Government and Inflation: अगले महीने से आपकी रसोई का बजट हिलने वाला है. तेल, साबुन, बिस्किट से लेकर डबलरोटी तक सबकी कीमतें बढ़ने की तैयारी है. कंपनियां पहले ही रिटेलरों को नए रेट की लिस्ट भेज चुकी हैं. मतलब अब आम आदमी का आम खाना भी आम नहीं रहेगा. पाम ऑयल, सूरजमुखी और सरसों तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़े हैं लेकिन सरकार ने इंपोर्ट ड्यूटी घटाने, स्टॉक लिमिट लगाने जैसे कोई ठोस कदम नहीं उठाए, जीएसटी में भी कोई राहत नहीं दी और पेट्रोल डीजल के दाम भी नहीं घटाए इससे आम जनता के बचे खुचे अच्छे दिन भी महंगाई की भेंट चढ़ने वाले हैं.
साबुन, शैंपू, टूथपेस्ट बनाने में पाम ऑयल और केमिकल लगते हैं. कच्चा माल 8 से 10 फीसदी तक महंगा हुआ है. HUL और ITC जैसी कंपनियों ने साफ कहा है कि वो दाम बढ़ाएंगे. इस महंगाई को रोकने के लिए सरकार ने GST कम नहीं की बल्कि कॉरपोरेट टैक्स 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत कर दिया. अमीरों को लाखों करोड़ की छूट दी गई लेकिन बदले में आम आदमी के लिए कोई नौकरी नहीं, कोई निवेश नहीं. बिस्किट और ब्रेड को गरीब का खाना कहा जाता है. 10 रुपये वाला बिस्किट का पैकेट अब 12 का हो गया. 40 रुपये की ब्रेड 45-50 की हो गई क्योंकि आटा, गेहूं और मैदा के दामों में बढ़ोतरी हुई है इसकी एक वजह पैकेजिंग और ट्रांसपोर्ट का महंगा होना भी है और यह महंगाई पेट्रोल डीजल के कारण भी हुई है. सरकार ने गेहूं का निर्यात तो खुला रखा लेकिन यहां बफर स्टॉक में गड़बड़ी रही. अब जब आटा महंगा हुआ तो सरकार मौसम का बहाना बना रही है.
बीजेपी सरकार को सत्ता में आए एक दशक से ज्यादा हो गया. वादे सुहाने थे लेकिन आज हकीकत क्या है? दाल, आटा, दूध के बाद अब रोजमर्रा की सबसे छोटी चीजें भी महंगी हो गईं. मेनस्ट्रीम मीडिया इस महंगाई के पीछे ग्लोबल इकोनॉमी का ठीकरा फोड़ रही है लेकिन सवाल है कि यह अगर ग्लोबल संकट है तो सिर्फ भारत के गरीब पर ही यह संकट क्यों है? और अगर ग्लोबल संकट ही बात है तो ग्लोबल मार्किट में कच्चे तेल यानी पेट्रोल-डीजल के दाम तो घटे हैं इसके बावजूद यहां दाम नहीं घटाए गये जिससे हर चीज में महंगाई बढ़ी. सरकारी दावे महंगाई को सिर्फ 5 फीसदी के आसपास बताते है लेकिन यह आधा सच है. खाने-पीने की चीजों में महंगाई 9-10 फीसदी के आसपास पहुँच चुकी है. एक परिवार जो महीने में 5000 का राशन लाता था, अब उसका खर्च 6 हजार हो जाएगा. ये विकसित भारत का गणित है.
तेल, FMCG, बेकरी कंपनियों के तिमाही नतीजे बताते हैं की इनका मुनाफा दोगुना हुआ है क्योंकि उन्होंने दाम बढ़ाकर लागत ग्राहक पर डाल दी. रिजर्व बैंक रेट बढ़ा रहा है. वित्त मंत्री कह रही हैं घबराइए मत. खाद्य मंत्री कह रहे हैं स्टॉक है पर जमीन पर सच्चाई कुछ और ही है. सरकार के पास न तेल के लिए बफर है, न दाल के लिए इंपोर्ट प्लान और न ही ट्रांसपोर्ट लागत कम करने की कोई स्कीम है. 10 साल में एक भी ऐसा काम नहीं हुआ जिससे महंगाई पर कंट्रोल लग सके. महंगाई सिर्फ युद्ध या बारिश की वजह से नहीं बढ़ती बल्कि यह सरकार की गलत नीतियों से ज्यादा बढ़ती है. कृषि में निवेश नहीं हुआ बल्कि सिर्फ भाषणबाजी हुई. सप्लाई चेन पर कोई कंट्रोल नहीं, सिर्फ दिखावे के लिए मॉनिटरिंग कमेटी बना दी गई. GST का बोझ सीधे गरीब पर डाल दिया और कॉरपोरेट को खुली छूट दी गई.
जीएसटी के नाम पर खुली लूट
सरकार की जीएसटी की आय प्रति माह बढ़ रही है. जुलाई 2025 में जो 1.86 लाख करोड़ थी जुलाई 2026 में 2.11 लाख करोड़ प्रति माह हो गई है. मतलब हर माह 25 हजार करोड़ की अतिरिक्त वसूली हो रही है. अगर 2.11 लाख करोड़ को 12 महीने से गुणा करें तो 25 लाख करोड़ रुपये सालाना होता है. पिछले साल के 1.86 लाख करोड़ के हिसाब से सालाना कमाई थी 22 लाख 32 हजार करोड़ रुपये. इसका मतलब है, हर दिन की कमाई 7000 करोड़ रुपये. हर घंटे की कमाई 290 करोड़ रुपये. इस 2.11 लाख करोड़ में CGST, SGST, IGST, Cess जैसे तमाम टैक्स शामिल है. ये सीधे जनता से नहीं बल्कि तेल, साबुन, बिस्किट, ब्रेड, मोबाइल और कार हर चीज पर लगे टैक्स से वसूला जाता है. दाम जितने बढ़ेंगे, GST की कमाई उतनी बढ़ेगी.
25 हजार करोड़ की एक्स्ट्रा इनकम असल में आम जनता से बंदूक की नोक पर कमाई गई अतिरिक्त कमाई है जो उत्पादकों के माध्यम से वसूली जा रही है. सरकार कह रही है कच्चा माल महंगा है लेकिन सरकार ये नहीं बता रही कि हर बढ़े हुए दाम पर 5 से 18 फीसदी तक GST भी बढ़कर आ रहा है यानी महंगाई के साथ-साथ सरकार की कमाई भी अपने आप बढ़ रही है. GST वसूली सीधे जनता से नहीं होती. सरकार ने ये काम उत्पादकों और दुकानदारों के जरिए कर रखा है. तमाम कंपनियां पहले दाम बढ़ाते हैं फिर बढ़े हुए दामों पर सरकार को GST देते हैं. ग्राहक को लगता है कंपनी महंगी कर रही है लेकिन असल में सरकार हर बिल में अपना हिस्सा पहले ही काट लेती है.
ब्रेड, बिस्किट, तेल, साबुन ये सब रोजमर्रा की जरूरत की चीजें हैं. अमीर के लिए शौक, गरीब के लिए मजबूरी लेकिन सरकार ने इन पर भी 12 से 18 प्रतिशत GST रखा हुआ है. जब 10 रुपये का बिस्किट 12 का होता है तो उस बढ़े हुए रुपये में से 1.5 रुपया सीधा GST के रूप में सरकार के खाते में जाता है. GST की वसूली बढ़ने का मतलब अर्थव्यवस्था की मजबूती नहीं है. GST की वसूली से हर माह 25 हजार करोड़ की वसूली बढ़ी है क्योंकि दाम बढ़े हैं. दाम बढ़े हैं मतलब महंगाई बढ़ी है. महंगाई बढ़ी है मतलब यह 25 हजार करोड़ की वसूली सीधी जनता से लूटी गई है. अगर तेल 100 से 120 हुआ तो 18 फीसदी GST भी 18 से 21.6 हो गया. अगर ब्रेड 40 से 50 हुई तो GST भी बढ़ा. मतलब सरकार को फायदा है कि महंगाई बढ़े. जितनी महंगाई, उतनी कमाई. यही 25 हजार करोड़ की बढ़ोतरी का गणित है.
2.11 लाख करोड़ हर महीने आ रहे हैं. साल का आंकड़ा 25 लाख करोड़ के पार पहुँच गया है. सवाल है ये पैसा कहां खर्च हो रहा है? अस्पतालों में दवा नहीं है, स्कूलों में शिक्षक नहीं है, सड़कें बदहाल हैं, महंगाई रोकने के लिए न बफर स्टॉक है, न सब्सिडी है और न ट्रांसपोर्ट पर राहत मिल रही है. बेतहाशा पैसा सिर्फ इवेंट, प्रचार और चुनाव प्रचार में बह रहा है. बीजेपी को सत्ता में आये एक दशक से ज्यादा हो गए. वादा था GST से टैक्स सरल होगा, महंगाई घटेगी लेकिन हुआ उल्टा. टैक्स स्लैब तो सरल नहीं हुए, उल्टे इतने हो गए कि C.A. भी कन्फ्यूज है और महंगाई इस कदर बढ़ी कि अब तेल और साबुन भी लक्जरी आइटम बन गए. GST की बढ़ती कमाई इसी फेल्योर का सबूत है. सरकार ने जानबूझकर टैक्स को बिल में छिपा दिया है. MRP में GST पहले से जुड़ा होता है इसलिए दर्द का पता देर से चलता है. जब तक सरकार महंगाई से कमाई करेगी तब तक अच्छे दिन सिर्फ GST के आंकड़ों में आएंगे.
इस कमाई से न तो कोई यूनिवर्सिटी बनी, न हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर पर ढंग का काम हुआ और न ही देश का कर्ज उतरा. उल्टे देश का कर्ज बढ़ता जा रहा है. सरकार कहती थी कर्ज मुक्त भारत बनाएंगे. हकीकत ये है कि देश पर विदेशी कर्ज 2025 में 185 लाख करोड़ था जो 2026 में बढ़कर 205 लाख करोड़ के पार चला गया. यानी GST की कमाई बढ़ी लेकिन देश का कर्ज भी बढ़ा. मतलब आम जनता टैक्स भी दे, महंगाई भी झेले और ब्याज भी भरे. 12 साल में विश्वगुरु बनने के बड़े-बड़े दावे किये गये लेकिन धरातल पर तो गरीबी, बदहाली और पिछड़ापान ही बढ़ा है. सरकारी यूनिवर्सिटी में सीटें नहीं हैं. फीस लगातार बढ़ाई गई है, स्कूलों में टीचर की भर्ती नहीं. IIT और IIM जैसे संस्थान गिने-चुने ही हैं. गांव का बच्चा आज भी 12वीं के बाद कोचिंग का खर्च नहीं उठा पाता. 25 लाख करोड़ सालाना GST से कमाई हो रही है लेकिन शिक्षा पर खर्च लगातार कम किया गया है. मतलब सरकार की कमाई बढ़ी लेकिन शिक्षा चौपट हुई और देश कंगाल हुआ.
कोविड ने हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर की पोल खोल दी थी. सरकारी अस्पतालों में ऑक्सीजन नहीं, बेड नहीं, दवा नहीं. इस त्रासदी के बाद भी पिछले 5 साल में सरकारी अस्पतालों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ. PHC में डॉक्टर नहीं हैं, जिला अस्पतालों में मशीनें खराब हैं, आयुष्मान का कार्ड है लेकिन अस्पताल ही नहीं हैं. GST से हर महीने 2 लाख करोड़ आने के बाद भी स्वास्थ्य बजट GDP का 2 प्रतिशत भी नहीं पहुंचा.
सरकार का तर्क है कि टैक्स का पैसा इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च हो रहा है. 8 लेन के एक्सप्रेसवे बन रहे हैं लेकिन इन हाइवेज की हकीकत जनता को पता है. आये दिन नई सड़कें ख़राब हो जाती हैं. नये बने एक्सप्रेसवेज ध्वस्त हो जाते हैं. नये बने ब्रिज धड़ाम से गिर जाते हैं. यह है इंफ्रास्ट्रक्चर का हाल. इस पर भी जमकर टोल वसूला जाता है.
GST का आधा पैसा राज्यों का होता है लेकिन केंद्र सरकार राज्यों का बकाया महीनों तक रोक कर रखती है. ऊपर से केंद्र सरकार कहती है स्कूल और अस्पताल राज्य चलाएं. कमाई केंद्र सरकार ले रही है और गाली राज्य सरकारें खा रही हैं. संघीय ढांचे के साथ यह सबसे बड़ी बेईमानी है. 2014 में अच्छे दिन का धोखा देकर बीजेपी सत्ता में आई थी. 2026 की हकीकत ये है कि टैक्स सबसे ज्यादा है, सुविधा सबसे कम. यूनिवर्सिटी नहीं, हॉस्पिटल नहीं, रोजगार नहीं सिर्फ वसूली और प्रचार. जिस सरकार की कमाई हर महीने रिकॉर्ड तोड़ रही हो उस सरकार में देश और देश की जनता बदहाली के कगार पर पहुँच चुके हैं.
2.11 लाख करोड़ हर महीने का मतलब है साल के 25 लाख करोड़ रूपये. 10 साल में 250 लाख करोड़ रूपये. इस पैसे से 100 AIIMS, 500 यूनिवर्सिटी और हर जिले में हजारों मेडिकल कॉलेज बन सकते थे. देश का कर्ज उतर सकता था लेकिन हुआ क्या? हिन्दू मुस्लिम का शोर, प्रचार और इवेंटबाजी के सिवा कुछ नहीं. GST की बढ़ती कमाई सरकार की कामयाबी नहीं है. ये उस लूट का सबूत है जो बंदूक की नोक पर उत्पादकों, कामगारों, औरतों और गरीबों से वसूली जा रही है और फिर उसी पैसे को विज्ञापन और ब्याज में उड़ा दिया जा रहा है. Government and Inflation





