Indian Judiciary: लोकतंत्र में अदालत का काम कानून की व्याख्या करना होता है, भाषण देना नहीं लेकिन पिछले कुछ सालों से निचली अदालतों, हाईकोर्ट और यहां तक सुप्रीम कोर्ट के जजों की भाषा कानून से ज्यादा राजनीती से प्रेरित नजर आई है. जब सुप्रीम कोर्ट के सबसे ऊंचे ओहदे पर बैठे जस्टिस सूर्यकान्त आम आदमी की तुलना कॉकरोच से करते हैं तो बाकी जजों से और क्या उम्मीद की जा सकती है?
टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा की वर्चुअल पेशी वाली याचिका खारिज करते समय जस्टिस दीपांकर दत्ता की भाषा भी क़ानून से दूर छिटक कर राजनीति की भाषा नजर आई. उन्होंने कहा- "राजनीति में आई हैं तो अंडों से क्यों डरती हैं, स्वतंत्रता सेनानियों ने सीने पर गोलियां खाईं हैं". जस्टिस दीपांकर दत्ता की यह टिप्पणी महुआ मोइत्रा के वकील के तर्क के जवाब थी लेकिन यह पूरी न्याय व्यवस्था के लिए एक चिंता का विषय बन गई.
मामला पर सीधा था. महुआ मोइत्रा पर धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप है. जांच अधिकारी ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा. महुआ की तरफ से दलील दी गई कि उन पर पहले भी अंडे और सब्जियां फेंकी जा चुकी हैं इसलिए पुलिस थाने में फिजिकल पेशी के दौरान उन्हें सुरक्षा का खतरा है. कोर्ट ने इस तर्क को यह कहकर नकार दिया कि सांसद होने के नाते विशेष सुविधा नहीं मांगी जा सकती. यहां तक तो सब ठीक था. समस्या तब शुरू हुई जब जस्टिस दीपांकर दत्ता ने यह कहा की राजनीती में आई हो तो अंडो से क्यों डरती हो.
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