Wedding Foofa: फूफा होने की अनिवार्य शर्तों में से एक अहम यह है न केवल आप शादीशुदा हों बल्कि आपका साला भी शादीशुदा और बाल बच्चेदार हो तभी आप फूफा टाइटल के हकदार होते हैं. आपकी नाराजी की कीमत भी फूफा होने के बाद ही बढ़ती है नहीं तो आपके गुस्से का कोई नोटिस तक भी नहीं लेता. इन दिनों नाराज फूफा और फूफागिरी के चर्चे न केवल सोशल मीडिया पर बल्कि आम घरों में भी आम हैं. क्योंकि इस तथाकथित मुहावरे या मिसाल का जिक्र प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने किया है.
फूफा शब्द से ही एक ऐसे आदमी का अक्स दिमाग में उभरता है जो नाराज रहना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता है. दुनिया भर में भले ही मजाक का पात्र बनता रहे लेकिन फूफा नाम के प्राणी की चाल – ढाल, नाज नखरे और तेवर ससुराल की दहलीज पर पहला कदम रखते ही देखने काबिल होते हैं.
कुल जमा फूफा एक दहशत का पर्याय है जो कब किस बात पर बिगड़ या सनक जाए इसका अंदाजा भी कोई नहीं लगा सकता. थोड़े उम्रदराज यानी तजुर्बेकार फूफाओं को तो गुस्सा होने किसी बात या बहाने की आड़ या जरूरत भी नहीं होती. खासतौर से उस वक्त जब साले के बेटे या बेटी की शादी हो. संक्षेप में कहें तो फूफा महज मान सम्मान का भूखा होता है जो उसे न मिलें तो वह विफर उठता है जिससे रंग में भंग पड़ता है.
फूफा पुराण के बहाने राहुल पर निशाना
नाराज फूफा या शादी का फूफा शब्द के जन्म और परवरिश का इतिहास अभी तक शोध का विषय है. इतिहास के विद्यार्थी भी इसके बारे में कुछ नहीं जानते, लेकिन वह विद्यार्थी अगर `एंटायर पोलिटिकल साइंस` जैसे दुर्लभ विषय का स्नातकोत्तर डिग्री धारी हो और देश का प्रधानमन्त्री हो तो अपने अनुभव, शिक्षा दीक्षा और संस्कारों की बिना पर नाराज फूफा का उदाहरण तो दे ही सकता है कि राजनीति का नाराज फूफा कौन है.
पहली दफा उन्होंने इस देशी शब्द का इस्तेमाल बीती 5 सितम्बर को दिल्ली के एसआरसीसी यानी श्रीराम कामर्स कालेज के एक समारोह में करते कहा था कि केम्पस के बाहर आपको दो तरीके के लोग मिलेंगे, एक वो लोग सकारात्मक तरीके से समाज की शक्ति को राष्ट्र की शक्ति में बदलते हैं. दूसरी प्रजाति उन लोगों की है जो कोई भी काम शुरू होने पर नाराज फूफा बन जाते हैं. उनका फेवरेट काम होता है हर काम का विरोध करना, उनका एक ही डायलोग होता है.. इसकी क्या जरूरत थी
जब हम दुनिया का सबसे बड़ा स्टेच्यू बना रहे थे तब फूफा जी ने कमर कस ली कि इसकी क्या जरूरत है. जब हमने हाई स्पीड ट्रेन पर काम किया तो फूफा जी बोले इसकी जरूरत क्या है. जब यूपीअई लेकर आए तो फूफा बोले इसकी जरूरत क्या है. हमने नई पार्लियामेंट बिल्डिंग बनाई तो फिर बोले इसकी जरूरत क्या है …..कुल मिलाकर फूफा शब्द का एक दर्जन बार जिक्र के जरिए उन्होंने यह एहसास कराने की कोशिश की कि फूफा को हल्के में लेने की भूल न की जाए
उन्हें सुन रहे जेन जी बाले इंटलीजेंट बच्चे बिना किसी के समझाए समझ गए कि दरअसल में बात राहुल गाँधी की जा रही है. जिनका नाम सीधे सीधे लेने में मोदी जी को हेठी, हीनता यां कुंठा महसूस हो रही है दूसरे यहाँ राहुल गाँधी को नाम से कोसना उल्टा भी पड़ सकता है . वैसे भी राहुल का नाम लेकर कोसना उनकी शान के खिलाफ है. अब असल नाराज फूफा कौन हुआ यह कोई पहेली नहीं रह जाती.
तीन दिन बाद उन्होंने फिर वडोदरा के एक कार्यक्रम में नाराज फूफा जी शब्द का इस्तेमाल किया. इस बार निशाने पर कहने को विपक्ष था जिसका असल मतलब उनके लिए राहुल गाँधी ही होता है जिन्हें लेकर उनकी असुरक्षा आए दिन उजागर होती रहती है.
पौराणिक फूफाओ की लम्बी लिस्ट
एक सप्ताह के भीतर दो आयोजनों में दर्जन भर बार फूफा फूफा शब्द का इस्तेमाल उन्होंने किया तो सहज लगा कि इस शब्द को लेकर उनमे इतनी बैचेनी, उत्तेजना और रोमांच क्यों है. इस क्यों का सीधा सा जबाब यह है कि उनके दिमाग में ऐसे किस्से कहानियों की लाइब्रेरी है जिसमे पहुंचे हुए साधु संत ऋषि मुनि बगैरह नाराज फूफा की तरह श्राप देते रहते थे.
ये धार्मिक फूफा पहले तपस्या कर ताकत और वरदान हासिल करते थे फिर उसका इस्तेमाल श्राप देने जैसे अपने प्रिय काम में करते थे. यही राहुल गाँधी के बहाने मोदी कर रहे हैं यही पूरी भगवा गैंग आए दिन यह कहते करती रहती है कि राहुल गाँधी सनातनी संस्कृति और संस्कार से नावाकिफ हैं और अगर वाकिफ हैं तो उसके दुश्मन हैं.
अब यह दुश्मन कलयुगी ऋषि मुनियों के काबू नहीं आ रहा तो सब बौखलाए हुए हैं लेकिन समझ नहीं पा रहे कि क्या करें. लोकतंत्र में ताकत श्रापों और वरदान में नहीं बल्कि वोटों में होती है जो 2024 के लोकसभा चुनाव में उम्मीद से ज्यादा कम हुआ है. तब दलित खफा हो गए थे तो अब भगवा गैंग इस बार जेन जी के तेवरों को लेकर सकते में है. क्योंकि सैद्धांतिक रूप से उसका झुकाव मोदी से ज्यादा राहुल गाँधी की तरफ है. वजह वही है जिसे मोदी झींकते नजर आए कि ये बात बात में सवाल करते हैं कि क्यों और इसकी जरूरत क्या थी. जाहिर है जिन्हें 15 अगस्त को दिमागी नक्सली उन्होंने कहा था अब उनको नया संबोधन फूफा का प्रदान कर दिया है.
सबसे बड़े नाराज फूफा – दुर्वासा
मतलब यह कि पौराणिक दौर की तरह मौजूदा दौर के ऋषि मुनियों को जो अच्छा लगे, मुनाफा दे लोगों को लालच दे या डराए जिससे वे धर्म से बंधे दान दक्षिणा के इनके कारोबार के ग्राहक बने रहें वही शाश्वत है बाकी सब मिथ्या और बकबास है. और जो ऐसा करेगा या कहेगा भी तो उसे श्राप देकर भस्म कर दिया जाएगा या अँधा, लूला, लंगड़ा, काना या कोढ़ी बना दिया जाएगा.
मोदी की यह मानसिकता जिन पौराणिक फूफाओ से कनेक्ट होती है उनमे सबसे उपर श्राप देने के लिए कुख्यात ऋषि दुर्वासा का नाम आता है. इस काल्पनिक पौराणिक काल में एक राजा हुआ जिसका नाम अम्बरीश था. विष्णु के इस परम भक्त ने पत्नी सहित एक साल तक चलने बाले एकादशी व्रत का संकल्प लिया था. इस व्रत का समापन उसे कार्तिक महीने की द्वादश तिथि पर करना था. जैसा कि दान दक्षिणा को प्रोत्साहन देने का रिवाज है के मुताबिक अम्बरीश यह सब करने के बाद व्रत खोलने या तोड़ने के लिए खाना खाने ही बाला था कि दुर्वासा उनका बिन बुलाया गेस्ट बनकर पहुँच गए
दुर्वासा ने निमन्त्रण स्वीकारते कहा ठीक है भोजन की तैयारी करो हम नदी में स्नान कर आते हैं. लेकिन नहाने गए तो बहुत देर तक नहीं आए. इधर द्वादशी तिथि खत्म होने बाली थी जिसके बाद खाना खाने पर एकादशी का व्रत निष्फल हो जाता यानी साल भर की मेहनत पर पानी फिर जाता. दिक्कत यह थी कि उस दौर में बिना अतिथि जो ब्राह्मण ही होता था को खिलाए मेजबान का खुद पहले खा लेना पाप माना जाता था जिसकी सजा अलग होती थी
अम्बरीश धर्म संकट में फस गया कि अब क्या करें इधर कुआ है तो उधर खाई है. इस समस्या के हल के लिए उसने विद्वान पंडितों से सलाह ली तो उन्होंने शास्त्रों के मुताबिक सलाह दी कि राजन केवल जल पीना भोजन करने के समान माना भी जाता है और नहीं भी माना जाता. ऐसे में आप पानी पी सकते हैं जिससे ब्राह्मण अतिथि का अपमान भी न हो और आपके व्रत का फल भी आपको मिल जाए. इस तत्कालीन संवैधानिक राय को मानते अमरीष ने एक घूंट पानी पी लिया.
बस फिर क्या था दुर्वासा ने अपने तप बल से जान लिया कि अम्बरीश ने एक घूंट पानी पीने का गुनाह कर दिया है सो उसे आदत के मुताबिक भस्म करने की ठान ली इस बाबत उन्हें खास कुछ नहीं करना पड़ा बस अपनी जटाओं से एक बाल उखाड़ा और उससे कृत्या नाम की एक राक्षसी पैदा कर दी और उसे अम्बरीश को मार डालने नका हुक्म सुना दिया. अम्बरीश ने भी बिना घबराए अपने आराध्य विष्णु का ध्यान लगाया जो तय है क्षीर सागर में अपनी शेषनागी शैय्या पर बैठे बैठे लाइव यह सब देख रहे थे.
इसके बाद कहानी में कुछ उल्लेखनीय नहीं है सिवाय इसके कि विष्णु ने अपने इस भक्त की रक्षा के लिए सुदर्शन चक्र को अपोइन्ट कर रखा था जो इशारा मिलते ही दुर्वासा के पीछे लग गया अब बचने की बारी दुर्वासा की थी जो एक साल सुदर्शन चक्र से बचने के लिए भागते रहे और थक गए तो विष्णु की शरण में जा पहुंचे. कुछ और ऐसे ही मनोरंजक प्रसंगों के बाद दुर्वासा और अम्बरीश में कम्प्रोमाइज हो गया.
कहानी का मेसेज यही है कि विष्णु अनंत विष्णु कथा अनंता है जो दुर्वासा जैसे गुस्सैल फूफाओ की फूफागिरी को काबू करने के काम आती थी.
अजगर बना फूफा
ऐसी ही एक दिलचस्प कथा भृगु ऋषि और राजा नहुष की है जिसे एक बार अस्थाई तौर पर स्वर्ग का राजा बना दिया गया था यानी इंचार्ज बना दिया गया था या कि डेप्युटेशन पर भेज दिया गया था. नहुष इंद्र का सिंहासन पाते ही अहंकार से भर गया. बगैर इन्द्राणी इंद्र होने के मायने क्या यह ख्याल आते ही उसने इन्द्राणी को हासिल करने ऋषियों द्वारा खींची जाने बाली पालकी की मांग की जो कि उसे मिल गई ऋषिगण जब जब पालकी ढो रहे थे तब गुरुर से भरे नहुष ने अगस्त्य मुनि को लात मारते सर्प – सर्प कहा जिसका मतलब था जल्दी चलो.
अगस्त्य तो शायद बर्दाश्त कर लेते लेकिन भृगु ऋषि से अपने साथी का यह घोर अपमानसहन नही हुआ सो उन्होंने अगस्त्य को इशारा किया कि अपनी श्राप शक्ति का इस्तेमाल करते नहुष को सबक सिखा दो अगस्त्य ने ऐसा ही किया और नहुष को श्राप दे दिया जिसके चलते वह अजगर बनते धरती पर आ गिरा नतीजतन उसकी स्वर्ग की सत्ता खत्म हो गई. ऐसे बेहूदे रोचक किस्से कहानियों से पौराणिक साहित्य भरा पड़ा है जो आजकल भगवा गैंग की धरोहर है वर्ना तो जेन जी को उससे कोई लेना देना ही नहीं.
यह कहानी भी नाराज फूफाओ के लिए सबक है कि अपनी फूफागिरी इस हद तक मत दिखाओ कि ससुराल में कोई एक गिलास पानी के लिए भी न पूछे फिर विदाई के कपड़ों और रिटर्न गिफ्ट बगैरह की तो बात ही और है.
क्यों याद आई फूफागिरी
मुमकिन है नया कुछ कहने के चक्कर में नरेंद्र मोदी ने यों ही नाराज फूफा का जिक्र कर दिया हो जिससे इसी बहाने ही सही भाषण की चर्चा तो हो. जो हुई भी लेकिन उसका मजाक ज्यादा बना. लेकिन इस बहाने मोदी ने अपनी संस्कृति और संस्कारो का नवीनीकरण करा लिया. मीडिया में फूफा और फूफागिरी की चर्चा उसी तरह हुई जैसे एक वक्त में पौराणिक किस्से कहानियों की अमर चित्रकथाए और चंदा मामा नाम की मैगजीन में हुआ करती थी इन्हें पढ़ पढ़ कर ही `जेन पी` यानी मोदी बाली पीढ़ी बड़ी हुई है.
लेकिन अब ढोंग पाखंड फ़ैलाने बाली इन और ऐसी पत्रिकाओं के कहीं अते पते नहीं. आज के बच्चे यानी जेन अल्फ़ा चम्पक पत्रिका पढ़ती है जिसमे तर्क होते हैं, ज्ञान होता है, स्वस्थ मनोरंजन होता है , मानसिक विकास होता है जिससे जेन पी चिढ़ती है
.इसके बाद भी कमान बाबा बागेश्वर और अनिरुद्धाचार्य जैसे कथा वाचक संभाले हुए हैं जिन्हें मोदी फूफा नहीं बल्कि अपना छोटा भाई कहते हैं. ये बाबा भी कम पड़ने लगे और कमाई ज्यादा होती दिखी तो कुमार विश्वास जैसे कवि भी रामकथा सुनाने का धंधा करने लगे. मकसद वही मनुवाद थोपना है जिसे काकरोचों और जेन जी ने वेंटिलेटर पर लिटा रखा है. Wedding Foofa





