उस की आशंका खत्म हो जाती है.
13 (बी) का घोषित फायदा यह है कि कपल्स को तलाक ही मिलता है. तनाव और अवसाद नहीं, जो कभीकभी आत्महत्या की वजह भी बन जाते हैं. वक्त के साथसाथ पैसों की बचत भी इस से होती है. इसलिए वकील आमतौर पर इस की सलाह अपने क्लाइंट्स को नहीं देते क्योंकि फिर हर तारीख पर पैसे ऐंठने का जुगाड़ खत्म हो जाता है. महानगरों के कपल्स अब आपसी सहमति से तलाक ज्यादा ले रहे हैं. सरकार और उस की एजेंसियां भले ही 13 बी के तहत होने वाले आंकड़ों को अलग से जारी न करती हों लेकिन जानकारों का मानना है कि मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे शहरों में 50 फीसदी तलाक इसी धारा के तहत हो रहे हैं.
सब से ज्यादा शिक्षित राज्य केरल, जहां देश में सब से ज्यादा तलाक होते हैं, में भी आपसी सहमति से लिए जाने वाले तलाकों की तादाद 50 फीसदी ही आंकी जाती है. चंडीगढ़ का आंकड़ा एक सुखद हैरानी देता है जहां डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में जनवरी 2024 से ले कर मई 2024 तक
35 में से 32 मामले आपसी सहमति से तलाक लेने के थे.
भोपाल के नजदीक सीहोर जिले के वरिष्ठ अधिवक्ता रामनारायण ताम्रकर की मानें तो अब तो छोटे शहरों में भी जागरूकता आ रही है और कपल्स
13 (बी) के तहत तलाक लेने लगे हैं. इस में एक अच्छी बात यह भी है कि विवादित तलाक के मामलों को भी सहमति में तबदील किया जा सकता है. जो कपल्स मुकदमेबाजी से तंग आ चुके हों वे अपने वकील से बात कर अपने मुकदमे को
13 (बी) में ला सकते हैं.
जो कपल्स तलाक के बाद टैंशन और डिप्रैशन नहीं चाहते हैं, वक्त और पैसे बचाना चाहते हैं उन्हें समझदारीभरा यही रास्ता चुनना चाहिए, जिस में तलाक की वजह बताना भी कानूनी बाध्यता
नहीं है. Divorce and Depression l





