Madras High Court Verdict: एक कपल की शादी तमिलनाडु के शिवगंगा में 10 सितंबर 1992 को हुई थी. पति-पत्नी के 4 बच्चे हैं. पति रोजगार के लिए शिवगंगा से मुंबई चला गया. इस वक़्त पति 67 साल का हो चुका है और दोनों पिछले 16 साल से अलग रह रहे हैं. 2014 में पति ने शिवगंगा फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दी और उसने आरोप लगाया कि पत्नी का किसी और आदमी से अवैध संबंध है.
फैमिली कोर्ट ने तलाक खारिज कर दिया. जज ने कहा कि “पति खुद अपनी गलती का फायदा उठा रहा है. पति शिवगंगा से अपनी पत्नी को साथ लिए बिना मुंबई चला गया, यह पति की गलती है. जज ने कहा कि सेक्स की इच्छा पर काबू पाना “highly impracticable” है इसलिए पति का फर्ज था कि वो पत्नी को जहां जाए साथ ले जाए और उसे संतुष्ट करे. पति अपनी पत्नी को अपने साथ नहीं ले गया और उसे अकेला छोड़ गया तो पत्नी अगर संबंध बना ले तो पति शिकायत नहीं कर सकता”
फैमिली कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ पति मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा. जस्टिस GR स्वामीनाथन और जस्टिस MD सुमति की बेंच ने 19 अगस्त को फैसला दिया. हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के इस लॉजिक को लताड़ते हुए कहा- “पहली बात तो यह कि पति का परदेश जाना अपने आप में कोई अपराध नहीं है और दूसरी बात यह कि पत्नी कुत्ता नहीं है. वोडाफोन ऐड में छोटा सा पग डॉग बच्ची के पीछे-पीछे भागता है और इस एड की टैग लाइन होती है कि वेयरएवर यू गो योर नेटवर्क फ़ॉलो. भारतीय समाज ने पत्नी को वही पग डॉग बना दिया है. पति का ट्रांसफर हुआ तो पत्नी को नौकरी छोड़ कर उसके पीछे पीछे भागना चाहिए, पति गांव गया तो पत्नी को पीछे पीछे गांव जाना चाहिए. पति अमेरिका गया तो पत्नी को अमेरिका जाना चाहिए. यह कैसी मानसिकता है? पत्नी की भी अपनी नौकरी हो सकती है. अपना जीवन हो सकता है. उसे हर बार सूटकेस की तरह साथ ले जाना संभव नहीं है”
हाईकोर्ट ने पति के व्यभिचार वाले आरोप को खारिज कर दिया क्योंकि जिस आदमी के साथ अवैध संबंध का आरोप था, उसे केस में पार्टी ही नहीं बनाया गया था लेकिन 16 साल से अलग रहना, कोई चिट्ठी तक न लिखना, हाईकोर्ट ने इसे शादी का irretrievably breakdown और क्रूरता का आधार मानते हुए तलाक की डिक्री कर दी लेकिन शर्त रखी गई कि पति को 7 लाख रुपये गुजारा भत्ता के रूप में पत्नी को देना होगा, पैसा जमा होने पर ही तलाक प्रभावी होगा.
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद ही समझ आता है कि फैमिली कोर्ट का लॉजिक कितना खतरनाक था. फैमिली कोर्ट के फैसले का मतलब यह था कि औरत सेक्स कंट्रोल नहीं कर सकती इसलिए उसे हमेशा पति के साथ रहना चाहिए. इस फैसले में फैमिली कोर्ट ने औरत को सिर्फ वासना की मशीन समझा. जहां पति जाये औरत को भी उसके पीछे पीछे चले जाना चाहिए वरना वह व्यभिचार ही करेगी. यह सोच औरत की वफादारी को उसके शरीर से जोड़ती है, उसके इमोशन्स से नहीं. साथ ही पैट्रिआर्कल मानसिकता मर्दों को विक्टिम समझ लेता है कि उसकी पत्नी उसके साथ नहीं जाएगी तो उसके पीठ पीछे वह किसी और मर्द से संबंध बनाएगी जिससे उसका कंट्रोल खत्म हो जाएगा. हाईकोर्ट ने इस विक्टिम ब्लेमिंग को तोड़ दिया.
अगर आज पत्नी सोल्जर है, पायलट है, कलेक्टर है, तो क्या पति उसका पग बन कर पीछे-पीछे जाएगा? नहीं, तो फिर औरत से ही यह उम्मीद क्यों? शादी दो बराबर लोगों का समझौता है, मालिक और कुत्ते का रिश्ता नहीं. शादी में साथ रहना जरूरी है लेकिन साथ रहने के लिए एक की जिंदगी कुर्बान करना जरूरी नहीं. औरत का भी अपना करियर, अपना शहर, अपना स्पेस होता है. उसे वोडाफोन के नेटवर्क की तरह हर जगह घसीटने की चीज समझना गलत है. Madras High Court Verdict





