Hanuman Ansh Movie: भारतीय सिनेमा में धर्म, आस्था और अंधविश्वास का धंधा बहुत पुराना और मुनाफा कमाने का बेहद आसान जरिया रहा है. जबजब निर्देशकों और राइटर्स के पास ठोस कंटैंट, मजबूत पटकथा और तर्कसंगत सिनेमाई सोच का अकाल पड़ता है, वे झट से चमत्कारों और ढोंगपाखंड की बैसाखी थाम लेते हैं. दर्शकों की धार्मिक भावनाओं से जेबें भरना और समाज को पीछे धकेलना तय पैटर्न शुरू से रहा है. यह पंडेपुजारी हमेशा से करते रहे हैं, सिनेमा ने भी इसे खूब भुनाया.

विशाल चतुर्वेदी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘हनुमान अंश’ इसी घिसेपिटे और दान की लूट की अगली कड़ी है. यह फिल्म नीब करोली बाबा के जीवन से प्रेरित होने का दावा करती है लेकिन सच तो यह है कि यह सिनेमा के नाम पर गौडमैन कल्चर, अंधभक्ति और कुतर्की दावों की ब्रैंडिंग करने का जरिया बन कर रह जाती है. कहानी की शुरुआत 1964 से होती है, जहां भोसले (चंदन आनंद) नाम का एक बूढ़ा व्यक्ति, जो भगत सिंह के संगठन एचएसआरए का एक पुराना नास्तिक क्रांतिकारी होता है, अपने पोते को नीब करोली बाबा (शोभिना सत्या) की महिमा सुनाता है. वह 1942 के फ्लैशबैक में जाता है जहां वह बाबा से पहली मुलाकात का जिक्र करता है और समझाता है कि वह आस्तिक कैसे बना.

इस के बाद कहानी साल 1905 के फ्लैशबैक में 12 साल के बालक लक्ष्मी नारायण पर जाती है. जो आगे जा कर नीब करोली बाबा बनता है. लक्ष्मी अपनी मां की अचानक हुई मौत से दुखी हो कर भगवान की खोज में और अपनी मृत मां को वापस पाने की बेतुकी जिद ले कर घर छोड़ देता है.

घरबार छोड़ने के बाद लक्ष्मी जगहजगह भटकता है और अचानक उस के भीतर चमत्कारिक शक्तियां जागने लगती हैं. वह जानवरों और पक्षियों से बातें करता है, चमत्कार से लड्डू ले आता है. लोग लक्ष्मी की साधना और चमत्कारों से हैरान होने लगते हैं. लक्ष्मी बड़ा होता है. नीब करोली गांव पहुंचता है, जहां बीमार लोगों को चुटकी बजाते ठीक कर देना, दूसरों का मन पढ़ लेना, अंगरेजों की पूरी की पूरी ट्रेन को अपनी शक्ति से रोक देना, अपने जीभ पर बीज रख कर पौधा उगा देना और कढ़ीचावल में चमत्कार दिखाना दिखाया जाता है. इन चमत्कारों से वह आसपास के इलाके में चर्चित हो जाता है और लोग उसे हनुमान का अवतार मानने लगते हैं. इस के बाद वह वहां से कैंची धाम के लिए निकल जाता है. फिल्म नीब करोली बाबा के बचपन और जवानी को पोट्रे करती है. संभव है कि इस अगला पार्ट बने, जिस में कहानी आगे बढ़ेगी.

पैसों की कमी फिल्म में दिखती है. सिनेमेटोग्राफी बेहद साधारण है. हालांकि इस तरह की फिल्मों में यह चीजें काम कर जाती हैं जो इसे आम लोगों के लिए साधारण और सरल बनाती है. मगर सवाल यह कि फिल्म असल जीवन पर आधारित है मगर इस में कितनी सच्चाई है?

जाहिर सी बात है कि फिल्मकार इस बुनियादी बात को पूरी तरह भूल गए कि जिस दौर की यह कहानी दिखाई जा रही है, उस समय न तो सीसीटीवी कैमरे थे, न मोबाइल फोन थे और न ही वैज्ञानिक जांच का कोई सिस्टम था. उस दौर में अफवाहें, सुनीसुनाई बातें और अंधविश्वास ही हवा की तरह फैलते थे और लोग बिना सोचेसमझे किसी को भी भगवान मान लेते थे. लगता है जैसे ऐसा मान लिया गया है कि ऐसा हुआ ही होगा ठीक वैसे ही जैसे कभी साईं बाबा के मामले में मान लिया गया था.

‘हनुमान अंश’ उन्हीं 80 साल पुरानी मनगढ़ंत अफवाहों को आज के 21वीं सदी के दर्शकों के दिमाग में ठूंसने का काम करती है. हमारे देश में फिल्मों के जरिए ‘भगवान’ गढ़ने का खेल दशकों से चल रहा है. कथित गौडमैन को परदे पर मसीहा बना कर पेश कर आश्रमों का धंधा चमकाने व अंधभक्तों की नई फौज खड़ी करने का काम होता रहा है. बीते सालों में खास से ले कर आम लोगों में कैंची धाम आश्रम जाने का चलन भी खूब दिखने को मिला है.

फिल्म की रफ्तार सुस्त है. स्क्रीनप्ले में कोई कसावट नहीं है. दृश्य बिना किसी तुकताल के एक के बाद एक आते रहते हैं. ऐसा लगता है कि निर्देशक चमत्कार दिखा कर दर्शकों को हैरान करना चाहता है. बीचबीच में फिल्म नाटक मंचक जैसी लगती है.

महाराज जी बने शोभिना ने सपाट अभिनय किया है. हालांकि सैल्फ गौडमैन में यह काम कर गया है. चंदन आनंद, अनिल रस्तोगी और पूर्णिमा तिवारी जैसे कलाकारों को बेहद बेतुके और ढीले रोल्स दिए गए हैं. वे सिर्फ डायलौग बोलते हैं, लेकिन उन के किरदारों में कोई जान नजर नहीं आती.

वहीं, जब फिल्म की कहानी, दृश्य और निर्देशन कमजोर होते तो मेकर्स लाउड धार्मिक भजनों और बैकग्राउंड स्कोर का सहारा लेते दिखते हैं. पूरी फिल्म में 2 भजन बैकग्राउंड में सुनाई देते हैं. दोनों सौफ्ट हैं. कुल मिला कर अगर आप सिनेमा में तर्क, संवेदनशीलता और गुणवत्ता की उम्मीद रख कर देखने जा रहे हैं, तो इस फिल्म से दूर रहने में ही आप की भलाई है. Hanuman Ansh Movie

 

 

 

 

 

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