Commonwealth Games 2026: ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के खिलाड़ियों ने 39 मैडल जीतकर देश का सिर गर्व से ऊंचा किया. लेकिन इन मैडल्स की चमक के पीछे संघर्ष, अभाव और खेल व्यवस्था की कई कड़वी सच्चाइयां भी छिपी हैं. मैदान पर जीतने वाले खिलाड़ी अक्सर मैदान के बाहर सुविधाओं की कमी, चयन की राजनीति, भ्रष्टाचार और असुरक्षित माहौल से लड़ते हैं. सवाल सिर्फ यह नहीं कि भारत ने कितने मैडल जीते, सवाल यह है कि उन मैडल्स तक पहुंचने के रास्ते में कितनी प्रतिभाएं व्यवस्था की दीवारों से टकराकर पीछे छूट गईं?
भारत के लिए ग्लासगो का मैदान काफी यादगार रहेगा. स्कॉटलैंड के ग्लासगो में 23 जुलाई से 2 अगस्त 2026 तक चले कॉमनवेल्थ गेम्स में इस बार भारतीय खिलाड़ियों ने कुल 39 पदक जीते. 13 गोल्ड, 17 सिल्वर और 9 ब्रॉन्स के साथ भारत पदक तालिका में चौथे स्थान पर रहा. हालांकि प्रतियोगिता का आकार पहले के मुकाबले छोटा था और भारत ने 10 खेलों में सिर्फ 122 खिलाड़ियों का दल उतारा था. फिर भी वेटलिफ्टिंग, बॉक्सिंग और एथलेटिक्स के साथ-साथ जूडो और पैरा-एथलेटिक्स में भी भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया. सबसे ज्यादा चर्चा बॉक्सिंग की हुई. भारत ने बॉक्सिंग में 7 स्वर्ण पदक जीते, जो कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में भारत का सबसे शानदार प्रदर्शन है. मीराबाई चानू ने लगातार तीसरा कॉमनवेल्थ गेम्स गोल्ड जीतकर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की. भारत के कुल 38 खिलाड़ियों ने 39 पदक जीते. एथलीट गुलवीर सिंह का प्रदर्शन भी काफी खास था. उन्होंने 10,000 मीटर में सिल्वर और 5,000 मीटर में ब्रॉन्स प्राप्त किया.
39 पदकों से कहीं बड़ी है यह कहानी
भारत के लिए ग्लासगो में खिलाड़ियों का बेहतरीन प्रदर्शन सिर्फ 39 मैडल्स हासिल करने भर की कहानी नहीं है. असली बात यह है कि नई पीढ़ी के खिलाड़ी अपने दम पर आगे आ रहे हैं और अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं. अस्मिता डे ने जूडो में भारत का पहला कॉमनवेल्थ गोल्ड जीतकर इतिहास रचा. हर्ष सिंह ने भी जूडो में गोल्ड हासिल किया. बॉक्सिंग में नई लड़कियों ने कमाल किया तो पैरा-एथलेटिक्स में शर्मिला धांकर और दिलीप गावित ने दिखाया कि शारीरिक चुनौतियां प्रतिभा के रास्ते में दीवार नहीं बन सकती हैं. खिलाड़ियों का यह जोश भारतीय खेल जगत की सबसे बड़ी उम्मीद है.
भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है. असली चुनौती यह है कि छोटे शहरों, गांवों और साधारण परिवारों से निकलने वाली प्रतिभाओं को लगातार बेहतर प्रशिक्षण, पोषण, खेल सुविधाएं और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताएं मिलें. कॉमनवेल्थ गेम्स का मंच भारत के लिए एक तरह की प्रयोगशाला है. यहां जो खिलाड़ी चमकते हैं, उनमें से कई आगे एशियन गेम्स और ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करते हैं.
पदक जीतने पर सब साथ, संघर्ष के समय कौन?
भारत में जब कोई खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लेकर खड़ा होता है तो पूरा देश उसके साथ खड़ा दिखाई देने लगता है. खिलाड़ी पदक लेकर आता है तो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्री और अधिकारी तक बधाई देने लगते हैं. टीवी चैनलों, अखबारों और सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें छा जाती हैं. फिर केंद्र सरकार और राज्य सरकारें विजयी खिलाड़ियों के लिए बड़े बड़े पुरस्कारों और नौकरियों की घोषणाएं करती हैं. विज्ञापन कंपनियां खिलाड़ियों को अपना चेहरा बना लेती हैं और सत्ता शीर्ष पर बैठा आदमी गर्व से गर्दन अकड़ा कर कहता है – देखिए, हमारे शासन में भारत खेलों में आगे बढ़ रहा है.
लेकिन ये तमाम लोग उस समय नदारद होते हैं जब यही खिलाड़ी आगे बढ़ने के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं, व्यवस्था की खामियों, अराजकता और भ्रष्टाचार से जूझ रहे होते हैं. मानसिक और शारीरिक शोषण का शिकार बनते हैं. तंत्र का दुष्चक्र खिलाड़ियों को ही नहीं बल्कि उनके परिवार, उनके साथी, उनके कोच सभी को प्रभावित करता है. विजय के पहले, दूसरे या तीसरे पायदान पर खड़े होकर भले खिलाड़ियों के चेहरों पर रौनक दिखती हो मगर इस चमक के पीछे का अंधकार सिर्फ वही जानते हैं. क्योंकि उन्होंने उस अंधकार को जिया है, उससे लड़ कर बाहर निकले हैं.
प्रतिभा के सामने व्यवस्था की सख्त दीवार
जब किसी छोटे शहर या गांव का बच्चा खेल में आगे बढ़ने का सपना देखता है, तो उसकी प्रतिभा को मंजिल तक पहुंचने से पहले व्यवस्था की सख्त दीवारों से टकराना पड़ता है. मैदान, अच्छे कोच, आधुनिक प्रशिक्षण, पौष्टिक भोजन और जरूरी खेल उपकरण जैसी सुविधाएं आज भी प्रतिभाशाली बच्चों की पहुंच से बाहर हैं. देश में प्रतिभा की कमी नहीं है, मगर संसाधनों और अवसरों की कमी, भ्र्ष्टाचार और भेदभाव ने भारत के खेल भविष्य के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर रखी है.
खिलाड़ियों को खेलने के लिए मैदान मिल जाए तो वहां सुविधा नहीं है. कोच चाहिए तो सिफारिश लाओ. प्रतियोगिता चाहिए तो चयन की राजनीति सामने आ जाती है. आर्थिक मदद चाहिए तो फाइलों के साथ दफ्तर दफ्तर घूमो और खिलाड़ी यदि महिला है तब तो उसे कई बार खेल की कठिन ट्रेनिंग से भी बड़ी एक दूसरी लड़ाई लड़नी पड़ती है – अपनी गरिमा, सुरक्षा और शरीर को नरपिशाचों से बचाने की लड़ाई.
यह है भारत में खेल जगत की हकीकत. जिस खिलाड़ी से हम पदक की उम्मीद करते हैं, उसे हम सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल तक नहीं दे पाते हैं.
मैडल टेबल में नहीं दिखता खिलाड़ी का संघर्ष
ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया. मीराबाई चानू ने लगातार तीसरा कॉमनवेल्थ गोल्ड जीतकर इतिहास रचा. एथलेटिक्स, वेटलिफ्टिंग, बॉक्सिंग और पैरा-स्पोर्ट्स में भारतीय खिलाड़ियों ने देश का नाम रोशन किया. लेकिन असली सवाल यह है कि इन मैडल्स के पीछे खिलाड़ी ने क्या कीमत चुकाई?
कितने साल उसने अभ्यास किया? कितनी बार चोट के बावजूद मैदान में उतरे? कितने समय तक घर से दूर रहे? कितनी बार आर्थिक तंगी से जूझना पड़ा? और कितनी बार लगा कि अगर वह अधिकारी या संघ के ताकतवर व्यक्ति से उलझ गया तो उसका करियर खत्म हो सकता है?
मैडल टेबल में इन सवालों का कोई कॉलम नहीं होता. वहां सिर्फ गोल्ड, सिल्वर या ब्रॉन्स दिखाई देता है. खिलाड़ी की आंखों के आंसू, उसके परिवार का त्याग, उसकी चोट, उसका मानसिक तनाव, उसका शोषण और संस्थागत उपेक्षा किसी को नजर नहीं आती है.
इसलिए हर कॉमनवेल्थ, एशियन गेम्स या ओलंपिक के बाद हमें सिर्फ पदक नहीं गिनने चाहिए. हमें यह भी गिनना चाहिए कि उन पदकों के पीछे कितने खिलाड़ियों ने व्यवस्था से लड़ते हुए अपना करियर खो दिया.
महिला खिलाड़ियों के सामने अस्मिता और सुरक्षा की बड़ी लड़ाई
भारतीय खेल अकादमियों और खेल संघों में जातिगत भेदभाव, यौन उत्पीड़न और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे समय-समय पर रिपोर्टों, एथलीटों की शिकायतों और मीडिया जांच के जरिए सामने आते रहे हैं. ये समस्याएं अक्सर खेल अकादमियों में कोच और प्रशासन के अत्यधिक वर्चस्व तथा पारदर्शिता की कमी के कारण गहरी होती हैं.
एक पुरुष खिलाड़ी खराब चयन व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसके पास भी जोखिम होता है, लेकिन महिला खिलाड़ी के सामने कई अतिरिक्त खतरे होते हैं, जैसे शारीरिक सुरक्षा, यौन उत्पीड़न, मानसिक दबाव, चरित्र पर सवाल, सोशल मीडिया ट्रोलिंग, करियर बर्बाद होने का डर और सबसे बढ़कर उस व्यक्ति की सत्ता से टकराने का भय, जिसके हाथ में उसके चयन और भविष्य की चाबी होती है.
यहीं से खेल और सत्ता का सबसे खतरनाक गठजोड़ शुरू होता है.
किसी खिलाड़ी का चयन किसके हाथ में है?
कोच किसके प्रति जवाबदेह है?
फेडरेशन का अध्यक्ष किसके प्रति जवाबदेह है?
शिकायत करने वाली खिलाड़ी की सुरक्षा कौन करेगा?
और अगर शिकायत उसी व्यक्ति के खिलाफ हो जो पूरी संस्था पर प्रभाव रखता हो तो जांच कौन करेगा?
अगर इन सवालों का जवाब उसी संस्था के पास है जहां शिकायत हुई है, तो निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
उत्पीड़न की समस्या सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, संस्थागत भी है
भारत में महिला खिलाड़ियों के उत्पीड़न पर 2026 के एक अकादमिक अध्ययन ने भी शारीरिक, यौन, मनोवैज्ञानिक, लैंगिक और साइबर उत्पीड़न को गंभीर समस्या बताते हुए संस्थागत शक्ति असंतुलन, कम रिपोर्टिंग और कानूनों के कमजोर क्रियान्वयन को खिलाड़ियों के करियर में बहुत बड़ी बाधा माना है.
यानी समस्या केवल कुछ व्यक्तियों की नहीं है. समस्या उस व्यवस्था की है जिसमें शिकायत करने वाला कमजोर और आरोपी बहुत ताकतवर होता है.
बृजभूषण प्रकरण ने पूरे खेल तंत्र को नंगा किया
दिल्ली के जंतर मंतर पर भारतीय कुश्ती की महिला खिलाड़ियों का आंदोलन देश और दुनिया ने देखा. हमने देखा कि कैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए पदक जीत चुकी महिला पहलवान सड़क पर उतरीं. उन्होंने जंतर-मंतर पर धरना दिया. सार्वजनिक रूप से अपनी पीड़ा बताई. उनका आरोप था कि भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह ने उनका यौन उत्पीड़न किया. उनको मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया. महिला खिलाड़ियों ने आरोपी को सजा मिले इसके लिए अदालत का दरवाजा भी खटखटाया.
दिल्ली पुलिस ने 2023 में छह महिला पहलवानों की शिकायतों के आधार पर कोर्ट में बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आरोपपत्र भी दाखिल किया और 2024 में अदालत ने उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न, महिला की गरिमा भंग करने तथा आपराधिक धमकी से जुड़े आरोप भी तय कर दिए, मगर 3 अगस्त 2026 को दिल्ली की अदालत ने बृजभूषण शरण सिंह को आश्चर्यजनक तरीके से इस मामले में बाइज्जत बरी कर दिया. कोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न के सबूत नाकाफी हैं. दरअसल अदालत के पटल पर सबूत और गवाह जिस पुलिस को देने होते हैं, वह पुलिस प्रदेश सरकार की और बृजभूषण शरण सिंह भी सरकार के, ऐसे में अदालत में सबूतों और गवाहों का अभाव तो होना ही था.
कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश का झंडा बुलंद किया और भारत को गौरव दिलाया, वही खिलाड़ी अपने यौन शोषण के खिलाफ आवाज उठाते हुए जब न्याय की आस में सड़कों पर उतरे और जंतर-मंतर पर आंदोलन किया तो पुलिस ने उनके बाल पकड़ कर घसीटे, उन्हें थप्पड़ मारे, उनके कपड़े अस्त-व्यस्त किये, उनका करियर तबाह कर देने की धमकियों के साथ उन्हें भद्दी भद्दी गालियां दीं. पुलिस बर्बरता के उन वीडियो को देख कर पूरा देश स्तब्ध था. उन तस्वीरों ने केवल खेल जगत ही नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, महिला सुरक्षा और सत्ता की संवेदनशीलता को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए थे. और अब आरोपी को बाइज्जत बरी करके कोर्ट ने भी उनके मनोबल पर कुठाराघात किया है.
इतनी बड़ी घटना के बाद भी भारतीय खेल व्यवस्था यह सुनिश्चित नहीं कर पायी कि भविष्य में किसी महिला खिलाड़ी को अपने अधिकार के लिए जंतर-मंतर तक न जाना पड़े? न ही वह ऐसी शिकायतों के लिए कोई स्वतंत्र व्यवस्था बना पायी. महिला खिलाड़ियों को यह भरोसा भी नहीं दिलाया गया कि शिकायत करने पर उनका चयन, प्रशिक्षण और करियर प्रभावित नहीं होगा?
राज्य स्तरीय फुटबॉल संघों और निजी/सरकारी क्रिकेट अकादमियों में भी युवा महिला खिलाड़ियों द्वारा चयन के बदले अनुचित मांग करने या दुर्व्यवहार के आरोप लगाए गए हैं.
खेल संघ या सत्ता के छोटे-छोटे साम्राज्य?
भारत में अनेकों खेल संघ बने हैं मगर वे खेलों की संस्था कम और कुछ लोगों की निजी जागीर ज्यादा हैं. इन खेल संघों में लोग वर्षों तक अपने पदों पर बने रहते हैं. एक ही परिवार के लोग अलग-अलग पदों पर होते हैं. राजनीतिक रसूख वाले लोग खेल प्रशासन में हैं. खिलाड़ियों की प्रतिभा से ज्यादा अधिकारियों की ताकत की गूंज सुनाई देती है और चयन से लेकर प्रतियोगिता तक पारदर्शिता सवालों के घेरे में होती है.
खेल का मूल सिद्धांत होना चाहिए – सबसे अच्छा खिलाड़ी चयनित हो और सबसे अच्छा खिलाड़ी जीते. लेकिन ज्यादातर खिलाड़ियों को लगता है कि मैदान पर प्रदर्शन से ज्यादा जरूरी किसी अधिकारी की कृपा है. ऐसे में खेल की आत्मा वहीं मर जाती है.
खिलाड़ी को यह भरोसा होना चाहिए कि उसका चयन उसके प्रदर्शन से होगा, न कि किसी फोन कॉल से. उसमें यह ताकत होनी चाहिए कि वह अधिकारी की गलत बात का विरोध कर पाए. उसे यह भरोसा होना चाहिए कि शिकायत करने पर उसे टीम से बाहर नहीं निकाला जाएगा. महिला खिलाड़ी को यह भरोसा होना चाहिए कि उसके शरीर, उसकी गरिमा और उसका भविष्य किसी अधिकारी की निजी संपत्ति नहीं है.
गरीब का बच्चा चैंपियन कैसे बने?
भारत में क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों में करियर बनाने का सपना देखने वाले लाखों बच्चे हैं. गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में प्रतिभा की कमी नहीं, कमी है तो अवसरों की. महंगे खेल उपकरण, अच्छे कोच, पौष्टिक भोजन, प्रतियोगिताओं का खर्च और रहने की सुविधा गरीब परिवारों के बच्चों के सामने बड़ी दीवार बनकर खड़ी रहती है. ऐसे में भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) जैसी संस्थाओं से उम्मीद स्वाभाविक है. लेकिन सवाल यह है कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में कितने प्रतिभाशाली बच्चों तक पहुंच रहा है?
मौजूदा सरकारी आंकड़ों के अनुसार SAI की विभिन्न योजनाओं में करीब 9,432 खिलाड़ी प्रशिक्षण ले रहे हैं. इनमें लगभग 6,793 आवासीय और 2,639 गैर-आवासीय खिलाड़ी हैं. आवासीय खिलाड़ियों को बोर्डिंग, स्पोर्ट्स किट, स्टाइपेंड, प्रतियोगिता एक्सपोजर, शिक्षा, चिकित्सा और बीमा जैसी सुविधाएं दी जाती हैं. मार्च 2025 के लोकसभा जवाब के मुताबिक खिलाड़ियों को साल में 330 दिनों तक बोर्डिंग सहित कई सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रावधान है.
योजनाएं हैं, लेकिन प्रतिभा तक पहुंच कितनी है?
सरकार की दूसरी योजनाएं भी खिलाड़ियों को आर्थिक सहारा देती हैं. खेलो इंडिया खिलाड़ियों के लिए आउट-ऑफ-पॉकेट अलाउंस और TOPS के तहत चुनिंदा खिलाड़ियों को ₹25,000 से ₹50,000 प्रतिमाह तक सहायता का प्रावधान है. ओलंपिक पदक विजेताओं के लिए भी लाखों रुपये के नकद पुरस्कार निर्धारित हैं. लेकिन समस्या यह है कि इन योजनाओं की चमक तक पहुंचने से पहले ही हजारों प्रतिभाएं व्यवस्था के अंधेरे में खो जाती हैं.
सबसे बड़ी कमी प्रतिभा पहचान और सूचना की पहुंच की है. आज भी अनेक ग्रामीण परिवारों को यह पता नहीं होता कि SAI का केंद्र कहां है, ट्रायल कब होंगे, आवेदन कैसे करना है और चयन के मानदंड क्या हैं. यदि प्रतिभा को अवसर की जानकारी ही नहीं मिलेगी तो केवल मेरिट की बात करना अधूरा होगा.
प्रतिभा पहचान की व्यवस्था गांव-गांव तक पहुंचानी होगी
जरूरत है कि हर जिले के स्कूलों में नियमित टैलेंट आइडेंटिफिकेशन कैंप हों, ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में विशेष ट्रायल आयोजित किए जाएं और शारीरिक शिक्षा शिक्षकों को प्रतिभा पहचानने का प्रशिक्षण मिले. चयन प्रक्रिया ऑनलाइन और पारदर्शी हो, ट्रायल के परिणाम सार्वजनिक किए जाएं और असफल खिलाड़ियों को भी चयन न होने का कारण बताया जाए.
भारत को खेल महाशक्ति बनना है तो केवल पदक विजेताओं को सम्मानित करना पर्याप्त नहीं है. खेल व्यवस्था की सफलता 9,432 खिलाड़ियों की संख्या में नहीं, बल्कि उन लाखों बच्चों तक अवसर पहुंचाने में है जो आज भी मैदान के बाहर खड़े हैं. बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी गरीब किसान, मजदूर या निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार का बच्चा सिर्फ अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर राष्ट्रीय टीम तक पहुंच सकता है?
भ्रष्टाचार सिर्फ पैसे का नहीं होता
खेल में भ्रष्टाचार को अक्सर सिर्फ घोटाले और पैसे की हेराफेरी से जोड़ा जाता है. लेकिन असली भ्रष्टाचार उससे कहीं ज्यादा बड़ा है. जब योग्य खिलाड़ी को मौका नहीं मिलता और लाखों रुपयों की रिश्वत देकर अयोग्य खिलाड़ी चयनित हो जाता है, वह भी भ्रष्टाचार है. जब खिलाड़ी से किसी अधिकारी के सामने झुकने की उम्मीद की जाती है, वह भी संस्थागत भ्रष्टाचार है. जब शिकायत करने वाले खिलाड़ी को चुप कराने की कोशिश होती है, वह भी सत्ता का दुरुपयोग है. जब खेल संघ अपने पदाधिकारियों को खिलाड़ियों से ऊपर समझता है, वह भी भ्रष्टाचार है. और जब सरकारें ऐसे संस्थानों पर कार्रवाई करने के बजाय राजनीतिक समीकरणों को प्राथमिकता देती हैं, तब यह केवल खेल प्रशासन की बात नहीं रह जाती, यह सत्ता और शासन की बात हो जाती है.
खिलाड़ी की मेहनत का श्रेय सभी लेना चाहते हैं
हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं – ‘भारत खेलों में नई ऊंचाइयों पर पहुंच रहा है.’ निस्संदेह कुछ क्षेत्रों में बदलाव आया है. बेहतर प्रशिक्षण, विदेशी कोच, खेल विज्ञान, पोषण, पुरस्कार और कुछ खेलों में बेहतर सुविधाओं ने भारतीय खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया है. लेकिन इन उपलब्धियों का श्रेय व्यवस्था को नहीं जाता. इसके पीछे अभी भी खिलाड़ी का संघर्ष है.
किसी खिलाड़ी के पिता ने खेत बेचकर प्रशिक्षण कराया. किसी ने रेलवे स्टेशन के पास बने छोटे मैदान में अभ्यास किया. किसी ने जूते खरीदने के लिए पैसे जुटाए. किसी ने चोट लगने के बाद अपने दम पर वापसी की. किसी ने आर्थिक तंगी के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच बनाई. और जब वह पदक जीतता है तो मंच पर तमाम नेता और अधिकारी उसके साथ खड़े होकर तस्वीर खिंचवाते हैं और व्यवस्था उसकी जीत का पूरा श्रेय लेने की कोशिश करती है.
पदकों के पीछे संघर्ष की लंबी कहानियां
देश के कई ऐसे खिलाड़ी हैं जिनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान चमकदार पदकों के बाद बनी, लेकिन उन पदकों के पीछे गरीबी, अभाव, बीमारी, चोट, सामाजिक भेदभाव और कभी-कभी खेल व्यवस्था से टकराने की लंबी कहानी छिपी है.
मैरी कॉम : सामाजिक सोच को चुनौती देती मुक्केबाज
मणिपुर के एक साधारण परिवार से आने वाली मैरी कॉम ने जब मुक्केबाजी शुरू की थी, तब महिलाओं के लिए बॉक्सिंग को लेकर समाज उदार नहीं था. उनकी कहानी केवल गरीबी से निकलने की कहानी नहीं है, बल्कि उस सामाजिक सोच को चुनौती देने की कहानी भी है जिसमें लड़की के लिए खेल, खासकर मुक्केबाजी को ठीक नहीं माना जाता है.
मीराबाई चानू : अभाव से विश्व मंच तक
मणिपुर के एक छोटे से गांव से निकली मीराबाई चानू का बचपन भी बेहद गरीबी में बीता. उनके पिता मजदूर थे और मां सड़क किनारे चाय की दुकान चलाती थीं. बचपन में मीराबाई जंगल से लकड़ियां सिर पर ढो कर लाने का काम करती थीं. एक दिन उनकी असाधारण शारीरिक ताकत देखकर परिवार ने उन्हें वेटलिफ्टिंग की ओर जाने के लिए प्रेरित किया. पर समस्या यह थी कि प्रशिक्षण केंद्र करीब 20 किलोमीटर दूर था. रोज आने-जाने के लिए पैसे भी नहीं होते थे. ट्रक ड्राइवरों से लिफ्ट मांग कर वे केंद्र तक जाती थीं. मीराबाई चानू अपने संघर्षों से विश्व चैंपियन बनी और टोक्यो ओलंपिक में सिल्वर मैडल जीता. उनका संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ. कलाई, कंधे, कमर और कूल्हे की चोटों ने उनके करियर को बार-बार रोका. मगर उन्होंने हर बार वापसी की.
विनेश फोगाट : मैट से बाहर व्यवस्था से लड़ाई
विनेश फोगाट की कहानी भारतीय खेल व्यवस्था के स्याह चेहरे को सामने लाती है. रियो ओलंपिक में घुटने की गंभीर चोट ने उनका अभियान खत्म कर दिया था. इसके बाद उन्होंने लंबी मेहनत से वापसी की और एशियाई खेलों तथा राष्ट्रमंडल खेलों में गोल्ड मैडल जीते. लेकिन उनकी सबसे बड़ी लड़ाई मैट पर नहीं, जंतर मंतर पर हुई. महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न के खिलाफ आंदोलन में वह अग्रिम पंक्ति में खड़ी हुईं. इस संघर्ष ने उन्हें खेल प्रशासन और सत्ता के प्रभावशाली लोगों से टकराव की स्थिति में ला दिया. उनके साथ गन्दी राजनीति चली गई. पेरिस ओलंपिक 2024 में वह फाइनल से पहले केवल 100 ग्राम अधिक वजन के कारण अयोग्य घोषित कर दी गईं. मगर विनेश फोगाट को खेल व्यवस्था के भ्र्ष्ट चक्र के भीतर अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए सदा याद किया जाएगा.
दुती चंद : अपने शरीर और नियमों के खिलाफ सवाल
दुती चंद का संघर्ष अलग तरह का था. 2014 में उन्हें ऊंचे एंड्रोजन स्तर से जुड़े नियमों के कारण प्रतियोगिताओं से बाहर कर दिया गया. उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी और मामला कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन फॉर स्पोर्ट तक पहुंचा. 2015 में CAS ने संबंधित नियमों को दो साल के लिए निलंबित किया और अधिक वैज्ञानिक प्रमाण मांगे. इस संघर्ष का महत्व इसलिए भी बड़ा था क्योंकि सवाल केवल एक खिलाड़ी के करियर का नहीं था, बल्कि यह था कि किस आधार पर किसी महिला खिलाड़ी को यह बताया जा सकता है कि उसका शरीर ‘पर्याप्त महिला’ नहीं है? दुति की कहानी खेल में भेदभाव और नियमों की मानवीय संवेदनशीलता पर बड़ी बहस का हिस्सा है.
देवेंद्र झाझरिया : शारीरिक चुनौती को ताकत बनाया
देवेंद्र झाझरिया बचपन में एक दुर्घटना के कारण अपना एक हाथ गंवा बैठे थे. लेकिन उन्होंने अपनी शारीरिक कमी को अपनी पहचान नहीं बनने दिया. भाला फेंक को अपना खेल बनाया और पैरालंपिक इतिहास में भारत के सबसे बड़े नामों में शामिल हुए. मगर सफलता मिलने के बाद भी संघर्ष खत्म नहीं हुआ. उन्हें अपने पहले पैरालंपिक स्वर्ण के बाद दूसरे स्वर्ण के लिए 12 वर्ष इंतजार करना पड़ा. उन्होंने एथेंस 2004 के बाद रियो 2016 में फिर गोल्ड जीता.
दीपा मलिक : बीमारी और विकलांगता को मात देती कहानी
दीपा मलिक की कहानी असाधारण उदाहरणों में से एक है. स्पाइनल ट्यूमर के इलाज के बाद उनके शरीर का निचला हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया. कई सर्जरी और लगभग 200 टांकों के बाद उन्हें व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ा. लेकिन उन्होंने जोश नहीं खोया. पैरा-एथलेटिक्स में प्रवेश किया और रियो 2016 में शॉटपुट में रजत पदक जीतकर पैरालंपिक खेलों में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनने का इतिहास बनाया.
मिल्खा सिंह : विस्थापन से विश्व पहचान तक
मिल्खा सिंह की जिंदगी में भारत के विभाजन की हिंसा में परिवार के सदस्यों को खोने और शरणार्थी के रूप में नई जिंदगी शुरू करने की टीसें शामिल थीं. गरीबी, विस्थापन और असुरक्षा के बीच उन्होंने सेना में प्रवेश किया और वहीं से एथलेटिक्स की ओर बढ़े. बाद में वह भारत के सबसे प्रसिद्ध धावक बने और 1960 रोम ओलंपिक में 400 मीटर के फाइनल में चौथे स्थान तक पहुंचे. उनकी कहानी का महत्व इस बात में है कि जिस व्यक्ति के पास जीवन शुरू करने के लिए कुछ नहीं बचा था, उसने दौड़कर अपने देश की पहचान दुनिया तक पहुंचाई.
व्यवस्था की मदद के बिना भी आगे बढ़ते खिलाड़ी
इन सभी कहानियों को साथ रखकर देखें तो एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है. भारत की खेल प्रतिभा व्यवस्था की मदद से नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमियों के बावजूद आगे बढ़ती दिखाई देती हैं. किसी के पास प्रशिक्षण केंद्र नहीं था, किसी के पास जूते और संसाधन नहीं थे, किसी को समाज की सोच से लड़ना पड़ा, किसी को अपने शरीर और बीमारी से लड़ना पड़ा, किसी को चोट के बाद फिर शुरुआत करनी पड़ी और किसी को खेल की संस्थागत व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज उठानी पड़ी.
इन खिलाड़ियों की उपलब्धियों को केवल ‘मेहनत का फल’ कहकर छोड़ देना अधूरा होगा. उनकी मेहनत असाधारण थी, लेकिन सवाल यह भी है कि अगर व्यवस्था ने शुरुआत से ही उन्हें बेहतर सुविधाएं, पारदर्शी चयन, सुरक्षित प्रशिक्षण वातावरण, वैज्ञानिक कोचिंग और आर्थिक सहायता दी होती, तो भारत ऐसी कितनी और प्रतिभाओं को विश्व मंच तक पहुंचा सकता था?
हजारों प्रतिभाएं रास्ते में ही क्यों छूट जाती हैं?
यही भारतीय खेल की सबसे बड़ी विडंबना है. हम पदक जीतने वाले खिलाड़ियों की सफलता पर गर्व करते हैं, लेकिन उन हजारों बच्चों की कहानी भूल जाते हैं जिनकी प्रतिभा गरीबी, सुविधाओं की कमी, भेदभाव या खेल व्यवस्था की दीवारों से टकराकर रास्ते में ही दम तोड़ देती हैं. बड़ा सवाल यह है कि जब खिलाड़ी संघर्ष कर रहा था तब व्यवस्था कहां थी?
महिला खिलाड़ियों को सुरक्षित माहौल कौन देगा?
हर बार जब कोई महिला खिलाड़ी पदक जीतती है, हम उसकी तारीफ करते हैं, लेकिन क्या हमने कभी पूछा कि उसे ट्रेनिंग कैंप में किस तरह का माहौल मिला? क्या महिला खिलाड़ियों के लिए सुरक्षित आवास हैं? क्या महिला कोचों की पर्याप्त संख्या है? क्या रात के प्रशिक्षण के दौरान सुरक्षा व्यवस्था है? क्या शिकायत करने वाली खिलाड़ी की पहचान और प्रतिष्ठा सुरक्षित रखी जाती है? क्या शिकायत के बाद आरोपी अधिकारी को जांच पूरी होने तक खिलाड़ी से दूर रखने की व्यवस्था है? क्या शिकायतकर्ता के चयन और करियर को स्वतंत्र रूप से सुरक्षित किया जाता है? और क्या महिला खिलाड़ी को यह अधिकार है कि वह बिना किसी डर के ‘नहीं’ कह सके?
मानसिक शोषण खिलाड़ी को भीतर से तोड़ देता है
खेल में शोषण हमेशा छूने या धमकाने से नहीं होता. गौरतलब है कि खिलाड़ियों का मानसिक शोषण भी उनकी खेल स्पिरिट को मंद कर देता है. कभी-कभी शब्द भी बहुत घातक हथियार बन जाते हैं –
‘तुम टीम में नहीं रहोगी.’
‘तुम्हारा करियर खत्म कर देंगे.’
‘हमारे खिलाफ जाओगी तो कहीं नहीं खेल पाओगी.’
‘चुप रहो, वरना चयन नहीं होगा.’
‘तुम्हारी जगह लेने वाले बहुत हैं.’
ऐसे वाक्य किसी खिलाड़ी को बाहर से चोट नहीं पहुंचाते, लेकिन भीतर से तोड़ देते हैं. युवा खिलाड़ी वर्षों की मेहनत के बाद राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचता है. उसके सामने उसका पूरा भविष्य होता है. दूसरी तरफ एक ऐसा अधिकारी होता है जो चयन समिति, कैंप, यात्रा, प्रतियोगिता और संसाधनों पर अपना प्रभाव रखता है. खिलाड़ियों के भविष्य की डोर उसकी उंगलियों में फंसी होती है. इसी का फायदा उठाकर खिलाड़ियों पर मानसिक दबाव बनाया जाता है. सबसे दुखद बात यह है कि ज्यादातर खिलाड़ी इन बातों की शिकायत नहीं कर पाते हैं क्योंकि उन्हें डर होता है कि अगर आवाज उठाई तो उनकी वर्षों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा, उसे खेल संस्थान से बाहर कर दिया जाएगा. जब राजनीतिक पद, खेल संघ और प्रशासनिक शक्ति एक ही जगह इकट्ठी हो जाती है तो खिलाड़ी कमजोर और अकेला पड़ जाता है.
उम्र की धोखाधड़ी
जूनियर और सब-जूनियर स्तर की अकादमियों में उम्र में हेरफेर करने का एक संगठित रैकेट चलता है, जहां फर्जी दस्तावेजों के जरिए बड़ी उम्र के खिलाड़ियों को खिलाया जाता है, जिससे वास्तविक युवा प्रतिभाएं अवसरों से वंचित हो जाती हैं.
खिलाड़ियों की खुराक और उपकरणों के फंड में गबन
सरकारी फंड से अकादमियों को मिलने वाले डाइट मनी, ट्रेनिंग किट और इंफ्रास्ट्रक्चर के पैसों में हेरफेर के मामले सामने आते रहे हैं. खिलाड़ियों को मिलने वाली खुराक का स्तर बेहद खराब पाया जाता है जबकि कागजों में पूरा बजट खर्च दिखाया जाता है.
कई राज्य स्तरीय अकादमियों और निजी सेंटरों में आरोप लगते रहे हैं कि राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भेजने या ट्रायल पास कराने के लिए खिलाड़ियों से रिश्वत मांगी जाती है.
भारत में प्रतिभा की कमी नहीं, अवसर और सुरक्षा की कमी है
भारत में खेल प्रतिभा की कमी नहीं है. कमी है उसे खोजने की. कमी है उसे बचाने की. कमी है उसे सही प्रशिक्षण देने की. कमी है उसे आर्थिक सुरक्षा देने की और सबसे बड़ी कमी है, उसे बोलने की आजादी देने की.
देश के खेल संस्थानों से लेकर मंत्रालय तक एक साफसुथरी व्यवस्था कायम करने की जरूरत है, जिसमें किसी खिलाड़ी को यह न सोचना पड़े कि अगर उसने फेडरेशन के खिलाफ आवाज उठाई तो उसका भविष्य खत्म हो जाएगा. किसी महिला खिलाड़ी को यह डर न हो कि यौन उत्पीड़न की शिकायत करने पर उसका चरित्र कटघरे में खड़ा कर दिया जाएगा. किसी खिलाड़ी को यह न लगे कि पदक जीतने से ज्यादा जरूरी है किसी अधिकारी को खुश रखना. और किसी भी खेल संघ के अध्यक्ष को यह भ्रम न हो कि उसका पद उसे खिलाड़ियों से ऊपर कर देता है.
खेल व्यवस्था को बदलने का समय है
कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीतकर लौटे खिलाड़ियों का स्वागत कीजिए, उन पर पुष्प वर्षा कीजिए, उनके घर जाइए, उनके माता-पिता को सम्मान दीजिए, उन्हें आर्थिक सहायता दीजिए, लेकिन इसके साथ-साथ उस व्यवस्था को बदलने की कोशिश शुरू होनी चाहिए जिसमें जेन-अल्फा और जेन-बीटा का खिलाड़ी प्रवेश करने वाले हैं.
अगर किसी महिला पहलवान को पदक जीतने के बाद भी अपने सम्मान की लड़ाई लड़नी पड़े तो हमें पदक पर गर्व करने से पहले व्यवस्था पर शर्म करनी चाहिए. अगर कोई खिलाड़ी भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने से डरता है तो देश की खेल नीति अधूरी है. अगर कोई खिलाड़ी यौन उत्पीड़न की शिकायत करने के बाद अपने करियर को लेकर चिंतित रहता है तो हमारी संस्थाएं असफल हैं और अगर राजनीतिक ताकत के सामने खिलाड़ी को अकेला छोड़ दिया जाता है तो सरकार की ‘खेल शक्ति’ की सारी घोषणाएं खोखली हैं.
खिलाड़ियों से सिर्फ मैडल की आस न लगाएं बल्कि उन्हें सुरक्षित रहने, सवाल पूछने, शिकायत करने और सम्मान के साथ अपना करियर बनाने की आजादी हो.
भारत को यदि खेल महाशक्ति बनना है तो पहले उसे खेल संस्थाओं को सत्ता के छोटे-छोटे साम्राज्यों से मुक्त करना होगा. खेल संघ खिलाड़ियों के लिए हैं, खिलाड़ी खेल संघों के लिए नहीं हैं. सरकार को यह तय करना होगा कि वह खिलाड़ियों के साथ खड़ी है या उन ताकतवर संस्थागत ढांचों के साथ, जिनसे खिलाड़ी डरता है.
भारत के 13 गोल्ड मैडल
राबाई चानू – वेटलिफ्टिंग, महिला 48 किग्रा
शर्मिला धांकर – पैरा एथलेटिक्स, महिला शॉट पुट F57
दिलीप महाडू गावित- पैरा एथलेटिक्स, पुरुष 100 मीटर T47
अस्मिता डे – जूडो, महिला 48 किग्रा
हर्ष सिंह – जूडो, पुरुष 60 किग्रा
प्रीति पवार – बॉक्सिंग, महिला 54 किग्रा
जैस्मिन लांबोरिया – बॉक्सिंग, महिला 57 किग्रा
सोमन राणा – पैरा एथलेटिक्स, पुरुष शॉट पुट F57
साक्षी चौधरी – बॉक्सिंग, महिला 51 किग्रा
प्रिया घंघास – बॉक्सिंग, महिला 60 किग्रा
अरुंधति चौधरी – बॉक्सिंग, महिला 70 किग्रा
सचिन – बॉक्सिंग, पुरुष 60 किग्रा
अंकुश – बॉक्सिंग, पुरुष 80 किग्रा
17 सिल्वर मैडल भी कम महत्वपूर्ण नहीं
रिशिकांता सिंह – वेटलिफ्टिंग, पुरुष 60 किग्रा
मुथुपांडी राजा – वेटलिफ्टिंग, पुरुष 65 किग्रा
ज्ञानेश्वरी यादव – वेटलिफ्टिंग, महिला 53 किग्रा
सरवेश कुशारे – एथलेटिक्स, पुरुष हाई जंप
वल्लुरी अजया बाबू – वेटलिफ्टिंग, पुरुष 79 किग्रा
हरजिंदर कौर – वेटलिफ्टिंग, महिला 69 किग्रा
गुलवीर सिंह – एथलेटिक्स, पुरुष 10,000 मीटर
मुरली श्रीशंकर – एथलेटिक्स, पुरुष लॉन्ग जंप
मोहम्मद बासिल – पैरा एथलेटिक्स, पुरुष 100 मीटर T47
लवप्रीत सिंह – वेटलिफ्टिंग, पुरुष 110+ किग्रा
यामिनी मौर्या – जूडो, महिला 57 किग्रा
नीरज चोपड़ा – एथलेटिक्स, पुरुष जैवलिन थ्रो
प्रवीण चित्रवेल – एथलेटिक्स, पुरुष ट्रिपल जंप
जदुमणि सिंह मांडेंगबाम – बॉक्सिंग, पुरुष 55 किग्रा
शुभम जुयाल – पैरा एथलेटिक्स, पुरुष शॉट पुट F57
लवलीना बोरगोहेन – बॉक्सिंग, महिला 75 किग्रा
नरेंद्र बेरवाल – बॉक्सिंग, पुरुष 90+ किग्रा
9 ब्रॉन्स के विजेता
बिंद्यारानी देवी – वेटलिफ्टिंग, महिला 58 किग्रा
झंडू कुमार – पैरा पावरलिफ्टिंग, पुरुष हेवीवेट
शिल्पा के. शायला – पैरा एथलेटिक्स, महिला शॉट पुट F57
सीमा कालिरामना – एथलेटिक्स, महिला डिस्कस थ्रो
तेजस्विन शंकर – एथलेटिक्स, पुरुष डेकाथलॉन
यश वीर सिंह – एथलेटिक्स, पुरुष जैवलिन थ्रो
सेल्वा प्रभु थिरुमारन – एथलेटिक्स, पुरुष ट्रिपल जंप
उन्नति शर्मा – जूडो, महिला 63 किग्रा
गुलवीर सिंह – एथलेटिक्स, पुरुष 5,000 मीटर
फिल्मों ने दिखाया खिलाड़ियों का संघर्ष
भारतीय खेलों की चमकदार तस्वीर के पीछे संघर्ष, गरीबी, भेदभाव, चोट, पारिवारिक दबाव और खेल-व्यवस्था की बेरुखी की एक दुख भरी दुनिया भी है. पत्रकारिता-जगत इस अंधेरे पक्ष को उजागर करने में हमेशा कोताही बरतता रहा, मगर हिंदी सिनेमा ने समय-समय पर इस अनदेखी दुनिया को पर्दे पर उतारने की हिम्मत दिखाई है.
‘चक दे इंडिया’ में महिला हॉकी खिलाड़ियों को सिर्फ मैदान के प्रतिद्वंद्वी से नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था के पूर्वाग्रहों से भी लड़ते दिखाया गया है. इस फिल्म ने बताया कि कैसे खिलाड़ियों को उनकी क्षमता से ज्यादा उनके प्रदेश, भाषा और निजी जीवन के आधार पर परखा जाता है. महिला हॉकी टीम के कोच कबीर खान का संघर्ष उस व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, जो प्रतिभा से पहले पहचान देखती है.
फिल्म ‘दंगल’ का संघर्ष अखाड़े में भी है और अखाड़े के बाहर भी है. बेटियों को कुश्ती लड़ते देख गांव-समाज की हंसी और ताने और लड़कियों के लिए तय पारंपरिक भूमिकाओं को चुनौती देती इस फिल्म ने गांव से लेकर खेल अकादमी तक समाज और व्यवस्था की असलियत उजागर की है. लड़कियों का बाल कटवाना और लड़कों के साथ कुश्ती की कठोर ट्रेनिंग करना उन दृश्यों में शामिल है, जहां सामाजिक सोच से सीधा टकराव दिखाई देता है.
फिल्म ‘मैरी कॉम’ में गरीबी, पारिवारिक जिम्मेदारी, महिला होने की सामाजिक बंदिश और मां बनने के बाद खेल में वापसी का संघर्ष सामने आता है. वहीं ‘पंगा’ दिखाती है कि शादी और मातृत्व के बाद एक महिला खिलाड़ी के लिए दोबारा मैदान में लौटना कितना कठिन हो सकता है. इन फिल्मों में सवाल केवल पदक का नहीं, बल्कि यह तय करने के अधिकार का है कि महिला अपने जीवन का रास्ता खुद चुन सकती है या नहीं?
‘सांड की आंख’ में उम्र और लिंग दोनों सामाजिक पूर्वाग्रह बनकर सामने आते हैं. बुजुर्ग महिलाओं का निशानेबाजी सीखना ही उस सोच के खिलाफ विद्रोह है, जो मानती है कि खेल युवाओं और पुरुषों का क्षेत्र है.
‘साइना’ और ‘शाबाश मिठू’ जैसी फिल्मों में महिला खिलाड़ियों के प्रशिक्षण, अनुशासन और पहचान बनाने की मुश्किलें सामने आती हैं. भारतीय महिला खिलाड़ियों पर बनी फिल्मों ने खिलाड़ियों के चयन, प्रशासनिक राजनीति और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों को बड़े सशक्त तरीके से उठाया है.
लेकिन सबसे कड़वी तस्वीर ‘पान सिंह तोमर’ और ‘भाग मिल्खा भाग’ जैसी फिल्मों में दिखाई देती है. मिल्खा सिंह के जीवन में विभाजन का दर्द और दहशत के साथ उनका व्यक्तिगत संघर्ष दिखाया गया है, जबकि पान सिंह तोमर की कहानी में एक राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी भी व्यवस्था और सामाजिक परिस्थितियों की उपेक्षा का शिकार किस तरह हो सकता है, इसका खुलासा है.
इन फिल्मों का असली महत्व यही है कि ये पदक की चमक के पीछे छिपे कड़े संघर्ष को दिखाती हैं. खिलाड़ी मैदान पर हारता या जीतता जरूर है, लेकिन उसकी सबसे कठिन लड़ाई अक्सर मैदान के बाहर ही होती है. Commonwealth Games 2026





