Children Kanwar Yatra: सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वाइरल हुआ. यह वीडियो राजस्थान के दौसा जिले के एक प्राइवेट स्कूल का बताया जा रहा है. वीडियो में स्कूल के बच्चे कांवड़ की प्रैक्टिस करते नजर आ रहे हैं. मतलब की स्कूल में बच्चों को कांवड़ ढोने की ट्रेनिंग दी जा रही है. संविधान का अनुच्छेद 28 कहता है कि राज्य से मान्यता प्राप्त या सरकारी सहायता पाने वाले स्कूलों में किसी स्टूडेंट को धार्मिक शिक्षा में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. अब सवाल यह है कि क्या स्कूल पर कार्यवाही होगी?

शिक्षा का अधिकार कानून RTE 2009 की धारा 17 भी कहती है कि स्कूल मे बच्चे को किसी भी तरह का शारीरिक या मानसिक दबाव नहीं दिया जा सकता. कांवड़ में वजन उठाना, लंबी दूरी चलना, धूप में खड़ा होना, 6 से 12 साल के बच्चे के लिए ये मानसिक दबाव ही है. यहां असली सवाल कानून से भी बड़ा है. स्कूल आरएसएस की शाखा नहीं हैं. स्कूल का काम बच्चे को सवाल पूछना सिखाना है धर्म नहीं. कांवड़ उठाना अपने आप में कोई अपराध नहीं है. किसी व्यक्ति को धार्मिक आस्था के अनुसार कांवड़ यात्रा करनी है तो वह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है. समस्या तब शुरू होती है जब धार्मिक आस्था को बच्चों की शिक्षा का हिस्सा बनाकर उनके ऊपर थोपा जाने लगे.

स्कूल में बच्चे इसलिए जाते हैं कि वे पढ़ना, लिखना, गणित, विज्ञान, इतिहास और समाज को समझना सीखें. वे यह सीखें कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर क्यों घूमती है, वायरस और बैक्टीरिया के कारण बीमारियां कैसे फैलती है? संविधान नागरिकों को कौन-कौन से अधिकार देता है और किसी दावे को सच मानने से पहले उसका प्रमाण कैसे खोजा जाता है लेकिन अगर उसी उम्र में बच्चे के हाथ में किताबों की जगह कांवड़ थमा दी जाये तो सवाल उठता है कि बच्चों को शिक्षा दी जा रही है या भक्त बनाया जा रहा है?

बच्चों की शिक्षा में सबसे जरुरी चीज जिज्ञासा और सवाल करने की आदत होती है. बच्चे को यह नहीं सिखाना चाहिए कि यह पवित्र है इसलिए सवाल मत करो. उसे यह सिखाना चाहिए कि यह दावा किया जा रहा है कि यह पवित्र है, अब देखते हैं कि इसके पीछे प्रमाण क्या है? यही वैज्ञानिक सोच है. संविधान भी धर्म और शिक्षा के बीच दूरी की बात करता है. भारत का संविधान धर्म की आजादी तो देता है लेकिन साथ ही शिक्षा मे धर्म की घुसपैठ को लेकर सीमाएं भी तय करता है.

अगर स्कूल में बच्चों के 2 घंटे कांवड़ की प्रैक्टिस में गए तो वो दो घंटे गणित, विज्ञान और भाषा के थे. NEP 2020 भी कहता है कि बुनियादी साक्षरता सबसे जरूरी है लेकिन बुनियादी शिक्षा का हाल यह है कि आज 9 वीं के 63 फीसदी बच्चे गुणा-भाग तक नहीं कर पाते. स्कूल में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबके बच्चे पढ़ते हैं. अगर एक धर्म की गतिविधि को स्कूल एक्टिविटी बना दिया जाए तो दूसरे धर्म के बच्चे असहज महसूस करेंगे. स्कूल साझा जगह है, मंदिर नहीं.

धर्म के बारे मे जानकारी हासिल करना गलत नहीं है लेकिन जानकारी और दीक्षा में फर्क होता है. स्कूल चाहे तो क्लास में बता सकता है कि कांवड़ यात्रा क्या है? इसका इतिहास क्या है? भूगोल क्या है? लोग क्यों करते हैं? यह जानकारी है लेकिन स्कूल बच्चों से कांवड़ उठवाए और रूट तय कराए यह दीक्षा है और दीक्षा देने का काम परिवार और मंदिर का है, स्कूल का नहीं.

दरअसल आरएसएस शिक्षा को पूरी तरह चौपट करना चाहती है. शिक्षा में धर्म को इतना घुसा दो की शिक्षा में क्रिटिकल थिंकिंग और साइंटिफिक एप्रोच पूरी तरह खत्म हो जाये और सिर्फ धर्म बाकी रहे. पिछले कुछ सालों से देश के स्कूलों और कॉलेजों में जो हो रहा है उसे देखकर एक बात साफ हो जाती है कि आरएसएस किताबों में से तर्क निकाल कर उसकी जगह धर्म भर देना चाहता है ताकि आने वाली पीढ़ी सोचना बंद कर दे और सिर्फ मानना शुरू कर दे. शिक्षा का सबसे बड़ा हथियार क्रिटिकल थिंकिंग है यानी किसी भी बात को आंख बंद करके नहीं मानना. पहले सवाल पूछो, फिर सबूत मांगो फिर नतीजे पर पहुंचो. विज्ञान इसी सिद्धांत पर खड़ा है.

पृथ्वी घूमती है क्योंकि प्रमाण मौजूद हैं, दवा काम करती है क्योंकि लगातार ट्रायल होते हैं, बिजली बनती है क्योंकि फिजिक्स के नियम हैं, धर्म के नाम पर हिंसा और आतंक है क्योंकि धर्म सिर्फ कल्पनाओं पर खड़ा है. आरएसएस को इस सोच से दिक्कत है क्योंकि सवाल पूछने वाला बच्चा कल को पूछेगा कि जाति क्यों है? ईश्वर कहाँ हैं? मंदिर-मस्जिद क्यों हैं? अंधविश्वास क्यों हैं? लिंगभेद क्यों हैं? धर्म के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं होगा इसलिए तरीका तय किया गया है कि शिक्षा में धर्म को इतना घुसा दो कि धर्म ही शिक्षा बन जाए. क्लास में विज्ञान के पीरियड कम कर दो और प्रार्थना सभा लंबी कर दो. इतिहास की किताबों से सच्चाई हटा दो और उसकी जगह पौराणिक कथाएं डाल दो. बच्चों से कहो कि हवाई जहाज सबसे पहले हमारे यहां बने थे, प्लास्टिक सर्जरी हजारों साल पहले हो गई थी. सबूत मत मांगो. बस मान लो. जब बच्चा 10 साल की उम्र में ही यह सब मानना शुरू कर देगा तो वह 20 साल की उम्र मे भक्त ही बनेगा, साइंटिस्ट नहीं. 10 साल की उम्र मे कांवड़ ढोना सीखेगा तो 20 साल की उम्र में वो रिसर्च पेपर क्यों पढ़ेगा?

दौसा, हरदोई, पीलीभीत और अब राजस्थान के कई स्कूलों के वीडियो आ रहे हैं वो आरएसएस के इसी प्रयोग का हिस्सा हैं. कहीं बच्चों के हाथ में कॉपी की जगह कांवड़ थमाई जा रही है, कहीं क्लास की जगह कीर्तन हो रहे हैं तो कहीं विज्ञान मेले की जगह धार्मिक झांकी सजाई जा रही है. स्कूल का काम बच्चे को ब्रह्मांड समझाना था. अब काम है बच्चे को धार्मिक पहचान में ढालना. तर्क की जगह आस्था, प्रयोग की जगह परंपरा और जांच की जगह जयकारे ने ले ली है.

इसका नतीजा क्या होगा? एक ऐसी पीढ़ी तैयार होगी जो इंजीनियर तो बन जाएगी लेकिन वह समझ ही नहीं पायेगी कि पुल क्यों गिरा? डॉक्टर बन जाएगी लेकिन वह दवा के पीछे के डेटा को नहीं जान पायेगी? ऐसी पीढ़ी जो वोटर बन जाएगी लेकिन ये नहीं पूछेगी कि वादा पूरा क्यों नहीं हुआ? क्योंकि बचपन से उसे सिखाया ही यही गया है कि सवाल करना पाप है. गुरु ने जो कहा, किताब में जो छपा, बड़े बुजुर्गों ने जो माना, वही अंतिम सत्य है.

भारत में 35 हजार से ज्यादा रजिस्टर्ड मदरसे हैं. हर साल इन मदरसों से एक लाख से ज्यादा स्टूडेंट्स मुल्ला, मौलवी, आलिम, फाजील होकर निकलते हैं लेकिन इन एक लाख मे कितने साइंस, पर्यावरण या समाज के लिए कुछ नई खोज कर पाते हैं? इन लाखों लोगों में से कितने लैब में हैं, कितने रिसर्च पेपर लिख रहे हैं, कितने नई दवा, नया बीज, नया सोलर पैनल बना रहे हैं? जवाब लगभग शून्य ही है.

इसका कारण बहुत सीधा है. मदरसे का मकसद ही साइंस नहीं है. मदरसे का मकसद है एक किताब को आखिरी सच मान लेना. वहां बच्चे को पहले दिन से यही सिखाया जाता है कि सवाल करना गुनाह है. जो लिखा है वही सच है, क्यों और कैसे पूछने की जरूरत नहीं. जब 6 साल की उम्र में दिमाग में ये ताला लग जाए कि अल्लाह ने कहा है बस मान लो तो 20 साल की उम्र में वह डार्विन, न्यूटन, आइंस्टीन को क्यों पढ़ेगा?

धर्म पुराने जमाने की कहानियों का संग्रह है. जब इंसान को बिजली, दवा, ब्रह्मांड का कुछ पता नहीं था तब उसे धूरतों ने भगवान की कहानियां सुनाई और इंसान उन कहानियों को सच मान गया. अब हमारे पास टेलीस्कोप है, माइक्रोस्कोप है, DNA है फिर भी अगर हम बच्चों की अक्ल को 14 सौ साल पुरानी किताब पर रोक देंगे तो तरक्की कैसे होगी?

धर्म की शिक्षा का सबसे बड़ा नुकसान ये है कि वो जिज्ञासा को मार देती है. विज्ञान का पहला नियम है सवाल. ये क्यों हुआ? सबूत क्या है? इसे टेस्ट कैसे करें? और धर्म का पहला नियम है, सवाल मत करो बस मान लो. दोनों चीजें एक दूसरे के बिलकुल विरोधी हैं. एक दिमाग में ये दोनों चीजें एक साथ नहीं रह सकतीं इसलिए स्कूल को स्कूल ही रहना चाहिए. स्कूल का काम इंसान को इंसान बनाना है, हिंदू या मुसलमान बनाना नहीं. स्कूल में बच्चे को ये सीखना चाहिए कि बीमारी वायरस से होती है न कि नजर से. बारिश बादल से होती है न कि किसी के नाराज होने से. देश संविधान से चलता है न कि किसी धार्मिक किताब से.

अगर हम स्कूलों को भी मंदिर-मस्जिद की शाखा बना देंगे तो 20 साल बाद देश में भक्त तो होंगे लेकिन डॉक्टर, इंजिनियर, साइंटिस्ट और अविष्कारक नहीं होंगे. जनता के टैक्स का पैसा सिर्फ उस जगह लगना चाहिए जहां सवाल जिंदा हों क्योंकि देश मंदिर और मदरसों से नहीं बनता. देश लैब, लाइब्रेरी और सवाल पूछने वाले दिमागों से बनता है. जिस दिन हम ये भूल गए, उस दिन हमारा भविष्य भी पुरानी किताबों के पन्नों में बंद हो जाएगा.

जब स्कूल भी मदरसा बनने लगें, जब स्कूल में प्रयोग की जगह हवन हो, इतिहास की जगह मिथक पढ़ाए जाएं और टीचर कहे कि कांवड़ की प्रैक्टिस करो तो समझ जाइये की एक ऐसी पीढ़ी पैदा करने की प्लानिंग चल रही है जो डिग्री तो लेगी पर दिमाग गिरवी रख देगी. धर्म की शिक्षा बुद्धि पर ताला लगाना सिखाती है इसलिए स्कूलों को हिन्दू मदरसा बनने से रोका जाना चाहिए. Children Kanwar Yatra

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