Women’s Safety: मुफ़्ती ने कुरान का हवाला देते हुए कहा कि “औरतों को घर में बंद रखना चाहिए, खुला छोड़ोगे तो उसे कई लोग छुएंगे” अगर कुरान में यही लिखा है तो यही सबसे बड़ा सबूत है कि 7वीं सदी की किताब 21वीं सदी में नहीं चल सकती. जो किताब औरत को घर में बंद करने को सुरक्षा कहती है, वह किताब असल में मर्दों की अय्याशी का दस्तावेज ही है. सुरक्षा का मतलब औरत को बंद करना नहीं बल्कि मर्द को यह सिखाना है कि औरतों को इंसान समझें. मुफ़्ती ने कहा कि “महिलाएं सोने के गहनों जैसी हैं, जिन्हें डिब्बे में सुरक्षित रखा जाता है, सड़क पर छोड़ दो तो हर कोई छू लेगा और कीमत खत्म हो जाएगी”

यह मुफ़्ती के बयान की सबसे घटिया और सबसे खतरनाक लाइन है. आपने औरत को इंसान से चीज बना दिया, गहना बना दिया. गहना कितना भी कीमती हो वह एक निर्जीव चीज है उसकी कीमत अमीरों की लग्जरी के आधार पर तय होती है. जबकि औरत एक इंसान है और इंसान की कीमत तय करने की मानसिकता छठी सदी में गुलामों की खरीद फरोख्त वाली सोच का मॉडर्न तरीका है. जैसे गहना खरीदा और बेचा जाता है वैसे ही इस्लाम के दौर में औरत खरीदी और बेची जाती थी. आप कह रहे हैं कि सड़क पर आने से औरत को हर कोई छू लेगा. छूने वाला कौन है? मर्द ही न? तो प्रॉब्लम औरत के सड़क पर आने में नहीं, मर्द के छूने की सोच में है. तो डिब्बे में बंद तो मर्द को रखना चाहिए. आप मर्द को सुधारने की बजाय औरत को डिब्बे में बंद करने की बात करते हैं. मुफ़्ती ने कहा की चक्की खुले में रखी जाती है तो कोई भी उस पर पैर रख देता है मतलब जो औरत बाहर निकलेगी उस पर पैर रखना जायज है? यही तो असली रेप कल्चर है जो मजहब की किताबों से निकलती है.

असल में यह मुफ़्ती खुद तो इक्कीसवीं सदी की लग्जरी में जी रहा है और औरतों को छठी सदी में कैद करना चाहता है. छठी सदी की औरत की अपनी कोई मर्जी नहीं थी, वह सिर्फ मर्द की गुलाम थी और आज का क़ानून इसी सोच को जूता मारता है. औरत गहना नहीं है बल्कि आज तो वह गहना बनाने वाली इंडस्ट्री की मालिक है. वह डिब्बे में रखने की चीज नहीं बल्कि आज वह डिब्बा बनाने वाली इंजीनियर है.

कोई भी किताब कहे कि औरत को पीटो (कुरान 4:34) जो किताब कहे कि औरत की गवाही आधी है (2:282) जो किताब कहे कि बदचलन औरतों को कमरों में तब तक बंद रखो जब तक की उसकी मौत न हो जाये (4-15) ऐसी आसमानी किताबों को जमींदोज कर देने में कोई हर्ज नहीं. 21वीं सदी कानून, विज्ञान और संविधान से चलता है, किसी आसमानी किताब से नहीं. आज हमें बच्चियों को स्कूल भेजना है, उन्हें पायलट, डॉक्टर, वैज्ञानिक बनाना है, उन्हें डिब्बे में नहीं, कॉकपिट में बैठाना है. ऐसे दौर में जिस किताब को पढ़ कर आदमी औरत को डिब्बे में बंद करने को सम्मान समझे, उस किताब को ही डिब्बे बंद रखना जरुरी है.

संविधान का आर्टिकल 14, 15 और 19 कहता है कि लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होगा और हर नागरिक को कहीं भी आने-जाने, रहने और रोजगार करने का अधिकार है. सुप्रीम कोर्ट 2020 में ही कह चुका है कि महिलाओं को आर्मी में स्थायी कमीशन मिलेगा, वो भी फ्रंट पर. जिस देश में महिला फाइटर जेट उड़ा रही है, एवरेस्ट चढ़ रही है, ISRO में रॉकेट बना रही है उसे घर में बंद करने की बात कहना संविधान के खिलाफ अपराध है. 21वीं सदी में महिला घर में नहीं, घर महिला के दम पर चलता है.

मुफ़्ती की अपनी अभिव्यक्ति है लेकिन यह देश संविधान से चलता है और संविधान की नजर में औरत और मर्द दोनों बराबर हैं. लोकतान्त्रिक देश में अभिव्यक्ति के नाम पर आधी आबादी को डिब्बे में बंद कर देने की मानसिकता के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए. यह अभिव्यक्ति नहीं धमकी है और ऐसे अपराधी मानसिकता के लोगों की जगह जेल होनी चाहिए. समाज की असली तरक्की औरत को कैद करने में नहीं, मर्द की सोच को आजाद करने से होगी.

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