Journalist Ravi Nair: 2026 में अडानी समूह की शिकायत पर गुजरात पुलिस सीधे पत्रकार रवि नायर के घर पहुंच गई. उनका फोन, लैपटॉप और बाकी डिवाइस जब्त कर लिया गया. रवि नायर की एक खबर, एक सवाल, एक रिपोर्ट ही उनका गुनाह बन गया. जिस पत्रकार को निडर पत्रकारिता के लिए इनाम मिलना चाहिए था. आज वो किसी आतंकवादी की तरह बर्ताव झेलने पर मजबूर है.
एक समय था जब पत्रकारों की खबरों या स्टिंग ऑपरेशन से बड़े बड़े बिजनेस, पॉलिटिशियंस और सिलिब्रिटीज को डर रहता था. पत्रकारों की कलम में वह ताकत थी कि बड़े बड़े लोग कुछ भी गलत करने से पहले डरते थे. किसी पत्रकार के स्टिंग ऑपरेशन के नाम से ही संसद से लेकर कॉरपोरेट बोर्डरूम तक सन्नाटा छा जाता था लेकिन आज सबकुछ उलट गया है. लोकतंत्र का सिद्धांत यही है कि लोक ऊपर और तंत्र उसके नीचे काम करे लेकिन अब सिस्टम ऊपर है और जनता उसके नीचे दब कर कराह रही है. यह घटना इसी बात का एक शर्मनाक उदाहरण है.
2014 से पहले तक पत्रकारिता का मतलब था सत्ता को जवाबदेह बनाना. 2001 में तहलका ने ऑपरेशन वेस्टएंड जरिये अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर किया और रक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा. 2010 में NDTV और टाइम्स नाउ के स्टिंग ने 2G घोटाला उजागर किया, जिसके बाद CAG की रिपोर्ट आई और सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई हुई. उस समय कंपनियां और नेता मीडिया से डरते थे क्योंकि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ ताकतवर था. किसी खबर का मतलब था इज्जत जाना, शेयर गिरना और कुर्सी जाना.
आज समीकरण बदल गया है. अब खबर छपने के बाद पत्रकार को डर लगता है. पिछले 5 साल में प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 142वें नंबर से गिरकर 159वें नंबर पर आ गया है. रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की 2025 की रिपोर्ट कहती है कि भारत में पत्रकारों के खिलाफ कानूनी उत्पीड़न सबसे बड़ा हथियार बन गया है. UAPA, मानहानि, राजद्रोह और IT एक्ट की धाराएं अब सवाल पूछने वाले पत्रकारों के खिलाफ इस्तेमाल हो रही हैं.
2023 में हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद अडानी के शेयरों में गिरावट आई और उन्हें 150 अरब डॉलर का नुकसान हुआ था. तब भी सरकार और कंपनी ने इस रिपोर्ट को विदेशी साजिश कहा था, जांच नहीं कराई. अब जब किसी भारतीय पत्रकार ने लोकल स्तर पर अदानी को एक्सपोज़ किया, अदानी ग्रुप के बंदरगाहों, बिजली और सीमेंट पर सवाल उठाया था तो सीधे पुलिस उसके घर पहुंच गई.
यह सिर्फ रवि नायर की कहानी नहीं है. पिछले कुछ सालों के उदाहरण देखिए तो पैटर्न एक जैसा दिखेगा. कश्मीर के पत्रकार फहद शाह को 2022 में UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया. उन्हें 2 साल बाद जमानत मिली. 2021 में दिल्ली की सांप्रदायिक हिंसा की कवरेज करने पर दो पत्रकारों पर UAPA लगा. द वायर के सिद्धार्थ वरदराजन ने अडानी पर रिपोर्टिंग की जिसके बाद उन्हें मानहानि के 10 से ज्यादा नोटिस मिले. निष्पक्ष पत्रकारों के सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गये, आयकर के छापे पड़े, सोशल मीडिया अकाउंट सस्पेंड कर दिया गया. ये सब अब आम हो गया है.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो NCRB के आंकड़े बताते हैं कि 2019 से 2023 के बीच पत्रकारों पर हमले के 350 से ज्यादा मामले दर्ज हुए लेकिन सजा की दर 3 फीसदी से भी कम है. यानी पत्रकारों पर हमला करो और पकड़े जाने का डर भी नहीं.
लोकतंत्र का मतलब सिर्फ वोट देना नहीं है बल्कि सवाल पूछने की आजादी भी है. किसी लोकतंत्र की मजबूती उसके चौथे स्तम्भ यानी पत्रकारिता की मजबूती पर भी टिकी होती है. पत्रकार सवाल नहीं पूछेगा तो कौन पूछेगा? संसद में विपक्ष कमजोर है, अदालतों में केस 5 साल लटकते हैं, RTI के जवाब 6 महीने बाद आते हैं. ऐसी स्थिति में मीडिया ही आखिरी उम्मीद थी लेकिन अब सिस्टम इतना ताकतवर हो गया है कि शिकायतकर्ता भी वही है, जांचकर्ता भी वही है और जज भी वही है. अडानी समूह की शिकायत पर पुलिस एक्टिव हो जाती है लेकिन जब अडानी की कंपनियों के खिलाफ पर्यावरण को तबाह करने की शिकायतें आती हैं तो वो सालों लटकती हैं. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस RTI वालों को कॉकरोच कहते हैं और पर्यावरण की बात करने वालों को बेइज्जत करते हैं. 2020 में पर्यावरण मंत्रालय की अपनी रिपोर्ट में कहा गया था कि मुंद्रा पोर्ट पर 1000 एकड़ से ज्यादा मैंग्रोव नष्ट हुए. उस पर कोई FIR नहीं हुई.
इससे जनता का भरोसा टूटता है. प्यू रिसर्च की 2024 की सर्वे कहती है कि भारत में 62 फीसदी लोग मानते हैं कि मीडिया अब सरकार और बड़े उद्योगों के दबाव में काम करती है. जब जनता का भरोसा चौथे स्तम्भ से खत्म हो जाएगा तो वो अफवाहों पर ही यकीन करेगी. ऐसे में व्हाट्सएप और फेक न्यूज उसी खाली जगह को भरेंगे.
महात्मा गांधी ने कहा था. एक अखबार का काम जनता को सच बताना है, भले ही वो सच कड़वा हो. पत्रकारिता का धर्म यही है. असहज करना, आईना दिखाना, सत्ता से सवाल पूछना. अगर देश के सबसे बड़े बिजनेसमैन एक आम पत्रकार के खिलाफ शिकायत कर सकते हैं और पुलिस तुरंत एक्शन ले सकती है तो फिर किसान, मजदूर, छात्र की शिकायत पर एक्शन क्यों नहीं होता? अगर कंपनी की इज्जत बचाने के लिए पुलिस एक्टिव हो सकती है तो पत्रकार की इज्जत बचाने के लिए कानून क्यों नहीं है? इन सवालों का जवाब कौन देगा? जिस दिन कलम डर गई, उस दिन जनता गूंगी हो जाएगी और गूंगी जनता वाला देश, देश नहीं, सिर्फ एक बाजार बन कर रह जाता है. Journalist Ravi Nair





