Tribal Girl Students: महाराष्ट्र में बीजेपी की सरकार है और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस हैं. महाराष्ट्र सरकार आदिवासी छात्रों के लिए सरकारी हॉस्टल चलाती है. इन हॉस्टलों में दूरदराज के गरीब आदिवासी बच्चे पढ़ने आते हैं. 22 अगस्त को पुणे में छात्रों की गूंज कार्यक्रम हुआ. वहां राहुल गांधी आए. एक आदिवासी छात्रा ने मंच पर खड़े हो कर बताया कि हॉस्टल में 30 साल की उम्र के बाद रहने पर रोक है. छुट्टी से वापस आने पर प्रेग्नेंसी टेस्ट करवाना पड़ता है. खाना सड़ा मिलता है. कई बार कमरे में सांप निकलते हैं. हॉस्टल के बाथरूम में दरवाजा तक नहीं है. स्टूडेंट्स के यह आरोप बेहद संगीन हैं और इन्हीं समस्याओं को लेकर कई स्टूडेंट्स भूख हड़ताल पर बैठे हैं.
यह आदिवासी छात्र खैरात नहीं मांग रहे हैं. अपना अधिकार मांग रहे हैं. स्टूडेंट्स की मांग है कि 30 साल की गैर जरूरी उम्र सीमा हटनी चाहिए. अपमानजनक नियम हटने चाहिए. सुविधाएं ठीक होनी चाहिए और सबसे घटिया नियम महिलाओं का प्रेग्नेंसी टेस्ट वह तुरंत बंद होना चाहिए. राहुल गांधी ने प्रेगनेंसी टेस्ट वाले नियम को लेकर कहा कि यह नियम आदिवासी स्टूडेंट्स की गरिमा पर हमला है. यह उनको तब तक दोषी मानता है जब तक वो खुद को निर्दोष साबित न कर दें.
प्रेग्नेंसी टेस्ट का मामला नया नहीं है. दिसंबर 2025 में पुणे के जुन्नर के सरकारी आदिवासी गर्ल्स हॉस्टल में यही हुआ था. छुट्टी से लौटने पर सभी छात्राओं को यूरिन प्रेग्नेंसी टेस्ट कराने के लिए मजबूर किया गया था. नेगेटिव रिपोर्ट आने पर ही एंट्री दी गई. पेरेंट्स ने बताया कि उनको 150 से 200 रुपये की किट खुद खरीदनी पड़ती है. पैसा भी गरीब परिवार से लिया गया. सबसे पहले नागपुर के शीतकालीन अधिवेशन में विधायक संजय खोडके ने ये मुद्दा उठाया था लेकिन तब सरकार ने कहा था कि ऐसा कोई नियम नहीं है लेकिन पुणे के सिविल सर्जन डॉक्टर नागनाथ येमपल्ले ने खुद माना कि पहले ऐसा होता था. लड़कियां घर से लौटती थीं तो उनसे टेस्ट कराने को कहा जाता था.
विवाद बढ़ने के बाद राज्य महिला आयोग की चेयरपर्सन रूपाली चाकणकर ने वाकड हॉस्टल का औचक दौरा किया. लड़कियों ने बताया कि उनको यूपीटी टेस्ट देना पड़ा था. आयोग ने 23 सितंबर को सर्कुलर जारी कर कहा कि किसी भी छात्रा को यूपीटी टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.
इस पूरे मामले पर बीजेपी सरकार की घटिया सोच उजागर हुई है. असल में यह नारी विरोधी मानसिकता की उपज है. आदिवासी छात्रा सबसे गरीब और सबसे ज्यादा शोषित है. यह लड़कियां जंगल से निकल कर शहर पढ़ने आई है. सरकार को उनकी मदद करनी चाहिए. उनको किताब के साथ स्कालरशिप और सुरक्षा देनी चाहिए लेकिन बीजेपी सरकार उनका प्रेग्नेंसी टेस्ट करवा रही है? मतलब आदिवासी लड़की सिर्फ शरीर है और शक की चीज है. सोच यह है कि आदिवासी लड़की छुट्टी पर घर जाएगी तो जरूर कुछ गलत करके आएगी. यह मनुस्मृति की घटिया मानसिकता है और मर्दवादी सामंती सोच की उपज है. यह प्रेगनेंसी टेस्ट असल में आदिवासी लड़कियों के चरित्र का टेस्ट है.
बीजेपी की यही आदिवासी विरोधी मानसिकता हॉस्टल की हालत में भी दिखती है. खाना सड़ा है. कमरे में सांप घूमते हैं. बाथरूम में कुंडी नहीं है क्योंकि सरकार चाहती ही नहीं कि आदिवासी पढ़े. सरकार चाहती है कि वो अनपढ़ रहे. जंगल में रहे. मजदूरी करे या पहले की तरह किसी की जमीन पर काम करे.
उम्र सीमा की सीमा तय करना भी इसी मानसिकता का नतीजा है. 30 साल के बाद हॉस्टल में रहने पर रोक क्यों है? आदिवासी छात्र देर से पढ़ता है क्योंकि उसके गांव में स्कूल ही नहीं है. वो 10वीं 12वीं देर से करता है फिर शहर आता है और देर से ही प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है. एमपीएससी, यूपीएससी, नेट, सेट. इसमें 30 से 35 साल लग जाते हैं. अगर 30 साल में उसको हॉस्टल से निकाल खडेड़ दिया जाएगा तो वो कहां जाएगा? मुंबई पुणे में कमरा 10 हजार का है. कई आदिवासी बच्चों के पास तो 500 रुपये तक नहीं होते. यह जानबूझ कर किया जा रहा है ताकि आदिवासी बच्चे कलेक्टर, अफसर न बन सके और किसी अपर कास्ट की कुर्सी न छीन ले. जब आदिवासी स्टूडेंट्स सरकार के इन घटिया नियमों के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठे तो 10 दिन तक उससे कोई मिलने तक नहीं आया. राहुल गांधी को चिट्ठी लिखनी पड़ी तब सरकार की आँख खुली.
सरकार कहती है कि ऐसा कोई नियम नहीं है और आदिवासी विकास विभाग कहता है कि हमने ऐसा कोई जीआर नहीं निकाला तो फिर हॉस्टल के वार्डन ये टेस्ट क्यों करा रहे हैं? इसका मतलब सरकार का कंट्रोल ही नहीं है या सरकार झूठ बोल रही है. दोनों ही हालत में सरकार नाकाम है. अगर वार्डन अपनी मर्जी से टेस्ट करा रहा है तो उसको जेल में डालना चाहिए या उसे बर्खास्त करना चाहिए लेकिन आज तक एक भी वार्डन पर एफआईआर नहीं हुई. एक भी सस्पेंड नहीं हुआ. महिला आयोग ने सिर्फ कागज पर सर्कुलर निकाल कर मामले को रफा दफा करने की कोशिश की.
सच तो यही है कि बीजेपी सरकार को आदिवासी लड़कियों की इज्जत की कोई परवाह नहीं है. उसको सिर्फ वोट चाहिए. चुनाव में आदिवासी को हिंदू बना कर वोट ले लेंगे और बाद में उसी आदिवासी बेटी का प्रेग्नेंसी टेस्ट कराएंगे. यही मनुवादी, पितृसत्तात्मक और आदिवासी विरोधी बीजेपी सरकार की असली मानसिकता है. छात्र खैरात नहीं मांग रहे. अधिकार मांग रहे हैं और अधिकार देना सरकार की जिम्मेदारी है, दया नहीं. Tribal Girl Students





