Gen Alpha Protest: देश भर के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले जेन एल्फा बच्चे सिर्फ शिक्षकों और सुविधाओं की मांग नहीं कर रहे, बल्कि अपने भविष्य की गारंटी मांग रहे हैं. उनके हाथों में उठे सवालों की गूंज उन मांओं तक भी पहुंच रही है, जो वर्षों से घर की चारदीवारी में अपनी आवाज दबाकर जीती आई हैं. बच्चों का ‘क्यों’ अब मांओं के भीतर दबे सवालों को जगा रहा है. शिक्षा, बराबरी, सम्मान और अपने फैसले लेने की आजादी का सवाल, सामंती मानसिकता वाली सरकार को डराने लगा है और ‘स्कूल ठीक करो’ की लड़ाई धीरे-धीरे ‘समाज ठीक करो’ और मांओं की मुक्ति की लड़ाई में बदलती दिखाई दे रही है.

लखनऊ से मेरठ वाली आवाज उठी

लखनऊ में मोहान रोड स्थित जय प्रकाश नारायण सर्वोदय स्कूल की करीब 300 छात्राओं ने 17 अगस्त को स्कूल की चारदीवारी फांदी और सड़क पर ह्यूमन चेन बनाकर शहर का चक्का जाम कर दिया. तेज बारिश के बीच करीब तीन किलोमीटर पैदल चलकर इन छात्राओं ने दुबग्गा-कानपुर बाईपास पर वाहनों की आवाजाही रोक दी और मुख्यमंत्री आवास की ओर जाने की कोशिश की. उनकी मांग थी कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हमारे स्कूल में लेकर आओ और वहां की दुर्दशा दिखाओ. ऐसी ही आवाज 1857 में मंगल पांडेय ने उठाई थी. चाहे वहां मकसद कुछ और था.

यह कोई सामान्य छात्र आंदोलन नहीं था. यह उन बच्चों की आवाज थी, जिन्हें यह महसूस हो गया है कि अगर वे चुप रहे तो उनकी पढ़ाई, उनका भविष्य और उनके सपने भी उसी स्कूल की टूटी दीवारों, खाली कक्षाओं और गायब शिक्षकों के नीचे दब कर खत्म हो जाएंगे.

सड़क पर उतरी जेन एल्फा छात्राओं का कहना था कि उनके सरकारी स्कूल में 400 विद्यार्थियों के लिए सिर्फ 18 शिक्षक हैं. इनमें से चार हिंदी के शिक्षक हैं, जबकि गणित, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, केमिस्ट्री, फिजिक्स और अंग्रेजी के लिए कोई शिक्षक ही नहीं है. बोर्ड परीक्षाओं में मात्र छह महीने का समय बचा है, जब अभी तक टीचर ही नहीं आये, पढ़ाई ही शुरू नहीं हुई, प्रैक्टिकल ही नहीं हुए, तो हम पास कैसे होंगे?

छात्राओं को मनाने पहुंचे प्रमुख सचिव अनुराग यादव को छात्राओं ने स्कूल प्रशासन द्वारा खराब खाना परोसने, शौचालय की सफाई न होने, टीचरों और कर्मचारियों द्वारा भद्दे तरीके से छात्राओं से बात करने की भी शिकायतें कीं. यानी जिस स्कूल को बच्चों के भविष्य की सीढ़ी होना चाहिए था, वहां बच्चे ही सरकार को यह बता रहे थे कि सीढ़ी टूटी हुई है.

सड़क पर उतरे बच्चे, तो फाइलों से बाहर निकला स्कूल

लखनऊ की घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जिन समस्याओं को लंबे समय से प्रशासनिक फाइलों, निरीक्षण रिपोर्टों और सरकारी बैठकों में दबाया जा सकता था, उन्हें जेन एल्फा के बच्चों ने सड़क पर लाकर सार्वजनिक सवाल बना दिया. बच्चे सड़क पर उतरे तो शासन-प्रशासन सक्रिय हुआ. एसपी और प्रमुख सचिव को बच्चों से बात करने और मनाने के लिए भेजा गया. उसके बाद तुरंत शिक्षकों की नियुक्ति, भोजन की गुणवत्ता और स्कूल तक पहुंचने वाली सड़क जैसे मुद्दों पर प्रशासन को तत्काल कार्रवाई करनी पड़ी.

यही लोकतंत्र की असली ताकत है. जिस बच्चे की आवाज स्कूल की चारदीवारी में नहीं सुनी जाती, वही बच्चा जब उसी समस्या को सड़क पर लेकर आता है तो सत्ता को सुनना पड़ता है. मगर इस कहानी में एक और आवाज भी है, जो अभी खुल कर सुनाई नहीं दे रही है, वह है इन बच्चों की मांओं की आवाज.

बच्चे स्कूल में लड़ रहे हैं, मांएं घर में

जेन एल्फा के पीछे वो मांएं खड़ी हैं जो घर की चारदीवारी में लगभग उसी तरह की लड़ाइयां सामंती मानसिकता वाले समाज और परिवार से लड़ रही हैं.

सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा अक्सर ऐसे परिवार से आता है जहां मां सुबह से रात तक घर, बच्चों, पानी, खाना, सफाई, बुजुर्गों की देखभाल और दूसरे घरेलू कामों की जिम्मेदारियों में उलझी रहती है. उसके श्रम का कोई वेतन नहीं है, उसकी थकान का कोई हिसाब नहीं है और उसके फैसलों का कोई स्वतंत्र मूल्य नहीं है.

जेन एल्फा की अधिकांश मांएं थोड़ा-बहुत पढ़ी लिखी हैं, क्योंकि 30 साल पहले तक काफी सरकारी स्कूल गांव गांव में खुल चुके थे. उनसे उम्मीद भी की जाती है कि वह बच्चों को पढ़ाएं. वह पैरेंट-टीचर मीटिंग में भी जाएं. बच्चे की हर जरूरत का ख्याल रखें. वह रखती भी हैं. वह अपने बच्चों को पढ़ाती हैं. वह पैरेंट-टीचर मीटिंग में जाती हैं, जहां वह देखती हैं कि बच्चों के स्कूल की हालत और उनके घर की हालत में कोई ज्यादा फर्क नहीं है.

स्कूल में प्रिंसिपल की दहाड़ के आगे सब भीगी बिल्ली बने रहते हैं और घर में पति की दहाड़ के आगे घर की औरत भीगी बिल्ली बन जाती है. स्कूल में बच्चों की कोई सुनवाई नहीं, उनकी कोई कदर नहीं, उनका कोई भविष्य नहीं और घर में उसका भी वैसा ही हाल है. इसीलिए जेन एल्फा ने जब अपनी आवाज बुलंद की तो उनकी मांएं उनके पीछे आ खड़ी हुईं. बच्चों के सहारे अपनी मुक्ति की राह तैयार करने की आस में.

बच्चे का ‘क्यों’ मां के भीतर दबे सवाल को जगा रहा है

जिस मां को घर में बोलने की आजादी नहीं मिली या कम मिली, वह अपने बच्चे की आवाज में अपनी आवाज पहचानने की कोशिश कर रही है. जिस मां को हमेशा यह बताया गया कि उसका काम पति, परिवार और धर्म की मर्यादाओं के भीतर रहना है, वह अब अपने बच्चे के साथ स्कूल के गेट तक जा रही है और पूछ रही है – “मेरे बच्चे को पढ़ने का अधिकार क्यों नहीं? उसको वो सुविधाएं क्यों नहीं जिनका वह हकदार है?” कल वह अपने घर में भी यह सवाल अपने लिए पूछेगी, इस हिम्मत को बटोरने के लिए वह स्कूल के दरवाजे तक जा रही है.

जिस मां को कभी अपने अधिकारों के लिए अकेले सड़क पर उतरने का साहस नहीं मिला, वह अपने बेटे या बेटी के हाथ में मोबाइल कैमरा देखकर कह रही है – “बनाओ वीडियो, दिखाओ कि स्कूल में क्या हो रहा है.” इस बहाने वह दबी जुबान यह भी कह रही है कि बेटा घर का वीडियो भी बनाओ और दिखाओ कि यहां भी हालात वैसे ही हैं जैसे तुम्हारे स्कूल में हैं.

इसलिए ‘स्कूल ठीक करो’ अब केवल बच्चों का अभियान नहीं, यह उन माताओं के लिए भी अपनी आवाज खोजने का रास्ता बन रहा है जो वर्षों से पितृसत्ता, आर्थिक निर्भरता, धार्मिक दबाव और घरेलू असमानता के बीच घुट रही है.

स्कूल की बदहाली का सबसे बड़ा बोझ मां उठाती है

सरकारी स्कूल की बदहाली और महिलाओं की स्थिति को अलग-अलग समस्याएं समझना एक भूल है. क्योंकि –
जब स्कूल में शिक्षक नहीं होता तो सबसे ज्यादा चिंता किसे होती है?
मां को.
जब बच्चे को स्कूल में खाना खराब मिलता है तो सबसे पहले किसकी चिंता बढ़ती है?
मां की.
बिहार के नालंदा जिले के एक सरकारी स्कूल में मिड-डे मील में जब नमक कम होने की शिकायत पर बच्चों के खाने में सर्फ मिला दिया गया, और वही खाना खाने के बाद 35 बच्चे पेट दर्द, उल्टी और चक्कर की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंच गए, तब उनकी जान की चिंता में किसकी सांसें हलक में अटकी थीं?
उनकी मांओं की.
स्कूल में जब बेटी को गंदा शौचालय मिलता है, उसे सैनिटेरी पैड बदलने की जगह और खुद की सफाई के लिए पानी तक नहीं मिलता तो उसके घर लौटने के बाद उसकी परेशानी कौन सुनता है?
सिर्फ उसकी मां.
जब बेटी कहती है कि स्कूल में शिक्षक नहीं है, परीक्षा आने वाली है और उसे कुछ समझ नहीं आ रहा, वह रोने लगती है तब उसको सीने से लगा कर दिलासा कौन देता है? उसकी पढ़ाई में मदद कौन करता है?
उसकी मां.
इसलिए शिक्षा का संकट केवल शिक्षा का संकट नहीं है. यह एक मां के श्रम, चिंता और अदृश्य जिम्मेदारियों का भी संकट है.

गरीब मां के पास सरकारी स्कूल के अलावा विकल्प क्या है?

गरीब परिवार का पिता मजदूरी या नौकरी के लिए घर से बाहर होता है. कभी कभी तो शहर से बाहर होता है. ऐसे में बच्चे की पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी मां पर होती है. लेकिन जिस स्कूल पर वह निर्भर है, अगर वह स्कूल उसके बच्चों को शिक्षा नहीं दे रहा है, तो मां के पास विकल्प क्या है?
निजी स्कूल की फीस?
जो उसके बजट से बाहर है.
ट्यूशन?
वह भी महंगा है.
तो फिर गरीब मां अपने बच्चे को कहां ले जाए?
यही वह सवाल है जिसने सरकारी स्कूलों में शिक्षा पर एक बहुत बड़ी बहस की शुरुआत की है.

टूटी दीवारें सिर्फ स्कूल की नहीं, व्यवस्था की तस्वीर हैं

जो तस्वीरें और वीडियो आज सोशल मीडिया पर छाये हुए हैं, उन्हें देखने के बाद कोई शक नहीं है कि देश में शिक्षा के हालात बदतर हैं, करोड़ों का बजट सरकारी स्कूलों के रखरखाव के लिए आवंटित किया जाता है मगर उसमें से बड़ा हिस्सा प्रशासनिक अधिकारियों और स्कूल प्रबंधन के बीच बंट जाता है. क्योंकि अगर पैसा खर्च हो रहा होता तो उसका असर स्कूल की दीवारों, बच्चों की थाली, शौचालय, किताबों, बेंच और शिक्षकों की मौजूदगी में दिखाई देता.

सरकारी स्कूल किसी गरीब परिवार पर एहसान नहीं हैं. वे उन बच्चों का अधिकार हैं, जिसके माता-पिता अपने श्रम और अपनी छोटी-छोटी कमाई से इस देश की अर्थव्यवस्था को चलाते हैं. जो हर चीज पर टैक्स देते हैं. इसलिए सरकारी स्कूल की टूटी हुई दीवार सिर्फ एक इमारत की बदहाली नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है जो सबसे कमजोर तबके के बच्चों को बेहतर भविष्य देने का दावा करती है.

जब स्कूल में शिक्षक नहीं, तो भविष्य किसके भरोसे?

पूरे देश में 90 फ़ीसदी सरकारी स्कूल आज बदहाली का शिकार हैं. वहां बच्चों को शिक्षा नहीं दी जा रही है बल्कि शिक्षा के नाम पर बहुत बड़ा मजाक चल रहा है. कहीं बच्चे जमीन पर बैठकर पढ़ रहे हैं, कहीं खुले आसमान के नीचे बैठे हैं, कहीं एक या दो शिक्षकों के भरोसे पूरा स्कूल चल रहा है, कहीं शिक्षक ही नहीं हैं, कहीं स्कूलों में बच्चों से बाल मजदूरी करवाई जा रही है. कहीं उनसे भोंडे भोजपुरिया गानों पर डांस करवाया जा रहा है, कहीं शौचालय साफ़ करवाए जा रहे हैं, कहीं टीचरों और उनके दोस्तों के लिए छोटे छोटे बच्चे गैस सिलिंडरों के पास बैठ कर चाय बना रहे हैं, कहीं जर्जर छत बच्चों के सिर पर खतरा बनी हुई है, कहीं स्कूल को शराब का अड्डा बना दिया गया है तो कहीं मास्टरजी स्कूल में ताला लगा कर हफ़्तों हफ़्तों गायब रहते हैं. कॉकरोच जनता पार्टी के अभियान ‘स्कूल ठीक करो’ के शुरू होने के बाद से ये तमाम नज़ारे सोशल मीडिया पर वायरल हैं. स्थानीय पत्रकार और खुद छात्र-छात्राएं इन तस्वीरों को सामने ला रहे हैं.

शिक्षा की जगह धर्म का तमाशा

सरकारी स्कूलों के छात्र-छात्राएं और स्थानीय रिपोर्टर्स भाजपा-राज में ध्वस्त हो चुकी शिक्षा व्यवस्था की ऐसी ऐसी तस्वीरें सामने ला रहे हैं, जिन्हें देख कर अब तो अंधभक्तों और गोदी मीडिया को भी समझ में आने लगा है कि भाजपा के हिन्दू-मुस्लिम तमाशों, नागरिकता बचाओ के डर, कांवड़ यात्राओं के महिमामंडन, पुल और एक्सप्रेस-वे के भय उद्घाटनों की महाभव्य तस्वीरों के पीछे बच्चों के भविष्य को बिगाड़ने का कितना घिनौना खेल खेला जा रहा है. अब तो दबी जुबान गोदी मीडिया भी बोलने लगा है, तस्वीरें दिखाने लगा है. सरकारी भोंपू माने जाने वाले ‘आजतक’, ‘एबीपी’, ‘रिपब्लिक भारत’ और ‘ज़ी न्यूज़’ जैसे चैनलों पर भी अब स्कूलों की बदहाली की ख़बरें दिखाई जाने लगी हैं.

संघ और भाजपा की साजिश

दरअसल भाजपा और संघ चाहते ही नहीं कि गरीब का बच्चा पढ़ लिख कर उनके सामने नौकरी की मांग लेकर खड़ा हो जाए. वह तो देश के 70 प्रतिशत भविष्य को कांवड़ मजदूर बनाना चाहते हैं. उसे धर्म के कामों में झोंके रखना चाहते हैं. सवर्णों की गुलामी करवाना चाहते हैं, इसलिए सरकारी स्कूलों का यह हाल किया गया है. बीते 10 सालों में देश भर में करीब डेढ़ लाख सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं. ये सरकारी आंकड़ा है. गरीब और निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए सार्वजनिक शिक्षा का ढांचा लगातार सिकुड़ रहा है.

गौरतलब है कि सरकारी स्कूल केवल इमारत नहीं होते, वे उस बच्चे के लिए उम्मीद होते हैं जिसके माता-पिता महंगे निजी स्कूल की फीस नहीं भर सकते हैं. जब स्कूल कमजोर होता है, तो सबसे पहले गरीब का बच्चा प्रभावित होता है. वह शिक्षा से बाहर होता है, जल्दी मजदूरी की ओर जाता है और सामाजिक-आर्थिक सीढ़ी पर ऊपर चढ़ने का उसका रास्ता तंग हो जाता है.

बीते 12 सालों से मोदी सरकार को केवल मंदिर, पुल और एक्सप्रेस-वे ही दिखाई दे रहे हैं, और वह बड़े बड़े विज्ञापनों, पोस्टरों के जरिये जनता को भी वही दिखाने में लगी है, लेकिन स्कूलों की टूटी हुई बेंच, खाली शिक्षक पद, जर्जर दीवारें, टूटती-गिरती छतें सरकार को नहीं दिखतीं. इसलिए नहीं दिखतीं क्योंकि उस ओर ध्यान ही नहीं है. गरीब को शिक्षित करना लक्ष्य ही नहीं है क्योंकि पढ़ा-लिखा, जागरूक और अपने अधिकारों को समझने वाला नागरिक सरकार से नौकरी, स्वास्थ्य, शिक्षा, सम्मान और जवाबदेही मांगेगा. वह केवल नारों और धार्मिक भावनाओं से संतुष्ट नहीं होगा. इसलिए सरकारी स्कूलों को धीरे धीरे ख़त्म करने की एक मुहिम चलाई जा रही है. ताकि गरीब को गुलाम बना कर रखा जा सके.

सामंती मानसिकता का पहला नियम—सवाल मत पूछो

सामंती, धार्मिक और पितृवादी मानसिकता का एक बड़ा आधार यही है कि समाज में हर व्यक्ति की जगह पहले से तय कर दी जाए.
पुरुष आदेश देगा.
महिला पालन करेगी.
बड़ा छोटों को डांटेगा.
गरीब अमीर के सामने झुकेगा.
बच्चा शिक्षक से सवाल नहीं करेगा. उसे गुरु को गोविंद से ऊपर रखने की सीख दी जाएगी. ताकि स्वर्ण जाति का गुरु जो आदेश दे, विद्यार्थी बिना कोई सवाल किये उसका पालन करे.
नागरिक अधिकारी से जवाब नहीं मांगेगा.
और अगर कोई सवाल पूछे तो उसे ‘बदतमीज’, ‘अराजक’ या ‘राजनीति करने वाला’ बता दिया जाएगा.

लेकिन जेन एल्फा इस व्यवस्था के लिए असुविधाजनक पीढ़ी है.
वह पूछती है – “क्यों?”
क्यों शिक्षक नहीं है?
क्यों शौचालय गंदा है?
क्यों पानी नहीं है?
क्यों खाना खराब है?
क्यों हमें जमीन पर बैठना पड़ता है?
क्यों दूसरे स्कूल में सुविधाएं हैं और हमारे स्कूल में नहीं?

और यही ‘क्यों’ सामंती मानसिकता के लिए सबसे असुविधाजनक शब्द है. क्योंकि जिस बच्चे को सवाल पूछने की आदत पड़ जाती है, वह बड़ा होकर नौकरी, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी, कानून और शासन से भी सवाल पूछेगा.

बेटी की पढ़ाई में मां अपने अधूरे सपने देखती है

जेन एल्फा की बेटियों की शिक्षा का सवाल उनकी माताओं के जीवन से सीधे जुड़ा है. मां भी पूछेगी – मेरी बेटी को बराबरी क्यों नहीं? जिस मां ने स्वयं शिक्षा अधूरी छोड़ी हो, जिसने कम उम्र में विवाह देखा हो, जिसने आर्थिक निर्भरता झेली हो, जिसने घरेलू फैसलों में अपनी आवाज कमजोर पाई हो, वह जब अपनी बेटी को किताब लेकर स्कूल जाते देखती है तो उसके भीतर अपने अधूरे जीवन की भी एक उम्मीद जन्म लेती है. वह चाहती है कि बेटी उससे आगे जाए. बेटी नौकरी करे. अपने पैरों पर खड़ी हो. अपना पैसा कमाए. किसी के दबाव में न रहे. अपने जीवन का निर्णय स्वयं ले.

और इसलिए जब बेटी स्कूल से लौटकर कहती है कि “मां, हमारे स्कूल में शिक्षक ही नहीं हैं”, तो यह केवल एक बच्ची की शिकायत नहीं रहती, यह उस मां के अपने अधूरे सपनों पर चोट होती है.

जब बेटी कहती है कि स्कूल का शौचालय गंदा है, तो मां को अपनी बेटी की सुरक्षा और गरिमा की चिंता होती है. जब बेटी कहती है कि उसे परीक्षा की तैयारी नहीं हुई, तो मां को लगता है कि शायद उसकी बेटी भी उसी सामाजिक सीढ़ी के नीचे खड़ी रह जाएगी जिस पर वह स्वयं जीवन भर नहीं चढ़ पायी. इसलिए जेन-अल्फा की लड़ाई में उनकी मांओं की मुक्ति की संभावना भी छिपी हुई है.

घरेलू महिला से नागरिक बनने की यात्रा

कल्पना कीजिए, किसी गांव की एक मां अपने बच्चे के साथ स्कूल जाती है. वह देखती है कि शौचालय में पानी नहीं है. वह देखती है कि पंखा नहीं चल रहा. वह देखती है कि शिक्षक नहीं आता है. वह देखती है कि मिड-डे मील की गुणवत्ता खराब है. पहले वह शायद प्रधानाचार्य से शिकायत करती है. फिर किसी अधिकारी को आवेदन देती है. फिर इंतजार करती है और अंत में अपना मोबाइल फ़ोन निकाल कर व्यवस्था की पोल खोल देती है.
वह कह सकती है –
“यह मेरे बच्चे का स्कूल है. यह जनता के पैसे से चलता है. बताइए, यहां ये सुविधाएं क्यों नहीं हैं?”
यही वह क्षण है जहां एक घरेलू महिला नागरिक में बदलती है. वह केवल किसी की पत्नी या मां नहीं रहती.वह करदाता के पैसे से चलने वाली सार्वजनिक व्यवस्था की हिस्सेदार नागरिक बन जाती है. यह हिम्मत आते ही वह घर में भी सीना तान कर बात कर सकती है. और यही वह बदलाव है जिससे सामंती मानसिकता सबसे ज्यादा डरती है.

जेन एल्फा के पीछे उनकी मांएं भी खड़ी हैं

जेन जी और जेन एल्फा की आवाज को उनकी मांओं का समर्थन लगातार मिल रहा है. वो औरतें जो सदियों से चुप रहीं, जिन्होंने अपने हिस्से की इच्छाओं को परिवार की जरूरतों के पीछे रख दिया, जिन्होंने बच्चों की फीस से लेकर घर के राशन तक हर जिम्मेदारी उठाई, लेकिन अपने हक के लिए कभी नहीं बोली.
वह मां जो पति के गुस्से के डर से चुप रही.
वह मां जिसे परिवार ने कहा कि ज्यादा सवाल मत पूछो.
वह मां जिसके जिम्मे सारे व्रत-त्योहार कर दिए गए. अमुक व्रत पति के लिए करो, अमुक व्रत बेटे के लिए करो, मगर खुद उसके लिए कोई व्रत नहीं, कोई दूसरा भी उसके लिए कोई व्रत नहीं रखता. मतलब वही सबके लिए करे, उसके लिए कोई कुछ न करे.
वह मां जिसे धार्मिक और सामाजिक मर्यादाओं में जकड़ रखा गया.
वह मां जिसे बताया गया कि बच्चों की परवरिश ही उसका सबसे बड़ा धर्म है, लेकिन बच्चों के भविष्य को प्रभावित करने वाले फैसलों में उसकी राय जरूरी नहीं.
वह मां अब अपने बच्चे से सीख रही है कि सवाल पूछना अपराध नहीं है.

बच्चा स्कूल से पूछ रहा है – “शिक्षक कहां हैं?”
मां घर में पूछ रही है – “घर के फैसलों में मेरी आवाज कहां है?”
बच्चा पूछ रहा है – “हमारे स्कूल में पानी क्यों नहीं है?”
मां पूछ रही है – “मेरे घर में खाना-पानी, पैसा और बाकी सारे फैसले दूसरों के हाथ में क्यों हैं?”
बच्चा पूछ रहा है – “हमारे साथ बराबरी क्यों नहीं?”
मां भी पहली बार पूछ रही है – “मेरे साथ बराबरी क्यों नहीं?”
यहीं जेन एल्फा की कहानी महिलाओं की मुक्ति की कहानी से जुड़ती है.

दिल्ली ने दिखाया – सरकारी स्कूल बदले जा सकते हैं

उल्लेखनीय है कि सरकारी स्कूलों को दुरुस्त करने का काम सबसे पहले दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार ने 2015 में शुरू किया था. केजरीवाल सरकार के समय में दिल्ली के अधिकांश सरकारी स्कूलों की दशा में काफी सुधार हुआ था. सरकारी स्कूलों के कायाकल्प को राजनीतिक प्राथमिकता बनाने में तत्कालीन शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया की तारीफ की जानी चाहिए जिनके नेतृत्व में केवल भवनों की मरम्मत का कार्यक्रम नहीं, बल्कि स्कूल की इमारत, शिक्षक, प्रधानाचार्य, पाठ्यक्रम, अभिभावक, तकनीक और बच्चों के मानसिक-सामाजिक विकास, सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश की गई थी. दिल्ली सरकार ने शिक्षा पर असाधारण रूप से बड़ा बजटीय हिस्सा रखने की नीति अपनाई थी और कुल बजट का लगभग 25% शिक्षा पर आवंटित किया था. संदेश यह था कि सरकारी स्कूलों को केवल कल्याणकारी योजना नहीं, बल्कि सरकार के मुख्य विकास एजेंडे का हिस्सा माना जाए.

मगर गरीब को अशिक्षित और बेरोजगार बनाये रखने के उद्देश्य पर चल रही भाजपा और संघ को यह बर्दाश्त नहीं हुआ और समूची आम आदमी पार्टी को मटियामेट करने के लिए केंद्र ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी. एलजी से लेकर ईडी, सीबीआई, एनआईए, आयकर, विजिलेंस सभी को आम आदमी पार्टी के नेताओं की पकड़धकड़ में लगा दिया गया और उसमें वह सफल भी हो गए. आम आदमी पार्टी के सभी बड़े नेता जेल चले गए और सालों बंद रहे. इस बीच चुनाव हुए और दिल्ली की सत्ता पर भाजपा कायम हो गई. और अब जिन स्कूलों का कायाकल्प केजरीवाल सरकार में हुआ था वे फिर बदहाली का शिकार हो गए हैं.

पेपर लीक से लेकर खाली कक्षाओं तक संकट एक ही है

पिछले एक दशक में देश में परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर जितना बड़ा संकट दिखाई दिया, उसमें पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं की धांधली सबसे गंभीर मुद्दों में रही. NEET से लेकर UGC-NET और दूसरी राष्ट्रीय परीक्षाओं तक बार-बार उठे सवालों ने करोड़ों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया. विडंबना यह है कि जिस परीक्षा को गरीब और निम्न-मध्यवर्गीय परिवार शिक्षा और रोजगार के जरिए सामाजिक-आर्थिक तरक्की की सबसे बड़ी सीढ़ी मानते हैं, वही व्यवस्था बार-बार सवालों के घेरे में रही.

जुलाई 2026 में भाजपा की सामंती मानसिकता के खिलाफ सड़क पर उतरी कॉकरोच जनता पार्टी ने जब भारी जन-दबाव बना कर मोदी सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लिया तो सरकार ने सोचा नहीं था कि मामला इससे भी आगे जाने वाला है. जेन जी के बाद जेन एल्फा भी अपने हक और मांगों को लेकर आवाज बुलंद करेंगे. कॉकरोचों का ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के तहत सड़क पर उतरे जेन एल्फा ने सामंतों की जड़ें हिला दी हैं. वे जो खुद को जन्म से श्रेष्ठ समझते हैं, वे जिन्हें बराबरी स्वीकार नहीं है, वे जिन्हें सिर्फ आदेश देने की आदत है, वे जो खुशामद से खुश होते हैं, वे जो असहमति को अपमान समझ कर असहमत व्यक्ति को बुलडोजर से कुचलते हैं, वे जो महिलाओं को कभी बराबरी का दर्जा नहीं देना चाहते, उन्हें पुरुष के पैर की जूती बनाये रखना चाहते हैं, वे जो गरीब को गरीब रखना चाहते है, उन्हें सत्ता और संपत्ति में हिस्सा नहीं देना चाहते, उनके गुदगुदे-मुलायम मनसदों में अब छोटे-बड़े सारे कॉकरोच घुस गए हैं. अपने अपने कैमरों के साथ.

‘स्कूल ठीक करो’ ने कैमरे को नागरिक हथियार बना दिया

कॉकरोच जनता पार्टी ने 15 अगस्त से इस अभियान की शुरुआत करते हुए अभिभावकों और नागरिकों से सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं का सोशल ऑडिट करने की अपील की थी. बिजली, पानी, शौचालय, मिड-डे मील और दूसरी जरूरी सुविधाएं हैं या नहीं, इसे देखने और वीडियो के जरिए सामने लाने को कहा था. इसके बाद सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो सामने आने लगे जिनमें बच्चे और अभिभावक अपने-अपने स्कूलों की वास्तविक स्थिति दिखाते नजर आ रहे हैं.

सरकारों के लिए यह सब बेहद असुविधाजनक है, लेकिन लोकतंत्र के लिए यह एक अच्छी खबर है. सरकारी स्कूल जनता के पैसे से चलते हैं, इसलिए बच्चों, उनके अभिभावकों और जनता को यह जानने का अधिकार है कि वहां क्या हो रहा है.

सरकार को कैमरे से डर लगने लगा है

जेन एल्फा के खुलासों और मीडिया कैमरों से घबराई राजस्थान की भाजपा सरकार ने 17 अगस्त 2026 को राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बाहरी व्यक्तियों और मीडिया के प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया है. फोटो, वीडियो, इंटरव्यू या लाइव स्ट्रीमिंग के लिए भी लिखित अनुमति जरूरी होगी. राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर का कहना है कि इससे बच्चों की निजता, गरिमा और सुरक्षा की रक्षा होगी और मीडिया की मौजूदगी से पढ़ाई बाधित होती है. मंत्री ने कहा कि पत्रकार पूर्व अनुमति लेकर स्कूल में जा सकते हैं. राजस्थान के बाद उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के अधिकारियों ने भी ऐसे फरमान जारी करने शुरू कर दिए हैं.

सवाल यह है कि जब सरकारी स्कूल जनता के पैसे से चलते हैं, तो उनकी हालत की स्वतंत्र पड़ताल और सार्वजनिक निगरानी पर इतनी पाबंदी क्यों लगाई जा रही है? अगर स्कूल अच्छा है तो उसकी तस्वीर सामने आने दीजिए. अगर शिक्षक पर्याप्त हैं तो बच्चों को बताने दीजिए. अगर शौचालय साफ हैं तो कैमरे को दृश्य दिखाने दीजिये.अगर भोजन पौष्टिक है तो बच्चों को उसकी तस्वीर बनाने दीजिए. और अगर कहीं कमी है तो उस कमी को छिपाने के बजाय ठीक कीजिए. क्योंकि किसी सरकारी स्कूल की बदहाल तस्वीर सरकार की आलोचना नहीं, सरकार के लिए मुफ्त ऑडिट रिपोर्ट है.

सरकारी स्कूल जनता के हैं, किसी सरकार की निजी संपत्ति नहीं

सरकारों को समझना होगा कि सरकारी स्कूल किसी निजी कंपनी का दफ्तर नहीं है. वह जनता के पैसे से चलता है. वहां पढ़ने वाले बच्चे जनता के बच्चे हैं. वहां की इमारत, शिक्षक, शौचालय, पानी, बिजली, फर्नीचर और मिड-डे मील सब सार्वजनिक व्यवस्था का हिस्सा हैं. फिर उस व्यवस्था की तस्वीर लेने से डर किस बात का? अगर स्कूल शानदार हैं तो कैमरे से सरकार का ही प्रचार होगा.

लेकिन आजादी के 80 साल बाद देश में अगर किसी बच्चे को अपने स्कूल की टूटी दीवार, गंदे शौचालय, बिना पानी के नल, गायब शिक्षक, धूल से भरे कमरे और बदहाल मैदान का वीडियो बनाकर दुनिया को दिखाना पड़े, तो सवाल उस बच्चे से नहीं, उस व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए जिसने उसे यह वीडियो बनाने पर मजबूर किया. ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान ने फिलहाल यही सवाल खड़ा किया है.

एक वीडियो और बदल गया स्कूल

कॉकरोच जनता पार्टी का ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान का एक दिलचस्प उदाहरण महाराष्ट्र के हिंगोली जिले से सामने आया है. पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके के गांव संतुक पिंपरी के सरकारी स्कूल में अभियान के दौरान बुनियादी सुविधाओं की कमी सामने आई. इसके बाद स्कूल में मरम्मत का काम शुरू हुआ और आज तक कंप्यूटर नहीं होने वाले स्कूल में पहला कंप्यूटर भी पहुंचा. यानी बच्चों ने स्कूल का वीडियो बनाया, सवाल उठाये और व्यवस्था हरकत में आई. यही लोकतंत्र का सही उद्देश्य है कि जनता सवाल पूछे और सरकार जवाब दे.

लेकिन अगर व्यवस्था का पहला जवाब यह हो कि ‘बाहर वालों को स्कूल में घुसने मत दो’, तो स्वाभाविक रूप से अगला सवाल उठेगा कि क्या स्कूल की हालत बहुत ख़राब है?

बच्चों ने पूछा और स्कूल में पंखे लग गए

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में बच्चों के प्रदर्शन के बाद उनके स्कूल में पंखे और वाटर कूलर लग गए. सर्वोदय इंटर कॉलेज के छात्रों के प्रदर्शन के बाद स्कूल में खेल मैदान की सफाई, आरओ प्लांट, दो वाटर कूलर और 35 पंखे लगाने का काम शुरू हुआ तो बच्चों के चेहरे चमक उठे. इस घटना का सबसे बड़ा सबक यही है कि बच्चे जब अपनी समस्या को लेकर खड़े होते हैं तो समस्या सिर्फ ‘शिकायत’ नहीं रहती. वह प्रशासन के लिए जवाबदेही का सवाल बन जाती है. और शायद यही वजह है कि ‘जेन एल्फा’ की यह आवाज अलग है.

यह पीढ़ी आवेदन नहीं, वीडियो बनाती है

यह वह पीढ़ी है जो मोबाइल कैमरे से परिचित है. वह किसी सरकारी अधिकारी के सामने लंबा आवेदन लिखने के बजाय अपने स्कूल की तस्वीर दुनिया को दिखा सकती है. वह पूछ सकती है कि जब शहर के बच्चों के स्कूल में स्मार्ट क्लास, एसी कमरे, साफ शौचालय और खेल के मैदान हो सकते हैं, तो गांव के बच्चे गंदे शौचालय और बिना पानी के स्कूल में क्यों पढ़ें?

सरकारी स्कूलों की हालत पर सवाल उठाना सरकार विरोध नहीं है. यह लोकतंत्र का सबसे सामान्य नागरिक अधिकार है. सरकारें बदलती रहती हैं. मंत्री बदलते हैं. अधिकारी बदलते हैं. लेकिन बच्चे हर साल उसी स्कूल में जाते हैं. एक बच्चा अगर पूछता है कि उसके स्कूल में शौचालय क्यों नहीं है, तो उसका जवाब राजनीतिक भाषण नहीं हो सकता. अगर वह पूछता है कि शिक्षक क्यों नहीं है, तो उसे राष्ट्रवाद का पाठ नहीं पढ़ाया जा सकता. अगर वह पूछता है कि पीने का पानी क्यों नहीं है, तो उसे यह नहीं कहा जा सकता कि देश बहुत आगे बढ़ गया है. क्योंकि बच्चे आंकड़ों से नहीं, अपने स्कूल की जमीन से विकास को मापते हैं.

‘स्कूल ठीक करो’ से ‘समाज ठीक करो’ तक

‘स्कूल ठीक करो’ को सिर्फ एक राजनीतिक अभियान समझना भूल होगी. इसे उस पीढ़ी की बेचैनी के रूप में देखना चाहिए जो अपने भविष्य के साथ समझौता करने को तैयार नहीं है. जेन एल्फा की बेचैनी में मां की बेचैनी भी शामिल है.

बच्चा स्कूल की चारदीवारी फांद रहा है. मां घर की अदृश्य चारदीवारी फांदने की तैयारी कर रही है.
बच्चा सड़क पर ह्यूमन चेन बना रहा है. मां अपने जीवन में बराबरी की जगह खोज रही है.
बच्चा मोबाइल कैमरे से टूटा शौचालय दिखा रहा है. मां उसी कैमरे में अपना चेहरा देखकर शायद पहली बार पूछ रही है – “मेरी जिंदगी की तस्वीर ऐसी क्यों है?”

और यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी संभावना है. शिक्षा केवल बच्चे को अक्षरज्ञान नहीं देती. शिक्षा उसे सवाल करना सिखाती है. और सवाल करने वाला बच्चा अपने साथ अपनी मां को भी सवाल करना सिखा सकता है. शायद इसलिए ‘स्कूल ठीक करो’ का असली अर्थ सिर्फ स्कूल की छत, पंखे, शिक्षक और शौचालय ठीक करना नहीं है. इसका अर्थ है –
बच्चे का भविष्य ठीक करो.
मां की जिंदगी ठीक करो.
गरीब परिवार की आर्थिक सीढ़ी ठीक करो.
समाज में बराबरी की जगह ठीक करो.
और उस सामंती मानसिकता को ठीक करो जो सदियों से कुछ लोगों को आदेश देने का अधिकार और बाकी लोगों को आदेश मानने की मजबूरी देती आई है.

लखनऊ की बारिश में सड़क पर उतरी वे 300 छात्राएं इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि उन्होंने सिर्फ अपने स्कूल का दरवाजा नहीं खोला, उन्होंने लोकतंत्र का दरवाजा खोला है. और उस दरवाजे के दूसरी तरफ अब केवल बच्चे नहीं हैं, उनकी मांएं भी खड़ी हैं, अपने बच्चों के हाथों में हाथ डाले. अपने अधूरे सपनों के साथ. अपनी चुप्पियों के साथ. और शायद पहली बार अपनी मुक्ति की आवाज के साथ. Gen Alpha Protest

 

 

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