कोई भी देश स्कूल, कॉलेज, बांध, हाइवेज और हॉस्पिटल से बनता है, मंदिर मस्जिद से सिर्फ भक्त पैदा होते हैं. यह बात जवाहर लाल नेहरू अपने पहले कार्यकाल में ही समझ गये थे लेकिन बीजेपी की 12 साल की उपलब्धियों को देखें तो भव्य राममंदिर और हर जिले में बीजेपी के आलीशान दफ्तर ही नजर आएंगे. बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स के उदघाटन किये जाते हैं और उद्घाटन के बाद ही हाइवेज, सड़कें धंस जाती हैं, पुल टूट जाते हैं और कई बार बिना योजना और ख़राब इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से इमारते जर्जर ख़डी रह जाती हैं. इसके बावजूद बीजेपी बड़ी बेशर्मी के साथ नेहरू पर सवाल उठाती है कि नेहरू ने क्या किया?
जवाहरलाल नेहरू ने क्या किया इसका छोटा सा उदाहरण कोसी बैराज है. अगर यह बैराज न होता तो 26 अगस्त को जिस बाढ़ से नेपाल में तबाही हुई उस बाढ़ में बिहार के कई जिले पूरी तरह तबाह हो जाते. 26 अगस्त को नेपाल के ऊपरी पहाड़ी इलाकों में बहुत तेज बारिश हुई और फ्लैश फ्लड यानी अचानक बाढ़ आ गई. पहाड़ों में जब थोड़े समय में बहुत ज्यादा पानी गिरता है तो पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है और नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है. यही पानी आगे चलकर कोसी नदी और कोसी बराज की तरफ पहुंचता है.
26 अगस्त को कोसी बराज में करीब 1,31,340 क्यूसेक पानी पहुंचा. बहाव 3.40 लाख क्यूसेक तक पहुंच गया था. क्यूसेक का मतलब है हर सेकंड लगभग 28 लीटर पानी. 3.40 लाख क्यूसेक का मतलब है कि नदी में हर सेकंड लगभग 96 करोड़ लीटर पानी बह रहा था. कोसी का पानी केवल बिहार में हुई बारिश से नहीं बढ़ता. नेपाल के पहाड़ी और ऊपरी इलाकों में बारिश होती है तो वहां से पानी कई नदियों के जरिए तेजी से नीचे आता है और नेपाल में हुई भारी बारिश का असर कुछ समय बाद ही बिहार के कोसी इलाके में दिखाई देता है.
इसी समस्या को हल करने के लिए भारत और नेपाल के बीच 1954 में कोसी समझौता हुआ था और इसके बाद भीमनगर में कोसी परियोजना शुरू की गई. 1955 में कोसी बराज का निर्माण शुरू हुआ और 1963 में इसका उद्घाटन हुआ. भीमनगर बराज नेपाल से आने वाले कोसी के पानी को कंट्रोल करता है. इसमें कई गेट हैं. जब नदी में पानी बढ़ता है तो इन गेटों के जरिए पानी के बहाव को कंट्रोल कर पानी को नीचे की ओर छोड़ा जाता है. इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत तटबंध और नहरों की व्यवस्था भी बनाई गई, जिससे नदी के पानी को एक निश्चित रास्ते में रखने और सिंचाई में इस्तेमाल करने की व्यवस्था बनाई गई.
अगर 1955 की कोसी परियोजना नहीं बनी होती तो आज सुपौल, सहरसा, मधेपुरा और दरभंगा बिल्कुल काठमांडू की तरह बह रहे होते. जवाहर लाल नेहरू ने अपने पहले कार्यकाल में ही कोसी नियंत्रण परियोजना बना कर बिहार में बाढ़ और सिंचाई की समस्या से निपटने के लिए बहुत बड़ा ढांचा तैयार किया. नेहरू ने आजाद भारत में बड़े बड़े मंदिर बनाने की जगह बांध, स्कूल, यूनिवर्सिटीज और हॉस्पिटल बनाना जरुरी समझा. आज का भारत जवाहर लाल नेहरू के इसी विजन पर टिका है और नेहरू के बनाये इंफ्रास्ट्रक्चरल ढांचे की बुनियाद पर खड़ा है. नेहरू के बनाये बड़े बांध, सिंचाई परियोजनाएं और बिजली परियोजनाएं देश के आर्थिक विकास की आधारशिला बनी.
नेहरू इंजीनियर नहीं थे लेकिन उन्हें पता था कि आजाद भारत को अगर बाढ़, भूख और गरीबी से बचाना है तो मंदिर मस्जिद नहीं बल्कि ऐसे बड़े-बड़े स्ट्रक्चर चाहिए जिनका सीधा फायदा जनता को मिले और जो 100 साल टिकें. कोसी प्रोजेक्ट में सिर्फ बैराज नहीं बना, दोनों तरफ 100 किलोमीटर से ज्यादा तटबंध बने, नहरें बनीं, पूरा सिस्टम बना. 1955 में यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ और आज 62 साल बाद भी वही बैराज अपने 33 गेटों के जरिये 2.5 लाख क्यूसेक पानी को कंट्रोल करके बिहार को बचा रहा है. इस बैराज की उम्र 25 साल आंकी गई थी, आज 62 साल बाद भी यह पूरी मजबूती के साथ खड़ा है क्योंकि उसकी नींव में प्रचार नहीं, कमीशन नहीं बल्कि सिर्फ देश को मजबूत बनाने का विजन था.
वहीं आज की राष्ट्रवादी सरकार का विजन देखिए. आज हर हफ्ते उद्घाटन होता है. प्रधानमंत्री हाईवे का उद्घाटन करते हैं और अगले ही महीने वह हाईवे धंस जाता है. दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर हर बारिश में गड्ढे और बड़े हो जाते हैं. जम्मू का हाईवे 15 दिन में बैठ गया. बिहार में ही पिछले दो साल में 15 से ज्यादा पुल उद्घाटन से पहले या उद्घाटन के बाद टूट गए. भागलपुर में 1700 करोड़ का अगुवानी पुल हवा में ही दो बार गिर गया. आज ऐसा क्यों हो रहा है? क्योंकि अब प्रोजेक्ट वोट के लिए बनते हैं, 100 साल के लिए नहीं. नेहरू के जमाने में प्रोजेक्ट का टेंडर होता था तो पहले जवाबदेही तय होती थी. सरकार के इंजीनियर पूरे प्रोजेक्ट की क़्वालिटी देखते थे. आज टेंडर होता है तो विधायक देखते हैं कि किस ठेकेदार से कितना चंदा आएगा. बस यही फर्क है.
नेहरू ने एम्स दिल्ली बनाया तो वह 70 साल से दुनिया का सबसे बड़ा अस्पताल है. मोदी सरकार ने दरभंगा में एम्स का वादा किया और 2020 में उद्घाटन का बोर्ड लगा दिया. 2023 में फिर शिलान्यास कर दिया लेकिन आज 2026 में भी वहाँ सिर्फ गेट के अलावा कुछ नहीं है. जमीन में पानी भरा है और सरकार कह रही है एम्स अभी बन रहा है. कोसी बैराज 1955 से 1962 में 7 साल में बन कर तैयार हो गया था, वह भी नेपाल के साथ मिलकर, बिना सैटेलाइट, बिना JCB के और आज की बीजेपी सरकार दरभंगा एम्स के लिए 6 साल में एक दीवार नहीं बना पाई.
फर्क सोच का है. नेहरू आलोचना सहते थे, संसद में जवाब देते थे, CAG की रिपोर्ट पढ़ते थे. आज CAG रिपोर्ट आती है तो उसे ही दबा दिया जाता है. नेहरू ने कोसी बैराज बनाया तो इंजीनियरों को कहा कि गाद का भी हिसाब रखो इसीलिए आज भी इंजीनियर जानते हैं कि बैराज में कितना सिल्ट है. आज के प्रोजेक्ट सिर्फ प्रचार तक सिमित होते हैं. उदघाटन के बाद फोटो शूट होते हैं, बड़े बड़े होर्डिंग में प्रधानमंत्री की तस्वीर छपती है, अख़बारों में पहले पन्ने का विज्ञापन छपता है, टीवी चैनलों पर शोर मचाया जाता है, सारे मंत्री, पीएम का धन्यवाद देते हुए पोस्टर छपवाते हैं और बस हो गया प्रोजेक्ट पूरा.
नेपाल की बाढ़ इस बात का सबूत है कि अगर नेहरू न होते तो बिहार नेपाल की तरह हर साल बहता. कोसी बैराज सिर्फ लोहे और सीमेंट का स्ट्रक्चर नहीं है बल्कि यह ढांचा एक सेक्युलर और वैज्ञानिक सोच का भी प्रतीक भी है. नेहरू मानते थे कि आपदाये प्रकृति की नियति है इसे पूजा से नहीं बल्कि तकनीक से रोका जा सकता है. आज की सरकार जिसे हर समस्या का हल सिर्फ मंदिरबाजी में नजर आता है उसे नेहरू के बनाए बैराज से सीखना चाहिए कि देश फीता काटने से नहीं, फीता कसने से बनता है.





