Indian Judiciary: लोकतंत्र में अदालत का काम कानून की व्याख्या करना होता है, भाषण देना नहीं लेकिन पिछले कुछ सालों से निचली अदालतों, हाईकोर्ट और यहां तक सुप्रीम कोर्ट के जजों की भाषा कानून से ज्यादा राजनीती से प्रेरित नजर आई है. जब सुप्रीम कोर्ट के सबसे ऊंचे ओहदे पर बैठे जस्टिस सूर्यकान्त आम आदमी की तुलना कॉकरोच से करते हैं तो बाकी जजों से और क्या उम्मीद की जा सकती है?
टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा की वर्चुअल पेशी वाली याचिका खारिज करते समय जस्टिस दीपांकर दत्ता की भाषा भी क़ानून से दूर छिटक कर राजनीति की भाषा नजर आई. उन्होंने कहा- “राजनीति में आई हैं तो अंडों से क्यों डरती हैं, स्वतंत्रता सेनानियों ने सीने पर गोलियां खाईं हैं”. जस्टिस दीपांकर दत्ता की यह टिप्पणी महुआ मोइत्रा के वकील के तर्क के जवाब थी लेकिन यह पूरी न्याय व्यवस्था के लिए एक चिंता का विषय बन गई.
मामला पर सीधा था. महुआ मोइत्रा पर धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप है. जांच अधिकारी ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा. महुआ की तरफ से दलील दी गई कि उन पर पहले भी अंडे और सब्जियां फेंकी जा चुकी हैं इसलिए पुलिस थाने में फिजिकल पेशी के दौरान उन्हें सुरक्षा का खतरा है. कोर्ट ने इस तर्क को यह कहकर नकार दिया कि सांसद होने के नाते विशेष सुविधा नहीं मांगी जा सकती. यहां तक तो सब ठीक था. समस्या तब शुरू हुई जब जस्टिस दीपांकर दत्ता ने यह कहा की राजनीती में आई हो तो अंडो से क्यों डरती हो.
1857 और 1942 में जिन लोगों ने गोलियां खाईं वो विदेशी सत्ता के खिलाफ लड़ रहे थे. आज 2026 में अगर एक निर्वाचित सांसद कहती है कि उसे भीड़ से डर है तो इसका मतलब यह नहीं कि वो आजादी की लड़ाई लड़ रही है. इसका मतलब सिर्फ इतना है कि सरकार उसे सुरक्षा देने में नाकाम रही है. जब अंडे फेंकने की शिकायत पर FIR दर्ज हो और फिर भी घटनाएं न रुकें तो अदालत को पुलिस की नाकामी पर सवाल उठाना चाहिए था, विक्टिम को ही बर्दाश्त करने का भाषण नहीं देना चाहिए था. जस्टिस दीपांकर की इस टिप्पड़ी के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास ने सोशल मीडिया पर लिखा कि क्या अदालत चाहती है कि महुआ गोलियां खाएं और यदि कुछ होता है तो जस्टिस दत्ता जिम्मेदार होंगे.
अदालत में बैठे न्यायाधीशों की भाषा और जवाबदेही पर लगातार सवाल उठ रहे हैं और यह सवाल हवा में पैदा नहीं हुए. पिछले कुछ सालों में लगातार जजों ने ऐसी बातें कहीं हैं जो किसी भी लोकतान्त्रिक देश की न्यायव्यवस्था के लिए गरिमा की बात नहीं है. आरएसएस की मानसिकता से ग्रस्त जजों के ऐसे बयान सत्ता के लिए राष्ट्रभक्ति की भाषा हो सकती है लेकिन यह लोकतंत्र के लिए बेहद डरावनी और विभत्स साबित होती हैं. राजनैतिक पार्टियों के आपसी द्वन्द के बीच में कानून और न्याय कहीं गुम हो जाते है.
सवाल यह है कि राजनीति कितनी खतरनाक स्थिति में पहुंच चुकी है कि एक सांसद को कोर्ट जाने से पहले यह सोचना पड़ रहा है कि वहां भीड़ उसे नुकसान पहुंचा सकती है. महुआ मोइत्रा को कोई पसंद करें या न करें लेकिन उनका डर लोकतंत्र की चूलें हिलाने के लिए काफ़ी है. महुआ का यह डर पूरी न्यायव्यवस्था की जवाबदेही और पुलिस व्यवस्था पर सवालिया निशान ही खड़ा करता है. जस्टिस दीपांकर दत्ता को अंडा फेंकना छोटी बात लगती है लेकिन क्या वह नहीं जानते कि यह डर पैदा करने का तरीका है. आम आदमी की बात तो दूर की है जब सुप्रीम अदालत में एक महिला सांसद के शरीर पर अंडा फेंकने की घटना को गंभीरता से नहीं लिया गया तो कल किसी आम औरत के चेहरे पर स्याही फ़ेंकी जाएगी और परसों किसी औरत के चेहरे पर तेजाब फेंका जाएगा तब भी अदालतों में बैठे जज इसे छोटी बात कर कर टाल देंगे इसलिए जरूरत इस बात की है कि सीनियर जज अपनी भाषा पर कंट्रोल करें. Indian Judiciary





