Heart Touching Poetry: मन के उदास घाट पर बैठा
आज फिर सोच रहा हूं
कि आखिर कहां करूं
तुम्हारी यादों का विसर्जन
यह कौन-सा पंचतत्व की बनी हैं
कि कर दूं विसर्जित
किसी सुनसान नदी की धारा में
या अर्पित कर दूं
किसी प्राचीन बावड़ी को
गंगा घाट पर भी
अब कहां जा पाऊंगा मैं शाम ढले
किसी समंदर में भी क्या समा पाएंगी यह।

कभी कभी कलम की नोक पर
रख कर देखता हूं तेरी यादों को
कुछ बहाने की कोशिश करता हूं कभी
वीरान आंखों के कोरों से
हर बार हो जाता हूं असफल
मिट्टी होती तो मिल जाती मिट्टी में
हवा होती तो समा जाती हवा में
जल होती तो घुल जाती जल में
आग में डालता हूं …
तो और भड़क उठती हैं ।
अनन्त आकाश में उड़ रही हैं
मेरे बीज तत्व के साथ
जहां उतरूंगा …
वहीं उतर आएंगी फिर से।

आज फिर…
मन के उदास घाट पर बैठा
सोच रहा हूं
कि आखिर कहां करूं विसर्जन
तुम्हारी यादों का। Heart Touching Poetry

 

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